ईंधन में आत्मनिर्भरता भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करे, कमजोर नहीं
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित अशोक गुलाटी और तन्मय अधिकारी के लेख में भारत के एथेनॉल कार्यक्रम और तेजी से बढ़ती चीनी कीमतों के बीच पैदा हुए खाद्य बनाम ईंधन के संकट को समझाया गया है. जुलाई के अंत से अगस्त के अंत तक चीनी की अखिल भारतीय औसत खुदरा कीमत करीब 45 रुपये प्रति किलो से बढ़कर लगभग 65 रुपये प्रति किलो हो गई, यानी एक महीने में करीब 44 प्रतिशत की बढ़ोतरी. सरकार ने इसके लिए व्यापारियों और चीनी मिलों द्वारा जमाखोरी को जिम्मेदार बताया है, लेकिन समस्या केवल सट्टेबाजी या जमाखोरी तक सीमित नहीं है. चीनी की आपूर्ति पहले ही कमजोर हो चुकी थी और त्योहारों के मौसम से पहले मांग बढ़ने वाली है.
चीनी की कीमतों में तेज उछाल के पीछे तीन दबाव
मौजूदा चीनी वर्ष की शुरुआत में देश के पास करीब 5 मिलियन टन शुरुआती स्टॉक था, जबकि पिछले साल यह करीब 8 मिलियन टन था. पिछले सीजन में कमजोर उत्पादन के कारण कैरी-ओवर स्टॉक कम रहा और बाजार के पास किसी नई आपूर्ति समस्या को संभालने के लिए पर्याप्त सुरक्षा भंडार नहीं बचा.
दूसरी समस्या 2025-26 में चीनी उत्पादन की है. शुरुआती अनुमान करीब 34.3 मिलियन टन था, लेकिन लाल सड़न और टॉप बोरर जैसी फसलों की बीमारियों से नुकसान के बाद सरकार ने इसे घटाकर 30.6 मिलियन टन कर दिया. जून तक करीब 27.35 मिलियन टन उत्पादन हुआ था. संशोधित लक्ष्य हासिल करने के लिए जुलाई से सितंबर के बीच करीब 3.25 मिलियन टन उत्पादन चाहिए था, जबकि पिछले छह वर्षों में इन तीन महीनों का औसत उत्पादन केवल करीब 0.38 मिलियन टन रहा है. ऐसे में उत्पादन का अनुमान और घटकर 28-29 मिलियन टन के आसपास रह सकता है.
तीसरा दबाव एथेनॉल कार्यक्रम से आया. आपूर्ति पहले से सीमित होने के बावजूद करीब 2.75 मिलियन टन चीनी एथेनॉल उत्पादन की ओर चली गई. भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग लंबे समय तक धीमी रही थी. 2013-14 में यह सिर्फ 1.53 प्रतिशत थी, जो 2019-20 में करीब 5 प्रतिशत और 2025-26 में 20 प्रतिशत तक पहुंच गई. समस्या यह है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग जिस तेजी से बढ़ी, उसके अनुरूप कच्चे माल की आपूर्ति नहीं बढ़ सकी. इससे ऊर्जा नीति और खाद्य बाजार सीधे एक-दूसरे के सामने आ गए.
त्योहारों से पहले आपूर्ति का दबाव बढ़ सकता है
त्योहारों का मौसम सामने है, जब चीनी की मांग सामान्य तौर पर बढ़ती है. वहीं नई गन्ने की आपूर्ति अक्टूबर के मध्य से पहले पर्याप्त मात्रा में बाजार में नहीं आएगी. इसका मतलब है कि आने वाले कई हफ्तों तक बाजार को मौजूदा स्टॉक पर ही निर्भर रहना होगा.
कम स्टॉक की वजह से चीनी की कीमतों पर दबाव बना हुआ है और अगर समय रहते आपूर्ति नहीं बढ़ाई गई तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं. सामान्य खुले बाजार में उत्पादन में कमी होने पर बढ़ी कीमतें आयात को प्रोत्साहित करतीं और बाजार धीरे-धीरे संतुलन की ओर बढ़ता. लेकिन भारत का चीनी क्षेत्र अत्यधिक नियंत्रित है. गन्ने की कीमत, चीनी की बिक्री, आयात-निर्यात और एथेनॉल के लिए कच्चे माल का आवंटन तक सरकार तय करती है. इसलिए जब पूरी वैल्यू चेन सरकारी नियंत्रण में हो तो आपूर्ति संकट और उससे पैदा होने वाली कीमतों की समस्या की जिम्मेदारी भी नीति-निर्माताओं पर आती है.
सरकार को अधिक चीनी आयात करनी चाहिए
सरकार ने अब तक एक मिलियन टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है. लेकिन यह कदम पर्याप्त नहीं माना जा रहा है. बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और त्योहारों से पहले स्टॉक को सुरक्षित स्तर तक पहुंचाने के लिए कम से कम 3-4 मिलियन टन रिफाइंड चीनी आयात करने की जरूरत बताई गई है.
