विचारों पर व्यंग्य | भारत में प्रदर्शनकारियों के लिए जरूरी दस्तावेज: कृपया जन्म प्रमाणपत्र साथ रखना न भूलें!

'साऊथ फर्स्ट' में पीवी कोंडल राव लिखते हैं कि जेन जी से भारत को भविष्य की ओर ले जाने की उम्मीद की जाती है. लेकिन जब वह अपने देश में सत्ता से सवाल करती है, तो उसे पता चल सकता है कि स्वतंत्र रूप से सोचने के लिए भी दस्तावेजों के विभाग से पहले अनुमति लेनी पड़ती है.

एक समय था, जब विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाला युवा अपने साथ एक पोस्टर, पानी की बोतल और शायद बैग में रखी कोई क्रांतिकारी कविता लेकर चलता था. उसके पास सत्ता को चुनौती देने का साहस होता था.

आज समझदार जेन जी प्रदर्शनकारी को अपने साथ कुछ अलग चीजें रखनी पड़ सकती हैं: जन्म प्रमाणपत्र, नागरिकता का प्रमाण, विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड और, यदि संभव हो, तो कोई ऐसा सरकारी अधिकारी जो प्रमाणित कर सके कि ये सभी दस्तावेज असली हैं.

उस दौर में आपका स्वागत है, जहां सवाल उठाने के अधिकार से पहले सवाल पूछने वाले की पहचान और पात्रता की जांच हो सकती है.

कल्पना कीजिए कि विश्वविद्यालय के छात्रों का एक समूह दिल्ली के जंतर-मंतर की ओर मार्च कर रहा है. वे जवाबदेही, न्याय और किसी शक्तिशाली सार्वजनिक पदाधिकारी के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. उनके नारे बुलंद हैं, तर्क तीखे हैं और पोस्टर खूबसूरती से तैयार किए गए हैं. तभी एक मददगार अधिकारी उनके आंदोलन के बीच आ जाता है.

“आगे बढ़ने से पहले कृपया यह साबित कीजिए कि आपका जन्म हुआ था.”

छात्र अविश्वास से उसकी ओर देखते हैं.

“आपका जन्म प्रमाणपत्र, कृपया.”

एक छात्र डिजिटल कॉपी निकालता है. दूसरा सरकारी पोर्टल पर खोजबीन करने लगता है. तीसरा घबराकर घर फोन करता है और माता-पिता से करीब दो दशक पहले जारी प्रमाणपत्र ढूंढने को कहता है. चौथा लोकतांत्रिक जवाबदेही की मांग वाला पोस्टर लेकर आया था, लेकिन उसे पता चलता है कि दिन की सबसे जरूरी मांग एक फोटोकॉपी की है.

प्रदर्शन अस्थायी रूप से रोक दिया जाता है. इसलिए नहीं कि सरकार ने सवालों का जवाब दे दिया है, बल्कि इसलिए कि प्रदर्शनकारी कागजी कार्रवाई पूरी नहीं कर पाए हैं.

भारत की जेन जी के लिए भविष्य में काम का बंटवारा कुछ ऐसा हो सकता है: एक हाथ में संविधान और दूसरे हाथ में उन दस्तावेजों की फाइल, जो साबित करती है कि उसे संविधान का हवाला देने का अधिकार है.

व्यंग्य से आगे

इस विडंबना को नजरअंदाज करना मुश्किल है. डिजिटल पहचान, ऑनलाइन परीक्षाओं, तत्काल भुगतान और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के दौर में पली-बढ़ी पीढ़ी को शायद अपने अस्तित्व का चलता-फिरता अभिलेखागार बनना पड़े. सरकार से उसके कामकाज का हिसाब मांगने से पहले युवा नागरिक से उसके जन्म से जुड़ी हर जानकारी का हिसाब मांगा जा सकता है.

और विश्वविद्यालय की डिग्री का क्या?

यहां व्यंग्य को एक अतिरिक्त शैक्षणिक उपाधि मिल जाती है. यदि शैक्षणिक प्रमाणपत्रों को विश्वसनीयता की अंतिम कसौटी माना जाना है, तो क्या यही मानक प्रदर्शन स्थल पर खड़े छात्र से लेकर सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति तक सभी पर लागू नहीं होना चाहिए?

भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्वविद्यालयी डिग्रियों को सार्वजनिक करने और उनकी प्रामाणिकता को लेकर सवाल उठते रहे हैं. इन दस्तावेजों से जुड़े राजनीतिक और कानूनी विवादों ने अलग-अलग तर्कों को जन्म दिया है. फिर भी बड़ा सवाल असहज करने वाला है: यदि किसी युवा नागरिक की शैक्षणिक योग्यता को उसके राजनीतिक सवाल की वैधता से जोड़कर देखा जाता है, तो क्या शक्तिशाली राजनीतिक नेताओं की शैक्षणिक योग्यता की भी उसी तरह सार्वजनिक जांच नहीं होनी चाहिए?

बेशक, डिग्री लोकतांत्रिक नैतिकता का प्रमाणपत्र नहीं है. डिग्री न होने से कोई व्यक्ति सार्वजनिक जीवन के लिए अयोग्य नहीं हो जाता. विश्वविद्यालय का प्रमाणपत्र बुद्धिमत्ता, ईमानदारी या प्रशासनिक क्षमता की गारंटी नहीं देता. इसी तरह, जन्म प्रमाणपत्र साथ न होने से किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को नागरिकता की परीक्षा में नहीं बदला जाना चाहिए.

दस्तावेजों की जांच के अलग-अलग मानक चुनिंदा लोगों को अपमानित करने का साधन नहीं बनने चाहिए. यदि दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं, तो उनका महत्व सभी के लिए समान होना चाहिए. यदि वे किसी व्यक्ति की राजनीतिक आवाज की वैधता तय नहीं करते, तो आलोचनात्मक सवाल उठाने पर उन्हें अचानक अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए.

जेन जी और राष्ट्रीय विरोधाभास

जेन जी को एक विचित्र राष्ट्रीय विरोधाभास विरासत में मिला है. उससे नवाचार करने, परंपराओं पर सवाल उठाने, स्वतंत्र रूप से सोचने और भारत को भविष्य की ओर ले जाने की उम्मीद की जाती है. लेकिन जब वह अपने ही देश में सत्ता पर सवाल उठाती है, तो उसे पता चल सकता है कि स्वतंत्र सोच के लिए दस्तावेजी प्रमाण विभाग से पहले अनुमति लेनी पड़ती है.

नागरिकता ऐसी शुरुआत नहीं होनी चाहिए, जिसे नियामकीय मंजूरी के इंतजार में रखा जाए. न ही युवाओं को वर्तमान में अपनी बात रखने से पहले अपने अतीत का प्रमाण देना चाहिए.

शायद अगली पीढ़ी के विरोध प्रदर्शनों के पोस्टरों पर एक फुटनोट होना चाहिए: जन्म प्रमाणपत्र मांगने पर उपलब्ध है; डिग्री निरीक्षण के लिए उपलब्ध है; लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए पहले से समय लेने की जरूरत नहीं है.

मूल सवाल

हालांकि, इस हास्य के नीचे एक गंभीर चेतावनी छिपी है. लोकतंत्र नागरिकों को एकत्र होने, बोलने और सवाल पूछने से डराकर मजबूत नहीं बनता. शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन ऐसा विशेषाधिकार नहीं है, जो केवल शैक्षणिक योग्यता रखने वालों या प्रशासन के लिए सुविधाजनक लोगों को दिया जाए. यह नागरिकों के लिए सत्ता को जवाबदेह बनाने का एक आवश्यक माध्यम है.

इसलिए, जेन जी, अपनी पानी की बोतलें साथ रखिए, फोन चार्ज कीजिए और पोस्टर लेकर निकल पड़िए. ऐसे देश में महत्वपूर्ण दस्तावेज सुलभ रखना समझदारी है, जहां नौकरशाही से जुड़े अप्रत्याशित अनुभव असामान्य नहीं हैं. लेकिन कागजी कार्रवाई को विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य मत समझिए.

आपका जन्म प्रमाणपत्र यह बता सकता है कि आपने इस दुनिया में कब कदम रखा. आपकी विश्वविद्यालयी डिग्री यह बता सकती है कि आपने कहां पढ़ाई की. लेकिन इनमें से कोई भी दस्तावेज यह तय नहीं करता कि आपको उन लोगों से सवाल पूछने का अधिकार है या नहीं, जो देश पर शासन करते हैं.

और यदि लोकतंत्र कभी भारतीय युवाओं से अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने से पहले अपने अस्तित्व का प्रमाण मांगने लगे, तो शायद सत्ता में बैठे लोगों को भी ऐसा प्रमाणपत्र पेश करना चाहिए, जो बताए कि आखिर उन्होंने गणराज्य का मालिकाना हक कब हासिल कर लिया.

(पीवी कोंडल राव वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है.)

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