एआई को चाहिए इंसानी हाथ, लेकिन भारतीय मजदूरों ने दिया जवाब

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती अब भाषा नहीं, बल्कि इंसानी हाथों की बारीकी है. चैटजीपीटी जैसे मॉडल इंटरनेट से जुटाए गए विशाल डेटा के आधार पर भाषा समझना सीख चुके हैं, लेकिन रोबोट अब भी सिलाई, बटन लगाना, कपड़े मोड़ना या किसी बैग में हाथ डालकर सामान निकालने जैसे काम ठीक से नहीं कर पाते. इसी कमी को दूर करने के लिए एआई कंपनियां अब दुनिया भर के कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के हाथों की हरकतों का डेटा इकट्ठा कर रही हैं. भारत इस प्रयोग का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है. लेकिन दिल्ली के आसपास के दो परिधान कारखानों में काम करने वाले मजदूरों ने इस निगरानी का जिस तरह विरोध किया, उसने एआई उद्योग की योजनाओं को झटका दिया है.

‘ओपनडेमोक्रेसी’ की एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्र में स्थित दो गारमेंट फैक्ट्रियों के कर्मचारियों को सिर पर छोटे कैमरे पहनने के लिए कहा गया. प्रबंधन ने उन्हें बताया कि इससे ग्राहकों को उनके काम की गुणवत्ता दिखाई जाएगी और भविष्य में ज्यादा ऑर्डर मिलने से उनकी आय बढ़ेगी. लेकिन मजदूरों को जल्दी ही शक हो गया कि असली मकसद कुछ और है.

एक युवा दर्जी अंकुश यादव और उसके साथियों ने कैमरों के मेमोरी कार्ड निकालकर अपने मोबाइल में रिकॉर्डिंग देखी. उन्हें पता चला कि कैमरे केवल हाथों की गतिविधियां ही नहीं, बल्कि उनकी बातचीत, काम करने का तरीका और आसपास की हर गतिविधि को लगातार तीन-तीन मिनट के वीडियो क्लिप में रिकॉर्ड कर रहे थे. मजदूरों को यह भी नहीं बताया गया था कि यह रिकॉर्डिंग किस उद्देश्य से की जा रही है.

रिपोर्ट के अनुसार, इन कैमरों का इस्तेमाल एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया जा रहा था ताकि भविष्य में रोबोट इंसानों की तरह सिलाई और अन्य जटिल काम करना सीख सकें. इस परियोजना के पीछे एगोलैब.एआई नामक स्टार्टअप था, जिसे बाद में बिल्ड एआई नाम की कंपनी ने खरीद लिया. कंपनी का दावा है कि वह इतिहास का सबसे बड़ा "इगोसेंट्रिक डेटा" संग्रह तैयार कर रही है. यानी ऐसे वीडियो जिनमें इंसान अपने हाथों से काम करते हुए दिखाई दें.

कंपनी ने फैक्ट्री मालिकों को मुफ्त "प्रोडक्टिविटी एनालिटिक्स" देने का प्रस्ताव भी दिया था. इन रिपोर्टों में यह बताया जाता था कि कर्मचारी कब खाली बैठे, कितनी देर आपस में बात करते रहे या भोजन के बाद उनकी उत्पादकता कितनी घटी. कंपनी के लिए यह डेटा एआई प्रशिक्षण का स्रोत था, जबकि फैक्ट्री प्रबंधन के लिए कर्मचारियों की निगरानी का नया साधन.

लेकिन मजदूरों ने इस प्रक्रिया को आसानी से स्वीकार नहीं किया. कई कर्मचारियों ने कैमरे बार-बार उतार दिए, कुछ ने पूरे समय पहनने से इनकार कर दिया और कुछ ने जानबूझकर रिकॉर्डिंग को बेकार बना दिया. उनका कहना था कि कैमरे सिर पर भारी लगते थे, गर्म हो जाते थे और लगातार निगरानी का एहसास कराते थे. कई मजदूरों ने अपने पर्यवेक्षकों से पूछा कि कैमरे क्यों लगाए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला.

रिपोर्ट में शामिल कई कर्मचारियों ने कहा कि अगर उन्हें पहले से बताया जाता कि उनके काम का इस्तेमाल रोबोटों को प्रशिक्षित करने के लिए होगा, तो वे कभी इसकी अनुमति नहीं देते. उनका सवाल सीधा था कि अगर भविष्य में रोबोट ही कपड़े सिलेंगे, तो इंसानों के लिए रोजगार कहां बचेगा.

तकनीकी विशेषज्ञ मानते हैं कि रोबोटिक्स क्षेत्र इस समय "डेटा संकट" से गुजर रहा है. वास्तविक दुनिया में इंसानों द्वारा किए जाने वाले काम का पर्याप्त वीडियो उपलब्ध नहीं है. इसलिए कंपनियां कारखानों, गोदामों और अन्य कार्यस्थलों में लगे कैमरों से यह डेटा जुटाने की कोशिश कर रही हैं. दूसरी ओर, श्रम अधिकारों और गोपनीयता के विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यह प्रक्रिया श्रमिकों की सहमति और अधिकारों की अनदेखी कर रही है. भारत में डेटा संरक्षण कानून के कई महत्वपूर्ण प्रावधान अभी लागू भी नहीं हुए हैं, जिससे ऐसे प्रयोग लगभग नियामकीय खालीपन में हो रहे हैं.

अंततः दोनों फैक्ट्रियों में यह प्रयोग केवल दो सप्ताह ही चल पाया. मजदूरों के लगातार विरोध, कैमरे पहनने से इनकार और हाल में वेतन वृद्धि को लेकर हुए आंदोलनों के बाद कंपनियों ने चुपचाप कैमरे हटा लिए. यह घटना दिखाती है कि एआई को आगे बढ़ाने के लिए केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि करोड़ों श्रमिकों के कौशल, श्रम और डेटा की भी जरूरत है. साथ ही यह सवाल भी उठाती है कि क्या भविष्य की एआई व्यवस्था इंसानों के सहयोग से बनेगी या उन्हीं के रोजगार और अधिकारों की कीमत पर.

(इस रिपोर्ट में शामिल श्रमिकों के नाम उनकी पहचान और सुरक्षा की दृष्टि से बदल दिए गए हैं.)

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