इसके लिए रिफाइंड चीनी पर मौजूदा 100 प्रतिशत आयात शुल्क को घटाकर शून्य या अधिकतम 5 प्रतिशत किया जा सकता है. इससे घरेलू बाजार में अतिरिक्त चीनी पहुंचाई जा सकेगी और कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी.
एथेनॉल के लिए चीनी पर निर्भरता घटानी होगी
दूसरा तत्काल कदम एथेनॉल के कच्चे माल में बदलाव हो सकता है. जब चीनी का स्टॉक कम हो और उसकी कीमतें बढ़ रही हों, तब चीनी से एथेनॉल बनाने को काफी कम किया जाना चाहिए और वैकल्पिक कच्चे माल का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए.
भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई के पास बफर स्टॉक की जरूरत से काफी अधिक चावल मौजूद है. ऐसे अतिरिक्त स्टॉक का कुछ हिस्सा एथेनॉल संयंत्रों को दिया जा सकता है, लेकिन एफसीआई को इसके लिए कम से कम चावल का खरीद मूल्य जरूर वसूलना चाहिए. इससे चीनी पर दबाव कम होगा, हालांकि चावल को एथेनॉल में बदलने से खाद्य और ईंधन के बीच का टकराव पूरी तरह खत्म नहीं होगा.
मक्का एथेनॉल के लिए इससे बेहतर विकल्प हो सकता है. चावल और गन्ने की तुलना में मक्का अपेक्षाकृत कम पानी की मांग करता है और पर्यावरण पर भी कम दबाव डाल सकता है. भारत में पिछले कुछ वर्षों में मक्का उत्पादन बढ़ा है, लेकिन उत्पादकता करीब 3.5 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि अमेरिका में यह लगभग 11 टन प्रति हेक्टेयर है.
अगर बिना उत्पादन बढ़ाए मक्के का इस्तेमाल एथेनॉल के लिए तेजी से बढ़ाया गया तो मक्के की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसका असर पोल्ट्री, अंडे और दूध की कीमतों पर भी पड़ेगा, क्योंकि मक्का इन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण पशु आहार है. इसलिए चीनी की जगह चावल या मक्का इस्तेमाल करना खाद्य और ईंधन के बीच की समस्या को खत्म नहीं करता.
एथेनॉल नीति को फिर से संतुलित करने की जरूरत
एक अन्य विकल्प घरेलू खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ने की स्थिति में सीधे एथेनॉल आयात करना हो सकता है. दूसरा विकल्प एथेनॉल ब्लेंडिंग को अस्थायी रूप से 20 प्रतिशत से घटाकर करीब 15 प्रतिशत करना है.
इस पूरी स्थिति से यह सवाल उठता है कि भारत के एथेनॉल कार्यक्रम को नए सिरे से देखने की जरूरत है. अलग-अलग कच्चे माल से एथेनॉल बनाने पर वास्तविक ऊर्जा लाभ कितना है, इसका स्पष्ट आकलन होना चाहिए. चीनी, चावल या मक्का से एथेनॉल की मात्रा पहले से तय करने की बजाय तेल विपणन कंपनियों को आर्थिक रूप से सबसे बेहतर स्रोत चुनने की अधिक स्वतंत्रता दी जा सकती है, लेकिन खाद्य सुरक्षा, किसानों और पर्यावरण के लिए स्पष्ट सुरक्षा उपाय जरूरी होंगे.
सरकार को हर कच्चे माल के आवंटन को नियंत्रित करने की बजाय रणनीतिक भंडार और खाद्य सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. तत्काल जरूरत पर्याप्त मात्रा में चीनी आयात कर स्टॉक बढ़ाने, कुछ समय के लिए एथेनॉल उत्पादन में चीनी का इस्तेमाल घटाने और वास्तविक अतिरिक्त अनाज उपलब्ध होने पर ही एफसीआई के स्टॉक का इस्तेमाल करने की है. जरूरत पड़ने पर आयातित एथेनॉल को सुरक्षा विकल्प के रूप में रखा जा सकता है.
भारत के एथेनॉल कार्यक्रम ने पिछले कुछ वर्षों में बड़ी प्रगति की है. 2019-20 में करीब 5 प्रतिशत ब्लेंडिंग से 2025-26 में 20 प्रतिशत तक पहुंचना इसका प्रमाण है. लेकिन इतनी तेजी से बढ़ी मांग ने कच्चे माल की उपलब्धता पर दबाव भी बढ़ाया है.
इसलिए ईंधन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य ऐसा नहीं होना चाहिए जो देश को भोजन और ईंधन में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर करे. ईंधन में आत्मनिर्भरता तभी सार्थक है जब वह भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करे, उसे कमजोर नहीं. खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए एथेनॉल नीति का व्यापक पुनर्मूल्यांकन और पुनर्संतुलन अब जरूरी हो गया है.

