श्रवण गर्ग | भागवत की अमेरिका यात्रा के पीछे कोई बड़ा राजनीतिक मकसद हो सकता है
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा के राजनीतिक मायनों पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्र सिर्फ न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर गार्डन में होने वाला उनका कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह सवाल रहा कि आखिर भारत के लिए इतने महत्वपूर्ण राजनीतिक और कूटनीतिक समय में मोहन भागवत अमेरिका क्यों गए हैं?
श्रवण गर्ग ने सबसे पहले इस दावे पर सवाल उठाया कि मोहन भागवत के कार्यक्रम का अमेरिका में जबरदस्त विरोध हो रहा है. उनका कहना था कि कुछ मानवाधिकार संगठनों के विरोध को जरूरत से ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है, जबकि बड़ी संख्या में हिंदू-अमेरिकी संगठन इस कार्यक्रम के समर्थन में भी खड़े हैं. उनके मुताबिक, असली सवाल विरोध और समर्थन करने वाले संगठनों की संख्या नहीं, बल्कि मोहन भागवत की इस यात्रा के पीछे छिपे राजनीतिक संकेत हैं.
चर्चा में यह सवाल भी उठा कि क्या अमेरिका में होने वाला विरोध वास्तव में मोहन भागवत का है, या फिर नरेंद्र मोदी सरकार और भारत की मौजूदा राजनीति के खिलाफ नाराजगी का प्रतीक है. श्रवण गर्ग ने 2014 में नरेंद्र मोदी के मेडिसन स्क्वायर गार्डन कार्यक्रम और मौजूदा आयोजन की परिस्थितियों की तुलना करते हुए कहा कि अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों के बीच राजनीतिक माहौल अब पहले जैसा नहीं है.
बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आरएसएस और हिंदुत्व से जुड़े संगठनों के अमेरिका में बने बड़े नेटवर्क पर रहा. श्रवण गर्ग के मुताबिक, पिछले एक दशक में उत्तर अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई देशों में हिंदू संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और प्रवासी नेटवर्क का बड़ा विस्तार हुआ है. ये लोग भारत में सत्ता परिवर्तन से अलग, वहां के स्थायी नागरिक, ग्रीन कार्ड धारक या लंबे समय से बसे हुए समुदाय का हिस्सा हैं.
इसी संदर्भ में सवाल उठा कि क्या मोहन भागवत की यात्रा सिर्फ आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के कार्यक्रमों तक सीमित है, या फिर संघ अमेरिका में बदलते राजनीतिक माहौल को करीब से समझने की कोशिश कर रहा है. खासकर ऐसे समय में, जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में व्यापार, कूटनीति और वैश्विक राजनीति को लेकर तनाव और अनिश्चितता दिखाई दे रही है.
श्रवण गर्ग ने आरएसएस के वरिष्ठ नेताओं दत्तात्रेय होसबाले और राम माधव की विदेश यात्राओं का भी जिक्र किया. उनका सवाल था कि क्या संघ अमेरिका के साथ भारत के संबंधों और संभावित ट्रेड डील जैसे मुद्दों को लेकर सीधे अपनी समझ विकसित कर रहा है?
चर्चा में भारत के रूस और चीन के साथ बढ़ते संपर्कों को भी महत्वपूर्ण बताया गया. श्रवण गर्ग के मुताबिक, संघ की वैचारिक राजनीति लंबे समय से साम्यवाद और चीन के प्रति आलोचनात्मक रही है. ऐसे में यदि भारत अमेरिका से दूरी बनाकर रूस और चीन के साथ अधिक निकटता की दिशा में बढ़ता है, तो यह संघ के लिए भी चिंता का विषय हो सकता है.
बातचीत के अंत में सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि क्या मोहन भागवत अमेरिका में केवल आरएसएस के प्रतिनिधि के रूप में गए हैं, या भारत सरकार और अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के बीच बदलते समीकरणों को समझने के लिए कोई व्यापक राजनीतिक भूमिका भी निभा रहे हैं?
श्रवण गर्ग के शब्दों में, मोहन भागवत की यात्रा को सिर्फ विरोध, समर्थन या उनके भाषण तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए. असली सवाल यह है कि वे अमेरिका में क्या कर रहे हैं, किससे मिल रहे हैं और भारत-अमेरिका के बदलते रिश्तों के बीच आरएसएस क्या समझने की कोशिश कर रहा है.
पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

