‘पिंजरे में कैद पंछी’ की तरह: मतदाता सूची से नाम कटने के बाद बंगाली मुस्लिम मजदूर छत्तीसगढ़ में हफ्तों तक अवैध रूप से हिरासत में रहे
आर्टिकल-14 में संहति बनर्जी ने लिखा है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद मतदाताओं के नाम हटने का असर अब मतदान के अधिकार से आगे बढ़ गया है. मुर्शिदाबाद के 23 बंगाली भाषी मुस्लिम प्रवासी मजदूरों को छत्तीसगढ़ में बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में हिरासत में लिया गया. परिजनों ने उन्हें पर्याप्त कानूनी सहायता नहीं मिलने और लंबे समय तक उनसे संपर्क न हो पाने की शिकायत की. इस मामले ने नागरिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
4 सितंबर 2026 को रायपुर पुलिस ने छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में काम करने वाले इन 23 मजदूरों को पूछताछ के लिए बुलाया. रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 में पश्चिम बंगाल में हुए एसआईआर के दौरान इन सभी के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे. पुलिस के संदेह का आधार यही बताया गया. 18 सितंबर को 19 मजदूरों को रिहा कर दिया गया. इनके नाम अप्रैल में पुनरीक्षण के बाद सुनवाई की प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची में बहाल हो गए थे. इनमें से कम से कम तीन लोगों ने अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव में मतदान भी किया था. बाकी चार मजदूरों को अपील लंबित होने के कारण हिरासत में रखा गया और वे 7 अक्टूबर को रिहा हुए.
गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर सवाल
मजदूरों को पहले सिरगिट्टी पुलिस थाने, फिर बिलासपुर के सिविल लाइंस थाने और अंततः रायपुर स्थित संदिग्ध विदेशी नागरिकों के लिए बने हिरासत केंद्र ले जाया गया. परिवारों का कहना है कि उन्हें कई दिनों तक अपने पतियों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. मजदूरों के मुताबिक, उन्हें बताया गया कि वे संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिक हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि हिरासत के दौरान गिरफ्तारी का ज्ञापन नहीं बनाया गया, मजदूरों को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया और उन्हें कानूनी सहायता भी नहीं मिली. सर्वोच्च न्यायालय ने 1996 के डी. के. बसु मामले में गिरफ्तारी के दौरान पालन किए जाने वाले सुरक्षा उपाय तय किए थे.
कलकत्ता हाई कोर्ट में 6 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने सवाल उठाया कि जब चार मजदूरों की मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील लंबित है, तो छत्तीसगढ़ का विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय उनकी राष्ट्रीयता कैसे तय कर सकता है. उन्होंने कहा, “आप लोगों की जिंदगी से खेल रहे हैं.”
परिवारों पर अनिश्चितता का असर
मुर्शिदाबाद के छबघाटी गांव में मजदूरों के परिवारों ने लंबे इंतजार, आर्थिक संकट और अपमान की पीड़ा बताई. अफसाना बेगम के पति अलाउद्दीन शेख हिरासत में थे. उन्होंने कहा कि 14 दिन उन्हें 14 साल जैसे लगे. सबेरा खातून ने बताया कि उनके पति लल्टू शेख ने फोन पर कहा था कि अब उनसे संपर्क नहीं हो पाएगा.
मजदूरों का कहना है कि वे वर्षों से छत्तीसगढ़ में घूम-घूमकर घरेलू सामान बेचते रहे हैं. वे पुलिस सत्यापन के लिए आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज जमा करते थे. इसके बावजूद उन्हें हिरासत में लिया गया.
मतदाता सूची से कल्याणकारी योजनाओं तक
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए या उन्हें जांच के लिए लंबित रखा गया. इनमें मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी राज्य की आबादी में उनकी हिस्सेदारी से अधिक बताई गई है.
इसका असर सरकारी योजनाओं पर भी पड़ा. रिपोर्ट में आरोप है कि राज्य की भाजपा सरकार ने मतदाता सूची की स्थिति को नागरिकता से जोड़ते हुए अन्नपूर्णा योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पात्रता पर सवाल उठाए. सर्वोच्च न्यायालय ने 17 जून को स्पष्ट किया था कि एसआईआर के बाद मतदाता सूची से नाम हटने का अर्थ स्वतः नागरिकता समाप्त होना नहीं है.
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा कि किसी व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण से नहीं किया जा सकता. संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 समानता, देश में स्वतंत्र रूप से आने-जाने और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों की रक्षा करते हैं.
इस मामले ने उन प्रवासी मजदूरों की असुरक्षा उजागर की है, जिन्हें अपनी पहचान और नागरिकता बार-बार साबित करनी पड़ रही है. सवाल यह है कि मतदाता सूची में नाम हटने के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित करने से पहले क्या कानूनी प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों का पालन किया जा रहा है.

