मोदी के छोटे भाई की मांसाहार न करने की एक अपील से बंगाल में आक्रोश, दुर्गा पूजा पंडाल के पीछे नॉनवेज खाने वालों को पाखंडी कहा था

भोजन के विषय पर बंगाली समाज को नीचा दिखाए जाने पर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है. कथा वाचक धीरेन्द्र शास्त्री, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना छोटा भाई बताया था, की एक अपील से पूरे बंगाल में नाराजगी है.  

देवराज मित्रा की रिपोर्ट के अनुसार, दुर्गा पूजा पंडालों के पास 'पश्चिम बंगाल के हिंदुओं' से मांसाहार न करने की शास्त्री की अपील के खिलाफ ऐसा अभूतपूर्व विरोध देखने को मिला है, जिसने बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद से गहरी हुई राजनीतिक और सामाजिक खाई को भी पाट दिया है. राज्य भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य, जिन्हें कुछ ही दिन पहले बंगाल दौरे के दौरान मध्य प्रदेश के बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के सामने श्रद्धा से झुकते देखा गया था, उन्हें बचाव की मुद्रा में आना पड़ा. उन्होंने शास्त्री की अपील को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि बंगालियों को यह तय करने का पूरा अधिकार है कि वे क्या खाएं.

विपक्षी दलों ने न केवल इस "बाबा" पर निशाना साधा है, बल्कि यह आरोप भी लगाया है कि भाजपा ऐसे माहौल को बढ़ावा दे रही है जहाँ इस तरह की बातें बेखौफ कही जा सकती हैं. शास्त्री की इस अपील का सबसे तीखा विरोध ज़मीनी स्तर से आया है.

दक्षिण कोलकाता की एक प्रमुख दुर्गा पूजा के वरिष्ठ आयोजक ने कहा, "मैंने तथाकथित बाबाजी के भाषण की एक क्लिप देखी. दर्शक दीर्घा में कई लोगों ने उनकी बात के समर्थन में अपने मोबाइल की फ्लैशलाइट जला दी. मैं जानना चाहता हूँ कि वे लोग कौन हैं. इससे पता चलता है कि वे हमारी संस्कृति से कितने अनभिज्ञ हैं." उत्तर कोलकाता के हाथीबागान सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति के मुख्य आयोजक शाश्वत बासु ने कहा: "मैं बयान का जवाब देकर इसे तूल नहीं देना चाहता. कोई बाहरी व्यक्ति जो चाहे कह सकता है. समन्वय बैठक में मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे उम्मीद करते हैं कि हम हमेशा की तरह इस बार भी पूरी भव्यता के साथ पूजा का आयोजन करेंगे." बासु पूजा आयोजकों की शीर्ष संस्था 'फोरम फॉर दुर्गोत्सव' के उपाध्यक्ष भी हैं.

सोशल मीडिया पर हस्तियों से लेकर आम लोगों तक के ऐसे पोस्ट भरे पड़े हैं, जिनमें शास्त्री की खिंचाई की जा रही है.

शास्त्री ने हावड़ा में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था: "मुझे पश्चिम बंगाल की एक बात पसंद नहीं है. दुर्गा पूजा पंडालों के पीछे मांसाहारी भोजन खाया जाता है. गंदा भोजन पकाया जाता है. इस नवरात्रि, कोलकाता के हिंदुओं को जागना चाहिए और ऐसे लोगों को बहिष्कृत (बहिष्कार) करना चाहिए. वे धार्मिक नहीं कहे जा सकते. वे पाखंडी हैं."

मित्रा के मुताबिक, बंगाल खान-पान को लेकर किसी भी प्रकार के फरमान को स्वीकार करने के लिए नहीं जाना जाता.

1960 के दशक के गंभीर खाद्य संकट के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र सेन ने बंगालियों से कम चावल खाने का प्रसिद्ध आग्रह किया था. भोजन की कमी से उपजे असंतोष और खान-पान पर उनके उपदेश उन कारणों में शामिल थे, जिनके कारण 1967 में कांग्रेस की हार हुई और राज्य में वाम मोर्चा के उभार का रास्ता साफ हुआ.

शास्त्री के इस बयान के खिलाफ कोलकाता पुलिस में कम से कम पांच शिकायतें दर्ज कराई गई हैं, जिनमें बंगाली समाज को बांटने की कोशिश का आरोप भी शामिल है.

