राकेश कायस्थ | सोबर्स कभी मरा नहीं करते

सत्तर के दशक में पैदा हुए हम जैसे भारतीय बच्चों के लिए गैरी सोबर्स एक जादुई किरदार थे. कुछ वैसे ही नायक, जैसा हमारे लिए जादूगर मेंड्रेक था.

सोबर्स मेरे दुनिया में आने से पहले ही अपना बीस साल का इंटरनेशनल करियर पूरा करके रिटायर हो चुके थे, लेकिन उनकी कहानियां लोक देवताओं की तरह भारतीय मध्यमवर्गीय घरों में गूंजा करती थीं.

आमतौर पर धीमी आवाज़ में बात करने वाले और भाव-भंगिमाओं के मामले में बेहद संयत मेरे पापा, जब भी हमें सोबर्स के छह छक्कों की कहानी सुनाते, एक बिल्कुल अलग कैरेक्टर बन जाते थे. ऐसा लगता था, उस वक्त वो स्वॉन्सी के मैदान पर खुद मौजूद थे और मैल्कम नैश की गेंदों को मैदान से बाहर भेजते गैरी सोबर्स को अपनी आंखों से देख रहे थे.

पापा बड़े गर्व से बताते थे कि उन्होंने उस टेस्ट मैच की पूरी कमेंट्री भी सुनी थी, जब सोबर्स ने कानपुर में भारत के खिलाफ 198 रन बनाए थे. अनदेखे और सिर्फ शब्दों के जरिये दृश्य बने सोबर्स का जादू कुछ ऐसा था कि मुझे अक्सर एक ओवर में छह छक्के लगाने के सपने आते थे.

थोड़ा बड़ा होकर जब मैं अकेले नाई की दुकान तक जाने लायक हुआ, तो वहाँ भी सोबर्स की कहानियाँ हमारा इंतज़ार कर रही थीं. 1983 में वर्ल्ड कप जीतकर लौटी भारतीय टीम की क्लाइव लॉयड एंड कंपनी तबियत से धुलाई कर रही थी. सैलून में चल रही कमेंट्री के साथ एक्सपर्ट कमेंट जोड़ते बुजुर्ग बतियाते थे, "गनीमत है, छह में तीन टेस्ट ड्रॉ करा लिये. अगर सोबर्स की टीम से खेलते, तो सारे मैच हारते."

सोबर्स बड़ा या ब्रैडमैन? ये बहस भी जोशीले क्रिकेट फैंस के बीच मैंने नाई की दुकान पर ही सुनी. बाद में जब सर गारफील्ड सोबर्स के बारे में ठीक से मालूम हुआ, तो पता चला कि वह चर्चा बिल्कुल जायज थी. क्रिकेट की दुनिया में बरसों तक केवल दो ही भगवान थे - ब्रैडमैन और सोबर्स. जिस दौर में टेस्ट क्रिकेट में 40 साल से ज्यादा का औसत असाधारण माना जाता था, उस दौर में 57 का एवरेज, 26 शतक और आठ हज़ार से ज्यादा रन. इतना ही नहीं, स्पिन और मीडियम पेस गेंदबाज़ी से 235 विकेट और 109 कैच भी.

पुराना दौर कुछ और था. तब टेस्ट क्रिकेट में 200 विकेट और 2000 रन का डबल किसी भी ऑलराउंडर के लिए एक महान उपलब्धि माना जाता था. सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में ऑलराउंडर्स की महानतम चौकड़ी यानी बॉथम, कपिल, इमरान और हैडली के आगमन से पहले टेस्ट क्रिकेट में सिर्फ दो ही हरफनमौला ऐसे थे, जिनके नाम टेस्ट क्रिकेट में 200 विकेट और 2000 रन का जादुई आंकड़ा दर्ज था.

गुजरते वक्त के साथ जब क्रिकेट ब्रॉडकास्टिंग के धंधे में पहुंचा, तो ब्रायन लारा के मुंह से वो पूरी कहानी सुनने का मौका मिला, जब 365 रन का असंभव रिकॉर्ड तोड़ने के बाद सर गारफील्ड सोबर्स ने लारा को भावुक अंदाज़ में गले लगाया था और फिर डिनर पर इनवाइट किया था.

सोबर्स वाकई दंतकथाओं के नायक थे. ये कहा जाता है कि अगर कोई बल्लेबाज़ नर्वस नाइनटीज़ में खेल रहा हो, तो वेस्टइंडीज के कप्तान रहते खुद गेंदबाज़ी के लिए आ जाते थे और उनकी मंशा यही होती थी कि सामने वाला बल्लेबाज़ सेंचुरी पूरी कर ले. सोबर्स की विदाई ने उनसे जुड़ी तमाम कहानियां आज फिर से ताजा कर दीं.

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