‘मैं एक छोटा-सा कॉकरोच हूं’: कविता, विरोध और कल्पित समुदायों की नई अहिंसा

'स्क्रोल' में गीति चंद्रा लिखती हैं कि लोग साथ रह सकते हैं, लेकिन समुदाय को उसकी साझा कल्पना के जरिए बनाया जाता है और कविता इस कल्पना का शक्तिशाली माध्यम है. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के युवा विरोध प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पर सामने आई कविताएं केवल नारों और कलात्मक अभिव्यक्तियों तक सीमित नहीं हैं. वे वर्ग, जाति, धर्म और लैंगिक सीमाओं से परे एक साझा समुदाय और भारत के भविष्य की कल्पना करती हैं.

इन कविताओं में हिंसा की राजनीति को अस्वीकार करते हुए सार्वजनिक स्मृति को भी नए रूप में गढ़ा जा रहा है. सीजेपी की कविता परंपरा 2019 के नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोध और उससे आगे स्वतंत्रता आंदोलन की कविताओं और नारों से जुड़ती है. इंकलाब जिंदाबाद, हम देखेंगे, सरफरोशी की तमन्ना और सब कुछ याद रखा जाएगा जैसी अभिव्यक्तियां नए संदर्भों में फिर सामने आती हैं. इस तरह पुरानी प्रतिरोध परंपरा को संरक्षित करने के साथ उसका समकालीन पुनर्पाठ भी किया जा रहा है.

इन कविताओं की एक खासियत उनका मौखिक और सार्वजनिक स्वरूप है. वे किताबों या सभागारों तक सीमित नहीं, बल्कि सड़कों और प्रदर्शन स्थलों पर भीड़ के बीच बोली और गाई जाती हैं. ‘मैं एक छोटा-सा कॉकरोच हूं’ जैसी कविता में अपमान के लिए इस्तेमाल किए गए ‘कॉकरोच’ शब्द को ही पहचान और प्रतिरोध में बदल दिया जाता है. ‘जब हेडलाइन विफल हो जाएं, कविता बोलती है’ जैसी अभिव्यक्ति कविता को वैकल्पिक सार्वजनिक संवाद का माध्यम बनाती है.

‘वे’ और ‘हम’

विरोध की इन कविताओं में मौजूदा सत्ता को औपनिवेशिक शासकों से जोड़ने और प्रदर्शनकारियों को स्वतंत्रता आंदोलन की परंपरा से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है. झांसी की रानी जैसे ऐतिहासिक प्रतीकों को भी वर्तमान महिला प्रदर्शनकारियों के संदर्भ में नए रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे वर्तमान आंदोलन एक लंबे ऐतिहासिक संघर्ष का हिस्सा दिखाई देता है.

लेकिन इस नई युवा कविता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता हिंसा की भाषा को अस्वीकार करना है. प्रदर्शनकारी राज्य द्वारा तय की गई ‘हिंसा’ और ‘पीड़ित’ की भूमिकाओं को स्वीकार करने के बजाय उनके अर्थ को बदलने की कोशिश करते हैं. लाठीचार्ज, पानी की बौछार और बैरिकेड जैसे दमन के प्रतीकों को हास्य, नृत्य, संगीत और कविता में बदल दिया जाता है.

बैरिकेड केवल रोकने वाली वस्तु नहीं रह जाते, बल्कि प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संवाद का माध्यम भी बनते हैं. पुलिसकर्मियों को केवल दमनकारी शक्ति के रूप में देखने के बजाय उनसे मानवीय संबंध बनाने की कोशिश होती है. यह अहिंसा केवल हिंसा सहने का नाम नहीं, बल्कि राज्य की हिंसक भाषा को स्वीकार करने से इनकार है.

कविताओं में सामूहिक देखभाल और एक-दूसरे की सुरक्षा की भावना भी महत्वपूर्ण है. इस तरह विरोध केवल राजनीतिक मांगों का मंच नहीं रह जाता, बल्कि अजनबियों के बीच भरोसे और जिम्मेदारी पर आधारित समुदाय का अनुभव बन जाता है.

नई युवा कविता पुरानी प्रतिरोध परंपराओं से जुड़ते हुए भी उनसे अलग रास्ता बनाती है. यह हिंसा का जवाब हिंसा से देने के बजाय उसके अर्थ को हास्य, व्यंग्य, कला और प्रदर्शन में बदलती है. इस प्रक्रिया में कविता एक ऐसे भारत की कल्पना करती है, जो समानता, विविधता, सामाजिक न्याय और साझा भविष्य पर आधारित हो.

रानी कुमारी की पंक्तियां इस भावना को व्यक्त करती हैं: वह केवल धरने पर नहीं बैठी थी, बल्कि भारत के भविष्य की पहली पंक्ति में खड़ी थी.

गीति चंद्रा रेक्याविक स्थित जेंडर इक्वालिटी स्टडीज एंड ट्रेनिंग प्रोग्राम में रिसर्च स्पेशलिस्ट हैं और यूनिवर्सिटी ऑफ आइसलैंड में अध्यापन करती हैं.

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