23 साल पहले लापता हुआ था बेटा, पता चलते ही तमिलनाडु से पंजाब पहुंच गई माँ
‘बीबीसी’ में ज़ेवियर सेल्वाकुमार और हरमनदीप सिंह के अनुसार, यह कहानी तमिलनाडु के कोयंबटूर की रहने वाली सुंदरी और उनके बेटे प्रकाशम की है, जो 23 साल पहले लापता हो गए थे और जिन्हें पंजाब में 15 सालों तक बंधुआ मज़दूर बनाकर भयानक यातनाएँ दी गईं.
साल 2003 में, 16 वर्षीय प्रकाशम अपने छोटे भाई से दोपहिया वाहन चलाने को लेकर हुए झगड़े के बाद गुस्से में घर छोड़कर चले गए थे. परिवार और पुलिस की तमाम कोशिशों के बावजूद उनका कोई पता नहीं चला. सुंदरी और उनके पति रामामूर्ति ने अपने बेटे की तलाश में सालों गुज़ार दिए. रामामूर्ति को हमेशा विश्वास था कि उनका बेटा ज़िंदा है, लेकिन 2021 में कैंसर से उनका निधन हो गया. सुंदरी अपने छोटे बेटे प्रभु के साथ खेती और मवेशी पालकर गुज़ारा करने लगीं.
प्रकाशम किसी तरह तमिलनाडु से पंजाब के अमृतसर (अजनाला) पहुँच गए. वहाँ एक खेत मालिक ने उन्हें 15 साल से भी अधिक समय तक बंधक बनाकर रखा. उनसे मवेशियों की देखभाल और चरवाही कराई जाती थी. उन्हें न तो उचित खाना, कपड़े या मज़दूरी मिलती थी और न ही रहने की सही जगह. रात में उन्हें लोहे के पलंग से ज़ंजीरों द्वारा बाँध दिया जाता था ताकि वे भाग न सकें और उनके साथ मारपीट की जाती थी.
2022 में पटियाला की स्वयंसेवी संस्था 'अपना फ़र्ज़ सेवा सोसायटी' ने उन्हें वहाँ से छुड़ाकर एक सुरक्षित आश्रय गृह में पहुँचाया. शुरुआत में मानसिक आघात के कारण प्रकाशम बहुत कम बोल पाते थे. हरियाणा विधानसभा के सेवानिवृत्त सचिव सुभाष चंद्र (जो एनजीओ से जुड़े हैं) ने प्रकाशम से लगातार बातचीत की. मई 2024 में प्रकाशम ने 'अरुप्पुकोट्टई', 'पूमलैपट्टी' और 'आनाइकुलम' जैसे शब्द बोले, जिन्हें गूगल पर सर्च करने पर पता चला कि ये तमिलनाडु के विरुधुनगर ज़िले के गाँव हैं.
सुभाष चंद्र ने अपने संपर्क के ज़रिए तिरुपुर के पत्रकार मुथैया को सूचित किया. मुथैया ने महीनों की मशक्कत के बाद जून में सुंदरी का पता लगा लिया और उन्हें प्रकाशम के जीवित होने की तस्वीर व वीडियो दिखाए.
जुलाई के अंत में जब परिवार प्रकाशम को लेने पहुँचा, तो संस्था ने कानूनी और प्रशासनिक दस्तावेज़ों की माँग की. कोयंबटूर के ज़िला कलेक्टर पवन कुमार किरियप्पनवर ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए 2005 के पुराने राशन कार्ड व स्कूल के कागज़ात के आधार पर दो दिनों के भीतर सत्यापन पूरा कराया. उन्होंने पटियाला के डिप्टी कमिश्नर हिंमांशु अग्रवाल को आधिकारिक पत्र भेजा, जिसके बाद हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई.
28 जुलाई को पटियाला में 23 साल बाद सुंदरी और प्रकाशम का मिलन हुआ. अपनी माँ को देखकर प्रकाशम उनके पैरों में गिर पड़े और सुंदरी ने रोते हुए अपने हाथों से बेटे को खाना खिलाया.
पटियाला के डिप्टी कमिश्नर ने बताया कि पीड़ित को नियमनुसार मुआवज़ा (जिसमें ज़मीन मालिक द्वारा 3.5 लाख रुपये और सरकारी सहायता शामिल है) दिलाने तथा बंधुआ बनाने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं.
23 साल बाद अपने बेटे को वापस पाकर सुंदरी ने इसे अपना "पुनर्जन्म" बताया और मुथैया, सुभाष चंद्र, संस्था के कार्यकर्ताओं तथा मीडिया (बीबीसी) का आभार व्यक्त किया. यह घटना मानवीय संवेदनाओं, निस्वार्थ सेवा और प्रशासनिक तत्परता की एक मिसाल है.

