सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि उसने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाताओं के विवरण की जांच के लिए चुनाव आयोग द्वारा तार्किक विसंगति (लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी) श्रेणी के उपयोग की वैधता पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है. अदालत ने आगे कहा कि उसने पश्चिम बंगाल में इस श्रेणी के उपयोग की अनुमति केवल एक "अंतरिम व्यवस्था" के रूप में दी थी.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉय माल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि बिहार एसआईआर मामले में उसका फैसला पुनरीक्षण प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाले हर मुद्दे का अंतिम निर्धारण नहीं था. पीठ ने ये टिप्पणियां दिल्ली में चल रही एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं को जारी किए गए नोटिसों में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं. सुनवाई के दौरान जब चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी. एस. नायडू ने तर्क दिया कि पीठ ने एसआईआर प्रक्रिया के हर चरण की जांच की है और इसकी वैधता को बरकरार रखा है, तब अदालत ने यह स्पष्टीकरण दिया.
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि बिहार एसआईआर मामले में अदालत का फैसला पुनरीक्षण प्रक्रिया से उठने वाले हर सवाल का अंतिम समाधान नहीं था.
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, "बिहार मामला इन कार्यवाहियों में उठने वाले हर सवाल का अंतिम निर्धारण नहीं है. बिहार में, चुनाव आयोग ने शुरुआत में 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' को एक श्रेणी के रूप में शामिल नहीं किया था. हमने पश्चिम बंगाल में एक अंतरिम व्यवस्था के रूप में इसकी अनुमति दी थी. हमने लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी प्रक्रिया की वैधता पर अंतिम रूप से कोई निर्णय नहीं लिया है."
न्यायाधीश ने आगे कहा कि पीठ इस मुद्दे पर और अधिक टिप्पणी नहीं करना चाहती, क्योंकि संवेदनशील मामलों में की गई मौखिक टिप्पणियों को अक्सर संदर्भ से बाहर उद्धृत किया जाता है और उन्हें अंतिम न्यायिक फैसले के रूप में पेश किया जाता है.
उन्होंने कहा, "हम इस पर और अधिक टिप्पणी नहीं करना चाहते क्योंकि संवेदनशील मामलों में की गई टिप्पणियों को कभी-कभी संदर्भ से बाहर ले लिया जाता है. ये टिप्पणियां अंतिम नहीं हैं. एक कठिनाई तब आती है जब न्यायिक टिप्पणियों को बार-बार संदर्भ से बाहर इस तरह उद्धृत किया जाता है मानो हर मुद्दे पर पहले ही फैसला हो चुका हो."