समाजशास्त्रियों ने इस विरोध को बंगाली संस्कृति के उस मूल दृष्टिकोण से जोड़ा है, जिसमें देवी को केवल एक पूजनीय मूर्ति मानने के बजाय परिवार की बेटी के रूप में देखा जाता है.

कोलकाता के एक राजनीतिक विश्लेषक और शिक्षक मैदुल इस्लाम ने कहा, "भाजपा और उसके वैचारिक स्रोत आरएसएस की विचारधारा उत्तर भारतीय पितृसत्तात्मक सोच में रची-बसी है. उनके पास महिला सांस्कृतिक प्रतीकों की कमी है. देवी के प्रति उनकी भक्ति बंगालियों के दुर्गा को एक प्रिय बेटी के रूप में स्नेह देने के तरीके से भिन्न है." मैदुल ने आगे कहा, "आरएसएस की बंगाल को एक और उत्तर भारतीय राज्य में बदलने की दीर्घकालिक योजना है. भाजपा की चुनावी सफलताओं ने बंगाल पर उत्तर भारतीय सांस्कृतिक वर्चस्व थोपने के प्रयासों को बल दिया है. चाहे सूक्ष्म रूप में हो या आक्रामक रूप में, ऐसे प्रयास आगे भी होते रहेंगे. लेकिन उन्हें यहाँ इसी तरह के प्रतिरोध का सामना भी करना पड़ेगा."

उत्तर भारत में देवी को मुख्य रूप से एक सर्वशक्तिमान ब्रह्मांडीय शक्ति या बुराई पर महान विजय से जुड़ी एक दयालु, कल्याणकारी संरक्षिका के रूप में पूजा जाता है. नवरात्रि, जिसका एक हिस्सा दुर्गा पूजा के साथ आता है, नौ दिनों तक तपस्या, संयम और पूर्ण सात्विक (शाकाहारी) रहने की मांग करता है.

बंगाल में देवी 'उमा' हैं — वह प्रिय बेटी जो अपने बच्चों के साथ शरद ऋतु की छुट्टियों में अपने मायके (माता-पिता के घर) आती है.

बंगाली दुर्गा पूजा एक खुले, समाज-व्यापी उत्सव के रूप में काम करती है, जहाँ मछली और मांस सहित पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेना उत्सव का एक अटूट हिस्सा है.

शहर भर के मांस विक्रेता इस बात की तस्दीक करेंगे कि दुर्गा पूजा की नवमी का दिन हर साल उनका सबसे व्यस्त दिन होता है. नवमी नवरात्रि का अंतिम दिन होता है, यह ऐसा समय है जब भारत के बड़े हिस्सों में मांसाहार पूरी तरह वर्जित होता है.

एक अन्य समाजशास्त्र के शिक्षक ने, नाम न छापने की शर्त पर, कहा कि शास्त्री की अपील के लहजे और सत्ता में बैठे लोगों से उनकी निकटता के कारण लोगों में व्यापक गुस्सा फैला है.

शिक्षक ने कहा, "उनकी अपील विनम्र नहीं थी. उन्होंने अपने अनुयायियों को उन लोगों को बहिष्कृत करने के लिए उकसाया जो दुर्गा पूजा के दौरान मछली और मांस खाते हैं. उन्होंने उन्हें पाखंडी कहा. यह काफी आक्रामक भाषण था. वही व्यक्ति शीर्ष भाजपा नेताओं के साथ घुलते-मिलते देखा गया. इससे एक गलत संदेश गया."

मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने एक राज्य सभागार में शास्त्री के लिए रात्रिभोज का आयोजन किया था, जिसमें कई नेता शामिल हुए थे. सुवेंदु के कार्यालय ने 'एक्स' पर इस कार्यक्रम की तस्वीरें भी पोस्ट की थीं.

जाहिर है, जनता के इस आक्रोश को देखते हुए भाजपा ने तुरंत कदम उठाए. संकट को टालने के लिए पार्टी के कई नेताओं ने एक-एक करके कथावाचक के बयान से खुद को अलग कर लिया. समिक भट्टाचार्य ने पत्रकारों से कहा, "हम जो खाते हैं, वह हमारी पसंद है. बंगाल की खाद्य संस्कृति विविधता से भरी है और हर किसी को अपनी पसंद का पालन करने की आजादी है. क्या बंगाली मछली और मटन खाना छोड़ देंगे? यहाँ तक कि स्वामी विवेकानंद ने भी इसे स्वीकार किया था. किसी भी संत या नेता को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि आपको क्या खाना चाहिए."

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