वंदिता मिश्रा: जंतर-मंतर के आलोक में भाजपा का आंतरिक असंतोष और कांग्रेस का सांगठनिक ठहराव
जंतर-मंतर पर हुए हालिया छात्र आंदोलन और युवा आक्रोश ने देश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों — सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस — के आंतरिक कामकाज, सांगठनिक चुनौतियों और वैचारिक कमजोरियों को उजागर कर दिया है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में वंदिता मिश्रा का यह आलेख विश्लेषण करता है कि कैसे इस आंदोलन के आलोक में भाजपा का आंतरिक असंतोष और कांग्रेस का सांगठनिक ठहराव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है.
भारतीय जनता पार्टी : बासीपन, आंतरिक असंतोष और नई चुनौतियाँ
वंदिता का मानना है कि केंद्र में तीसरे कार्यकाल के दौरान भाजपा में एक प्रकार की नीरसता और बासीपन देखा जा रहा है, जिससे समर्थकों के बीच भी बेचैनी है.
जनता से जुड़े महंगाई, भ्रष्टाचार, शिक्षा और रोज़गार जैसे ज्वलंत और पारंपरिक मुद्दे अब अधिक गंभीर रूप ले चुके हैं. विशेष रूप से परीक्षा पेपर लीक और नौकरियों की अनिश्चितता ने छात्रों और युवाओं को आंदोलित किया है. 12 वर्षों के शासन के बावजूद शिक्षा प्रणाली के आधुनिकीकरण के बजाय वैचारिक एजेंडे और संस्थानों के नियंत्रण पर ध्यान केंद्रित करने का खामियाज़ा अब पार्टी को भुगतना पड़ रहा है.
वैचारिक और सामाजिक मोर्चे पर रक्षात्मक मुद्रा: वंदिता के अनुसार, भाजपा 'मंडल' (जातिगत समीकरण/आरक्षण) और 'मंदिर' दोनों मुद्दों पर दबाव में दिख रही है. अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़े "चंदा चोरी" विवाद ने नेतृत्व को असहज किया है, वहीं यूजीसी नियमों व आरक्षण-विरोधी बहसों ने जाति के सवाल को दोबारा गर्म कर दिया है. इसके अलावा, "बुलडोजर न्याय" और भय के माहौल की भी आलोचनाएँ बढ़ रही हैं.
आंतरिक दरारें और केंद्रीकृत नियंत्रण: मोदी-शाह के मजबूत शीर्ष नेतृत्व के कारण दिल्ली में विरोध की आवाजें भले न उठें, लेकिन राज्यों में असंतोष साफ दिख रहा है. बिहार (बांकीपुर) में अपनी ही पार्टी की हार पर नेताओं की खुशी और सम्राट चौधरी के राज्याभिषेक से असहजता इसका प्रमाण है. पश्चिम बंगाल में अन्य दलों से आए नेताओं को शामिल करने से "टीएमसी-करण" का डर और पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ी है.
प्रोफेशनल कंसलटेंसियों पर निर्भरता: पार्टी के समर्पित 'कार्यकर्ताओं' के बजाय बाहरी राजनीतिक सलाहकारों (कंसलटेंट) को निर्णय लेने की प्रक्रिया में तरजीह दिए जाने से वरिष्ठ नेताओं में सुगबुगाहट है, जिससे पार्टी के आंतरिक मंच कमजोर हो रहे हैं.
कांग्रेस और राहुल गांधी: 'बिना पार्टी के नेता' का संकट
दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी की स्थिति बिल्कुल विपरीत है, जहाँ नेता (राहुल गांधी) अपनी ही पार्टी की सांगठनिक संरचना से आगे बढ़ते दिख रहे हैं.
राहुल गांधी की बढ़ती स्वीकार्यता: 'भारत जोड़ो यात्राओं' और लगातार जनमुद्दे (जैसे पेपर लीक, छात्र सुरक्षा और महंगाई) उठाने के कारण राहुल गांधी की सार्वजनिक छवि में सुधार हुआ है. जनता मानती है कि वे भाजपा के खिलाफ मजबूती से टिके हुए हैं.
पार्टी तंत्र से दूरी और अविश्वास: राहुल गांधी अक्सर अपनी पार्टी की औपचारिक संरचनाओं के बिना अकेले ही निर्णय लेते और विरोध दर्ज कराते दिखते हैं (जैसे पीएम आवास के बाहर धरना या थाने में 6 घंटे बैठना). वे नागरिक समाज और अपनी गैर-राजनीतिक टीम पर अधिक भरोसा करते हैं, न कि एनएसयूआई या यूथ कांग्रेस जैसी सांगठनिक इकाइयों पर.
सांगठनिक संकट और ठहराव: राहुल गांधी का अपनी ही पार्टी के पुराने तंत्र के प्रति अविश्वास कई राज्यों में सांगठनिक संकट को बढ़ा रहा है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी 2024 से भंग पड़ी है और उसका पुनर्गठन नहीं हुआ है, जबकि पंजाब में खुली गुटबाजी चरम पर है.
कुलमिलाकर, जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन ने भाजपा के भीतर पनप रहे असंतोष व शासन की सीमाओं को उजागर किया है, तो वहीं कांग्रेस के सांगठनिक ठहराव और राहुल गांधी के एकाकी नेतृत्व मॉडल की कमजोरियों को भी सामने ला दिया है. दोनों ही दलों को इस बदले हुए माहौल में अपनी-अपनी दिशा और कार्यशैली को नए सिरे से तलाशने की जरूरत है.

