मोहम्मद अयूब | भूगोल से बंधे, राजनीति से बंटे

इस अटकलबाजी के बीच कि बांग्लादेश के हाल ही में चुने गए प्रधानमंत्री तारिक रहमान (जो बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी-बीएनपी) के अध्यक्ष भी हैं) नवंबर या दिसंबर में नई दिल्ली का दौरा करेंगे, यह आकलन करने का समय आ गया है कि भारत-बांग्लादेश संबंधों की स्थिति क्या है और दोनों देशों के बीच समस्याओं की जड़ें कहाँ निहित हैं.

मोहम्मद अयूब के मुताबिक दोनों मुल्कों के बीच मौजूदा तनाव के बीज 1971 के मुक्ति संग्राम में ही निहित हैं. शुरुआत से ही, भारत के प्रति बांग्लादेशी अभिजात वर्ग (एलीट) का रवैया कृतज्ञता (आभार) और नाराजगी के बीच झूलता रहा है—अपने देश की मुक्ति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका के प्रति आभार और इस बात की नाराजगी कि भारत को एक मुक्तिदाता की भूमिका निभानी पड़ी—एक ऐसी भूमिका जिसे उन्हें स्वयं निभाना चाहिए था.

एक अंतर्विरोध

अयूब लिखते हैं कि राष्ट्र उन आख्यानों (नैरेटिव) को संजोकर रखते हैं जिनमें वे अपनी मुक्ति के मुख्य रचयिता स्वयं होते हैं. बांग्लादेश इसका अपवाद नहीं है. मुक्ति वाहिनी के योगदान के बावजूद, पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक सैन्य झटका भारत द्वारा दिया गया था. जो शुरुआत में अपार आभार का स्रोत था, वह समय बीतने के साथ गहरी असहजता का कारण बन गया.

इसके अलावा, शुरुआत से ही ढाका को इस बात की चिंता थी कि बांग्लादेश के प्रति भारत की नीति अपने पड़ोसी हिंदू-बहुसंख्यक पश्चिम बंगाल के माध्यम से संचालित होगी, जिसके बांग्लादेश के साथ मजबूत सांस्कृतिक और भाषाई संबंध हैं, जो बांग्लादेश की स्वतंत्र पहचान के विकास के लिए खतरा बन सकते हैं. मुक्ति संग्राम के तुरंत बाद खुली सीमाओं ने विभाजन से पहले के बंगाल में हिंदू 'भद्रलोक' (कुलीन वर्ग) के सामाजिक-आर्थिक प्रभुत्व की यादों को भी ताजा कर दिया था.

यह इस तथ्य से और जटिल हो गया कि बांग्लादेश वस्तुतः भारत से घिरा हुआ है, और इसके साथ 4,000 किलोमीटर से अधिक की सीमा साझा करता है. इसकी प्रमुख नदियाँ भारत से होकर बहती हैं या वहीं से निकलती हैं. इसकी आर्थिक और रणनीतिक गुंजाइश भूगोल द्वारा सीमित प्रतीत होती थी. परिणामस्वरूप, भारतीय प्रभुत्व का डर बांग्लादेशी राष्ट्रवाद का एक महत्वपूर्ण घटक बन गया.

ढाका और नई दिल्ली के बीच 'हनीमून' (मधुर संबंध) वास्तव में बहुत छोटा था. शेख मुजीब और इंदिरा गांधी के बीच काफी सद्भाव था. लेकिन मुजीब के बाद आने वाली सरकारों ने जानबूझकर बांग्लादेश को भारत से दूर कर लिया. जियाउर रहमान के तहत, बांग्लादेशी राष्ट्रवाद को भाषाई राष्ट्रवाद के विपरीत स्पष्ट रूप से इस्लामी शब्दों में फिर से परिभाषित किया गया, जिसने मुक्ति आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान किया था.

ढाका की विदेश नीति

इसके महत्वपूर्ण विदेश नीति परिणाम हुए. भारत को संतुलित करने के लिए ढाका ने पाकिस्तान, चीन और अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध तलाशने शुरू किए. नई दिल्ली जिसे अक्सर अकारण भारत-विरोधी रुख मानती थी, वह ढाका के दृष्टिकोण से एक अत्यधिक शक्तिशाली पड़ोसी की छाया में रहने वाले बहुत छोटे राज्य द्वारा अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का दावा था.

