प्रभात पटनायक | हाथ की सफाई का खेल
अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के ऐतिहासिक महत्व और हाल ही में इसके स्थान पर लाए गए नए कानून ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी वीबी-जी राम जी के प्रभावों की आलोचनात्मक समीक्षा की है.
उनका कहना है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) स्वतंत्रता के बाद का एक ऐतिहासिक कानून था. इसने भारतीय संविधान की एक बड़ी कमी को दूर किया, जिसने नागरिकों को राजनीतिक अधिकार तो दिए थे लेकिन कोई मौलिक आर्थिक अधिकार नहीं दिया था. मनरेगा ने प्रत्येक ग्रामीण परिवार को प्रति वर्ष 100 दिनों के अकुशल रोजगार की गारंटी दी. यदि मांग के 15 दिनों के भीतर काम नहीं दिया जाता था, तो आवेदक को बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार था. यह योजना सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) थी और किसी विशेष वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं थी. कोरोना महामारी जैसे विपत्ति के दौर में, जब लाखों प्रवासी मजदूर शहरों से गांवों की ओर लौटे, तब मनरेगा उनके लिए आजीविका का सबसे बड़ा सहारा बनी.
मनरेगा को 21 दिसंबर 2004 को संसद में पेश किया गया था और गहन संसदीय बहस व स्थायी समिति के परामर्श के बाद 23 अगस्त 2005 को सर्वसम्मति से पारित किया गया. 2 फरवरी 2006 को लागू हुए इस कानून को इसकी निष्पक्ष प्रक्रिया और सर्वसम्मत स्वीकृति के कारण एक ‘अर्ध-संवैधानिक’ दर्जा प्राप्त माना जाता था, जिससे यह धारणा बनी थी कि इसे कोई भी सरकार आसानी से निरस्त नहीं कर सकती.
पटनायक के अनुसार, वर्तमान राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने मनरेगा को निरस्त करके उसके स्थान पर विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी ‘वीबी-जी राम जी’ लागू कर दिया है.
यह नया विधेयक 16 दिसंबर 2025 को पेश किया गया, 18-19 दिसंबर 2025 को संसद से पारित हुआ और 1 जुलाई 2026 से प्रभावी रूप से लागू हुआ. मनरेगा के 8 महीने के गहन विचार-विमर्श के मुकाबले इसे मात्र कुछ दिनों में बिना किसी विस्तृत चर्चा के जल्दबाज़ी में पारित कर दिया गया.
वह लिखते हैं कि नए कानून में मांग-आधारित अधिकार का अंत हो गया है. मनरेगा के तहत कोई भी ग्रामीण नागरिक कहीं भी काम मांग सकता था. इसके विपरीत, ‘वीबी-जी राम जी’ केवल केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित किए गए चुनिंदा क्षेत्रों में ही लागू होगा, जिससे ‘रोजगार का कानूनी अधिकार’ समाप्त हो गया है.
इस कानून में वित्तीय भार राज्यों पर हस्तांतरित हो गए हैं. मनरेगा में केंद्र सरकार लगभग 90% खर्च (100% अकुशल मजदूरी + 75% सामग्री लागत) वहन करती थी और राज्यों का हिस्सा केवल 10% था. नए कानून में केंद्र ने राज्यों का हिस्सा बढ़ाकर 40% कर दिया है, जिससे राज्यों (विशेषकर गैर-एनडीए शासित) पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा और योजना के क्रियान्वयन में रुकावट आएगी.
मनरेगा में ग्राम सभाओं और राज्य सरकारों के पास जो अधिकार थे, उन्हें अब केंद्र सरकार के पास केंद्रित कर दिया गया है. केंद्र अब योजना को नियंत्रित करना चाहता है, लेकिन इसका वित्तीय बोझ राज्यों पर डाल रहा है.
यद्यपि सरकारी प्रचार में ‘वीबी-जी राम जी’ को 125 दिनों के रोजगार का वादा करके मनरेगा (100 दिन) से बेहतर बताया जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि 125 दिनों का यह प्रावधान केवल केंद्र द्वारा तय किए गए सीमित क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गया है.
लागू होने के पहले ही महीने (जुलाई 2026) के आंकड़ों से पता चलता है कि जुलाई 2025 की तुलना में रोजगार के मानव-दिवस 153.3 मिलियन से घटकर 76.7 मिलियन (लगभग आधे) रह गए हैं. वहीं, काम मांगने वाले परिवारों की संख्या में भी 51.45% की भारी गिरावट दर्ज की गई है.
निष्कर्ष यह है कि नए कानून ‘वीबी-जी राम जी’ के लागू होने से ग्रामीण भारत के श्रमिकों ने अपनी मेहनत से जो रोजगार का कानूनी और सार्वभौमिक अधिकार हासिल किया था, वह उनसे छीन लिया गया है.
(प्रभात पटनायक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली के आर्थिक अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर एमेरिटस है. यह उनके लेख का हिंदी में अनूदित सारांश है.)