यह पैटर्न बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में गहराई से समा गया. अवामी लीग 1971 की धर्मनिरपेक्ष और बंगाली-राष्ट्रवादी विरासत से जुड़ी रही और आम तौर पर भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों के पक्ष में रही. बीएनपी और उसके सहयोगी नई दिल्ली को लेकर बहुत अधिक संशय में थे. परिणामस्वरूप, भारत केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं रह गया; भारत के प्रति दृष्टिकोण बांग्लादेश की राष्ट्रीय पहचान की लड़ाई का हिस्सा बन गया.

लेकिन इस सफलता में बाद की प्रतिक्रिया के बीज भी निहित थे. भारत तेजी से अपने हितों को केवल बांग्लादेश के साथ नहीं बल्कि शेख हसीना और अवामी लीग के साथ जोड़ने लगा. जैसे-जैसे उनकी सरकार के तेजी से तानाशाहीपूर्ण चरित्र को लेकर बांग्लादेश के भीतर आलोचना बढ़ी, नई दिल्ली को व्यापक रूप से यह माना जाने लगा कि वह बांग्लादेश के लोकतांत्रिक विकास से ऊपर अपने सुरक्षा हितों को प्राथमिकता दे रही है.

इसलिए, अगस्त 2024 में शेख हसीना का तख्तापलट न केवल सरकार में बदलाव था, बल्कि भारतीय नीति के लिए एक गहरा संकट भी था. भारत में उनका पलायन इस संदेह को पुष्ट करता है कि नई दिल्ली उस राजनीतिक व्यवस्था का बाहरी स्तंभ थी जिसे अभी-अभी उखाड़ फेंका गया है. उन्हें प्रत्यर्पित (पुनः भेजने) करने से भारत के लगातार इनकार ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि हसीना का सवाल एक बड़ा द्विपक्षीय अड़चन बना हुआ है.

आगे की राह

रहमान का निर्वाचन और फरवरी 2026 में बीएनपी की सत्ता में वापसी ने एक नया अध्याय खोला है. नई दिल्ली और ढाका दोनों के पास स्थायी अलगाव से बचने के ठोस कारण हैं, और कार्यात्मक जुड़ाव फिर से शुरू हो गया है. लेकिन पर्याप्त आपसी संदेह अभी भी द्विपक्षीय संबंधों को परेशान कर रहा है.

नई दिल्ली को संबंधों के इस उतार-चढ़ाव भरे इतिहास से जो सबक सीखना चाहिए, वह यह है कि भारत यह उम्मीद नहीं कर सकता कि 1971 के प्रति कृतज्ञता बांग्लादेशी विदेश नीति का स्थायी आधार बनी रहेगी. कृतज्ञता एक क्षणिक भावना है; राष्ट्रीय हित—विशेषकर जब वे राष्ट्रीय पहचान के मुद्दों से जुड़े हों—स्थायी होते हैं.

वास्तव में, बार-बार बांग्लादेश की मुक्ति में भारत की भूमिका का हवाला देना उलटा पड़ सकता है क्योंकि यह ठीक उसी बांग्लादेशी मनोवैज्ञानिक आघात को मजबूत करता है जिसने शुरुआत से ही संबंधों को परेशान किया है.

जहाँ तक ढाका का सवाल है, वह भूगोल को नकार नहीं सकता. बीजिंग, इस्लामाबाद या वाशिंगटन के साथ कोई भी संबंध उस देश के साथ एक व्यवहार्य रिश्ते का विकल्प नहीं हो सकता जो बांग्लादेश को तीन तरफ से घेरता है, अपनी प्रमुख नदी प्रणालियों को साझा करता है और इसकी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए अनिवार्य है.

अयूब का मानना है कि भारत को अपनी भारी-भरकम ताकत का इस्तेमाल संयम और संवेदनशीलता के साथ करना सीखना चाहिए और अपने छोटे पड़ोसी के प्रति दिखाई जाने वाली किसी भी उदारता के लिए—विशेषकर नदी के पानी के बंटवारे पर—पारस्परिकता की मांग करने से बचना चाहिए. बांग्लादेश को यह पहचानना चाहिए कि रणनीतिक स्वायत्तता को भारत के प्रति घुटने के बल प्रतिक्रिया वाले (नी-जर्क) विरोध के रूप में परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है.

तभी दोनों देश अपनी सबसे महत्वपूर्ण विरासत को सुरक्षित रखते हुए अंततः अतीत के बोझ से आगे बढ़ सकते हैं: यह पहचान कि उनकी सुरक्षा और स्थिरता आपस में अटूट रूप से जुड़ी हुई है.

(मोहम्मद अयूब मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध के यूनिवर्सिटी डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर एमेरिटस हैं. अंग्रेजी में मूल लेख यहां भी पढ़ा जा सकता है)

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