1972 में, 1962 के युद्ध के बाद चीन के साथ बने गंभीर तनाव के बीच, भारत ने 'नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी' (एनईएफए) को अरुणाचल प्रदेश केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया था. तीन साल बाद, यहाँ एक विधानसभा बनी और फरवरी 1987 में—चीन के साथ सुमदोरोंग चू संकट के चरम के दौरान—यह एक पूर्ण राज्य बन गया. इस एक कदम से भारत ने एक विवादित सीमा पर लोकतांत्रिक सरकार का विस्तार किया, राष्ट्रीय संप्रभुता को मजबूत किया और सीमावर्ती क्षेत्रों को देश के संवैधानिक ढांचे में मजबूती से जोड़ दिया. लगभग चार दशकों बाद, कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि अरुणाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा देने से उस क्षेत्र पर भारत के राजनीतिक दावे को मजबूती मिली है, जिस पर चीन भी दावा करता है, और इससे राष्ट्रीय सुरक्षा भी सुदृढ़ हुई है.
सुशांत सिंह के अनुसार, आज यही तर्क लद्दाख पर भी लागू होता है. लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार इस क्षेत्र को एक सुरक्षा समस्या के रूप में देखती है जिसे दिल्ली से नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि एक ऐसे वफादार नागरिक समूह के रूप में जो लोकतांत्रिक अधिकारों का हकदार है. लद्दाख के साथ अलग व्यवहार क्यों होना चाहिए? क्या इसकी बौद्ध और शिया मुस्लिम आबादी के कारण यहाँ के लोग कम अधिकार पाने के योग्य हैं? कारगिल दशकों तक कश्मीर को घेरने वाले उग्रवाद से अलग रहा और इसने पाकिस्तान के साथ हुए सभी युद्धों में भारतीय सेना का समर्थन किया है. यह बेदाग रिकॉर्ड उनकी लोकतांत्रिक मांगों के इर्द-गिर्द पनपने वाले संदेह को विशेष रूप से आपत्तिजनक बनाता है. जो नागरिक भारत की रक्षा में मददगार रहे, वे जब निर्वाचित सरकार की मांग करते हैं तो उनकी देशभक्ति पर सवाल क्यों उठने चाहिए?
2019 में जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था, तब वहाँ के लोगों ने कभी इस भाग्य की कल्पना नहीं की थी. उनमें से कई लोगों ने उस दौरान कश्मीर में मोदी सरकार द्वारा उठाए गए सख्त सुरक्षा कदमों—जैसे कर्फ्यू, इंटरनेट बंद करने और धार्मिक अधिकारों पर रोक—का स्वागत भी किया था. निष्पक्षता से कहें तो, जम्मू-कश्मीर से अलग होने की मांग मुख्य रूप से लेह से उठी थी, जहाँ कुछ नेताओं को श्रीनगर के अधीन रहने और अपने क्षेत्र के साथ होने वाले भेदभाव से नाराजगी थी. शिया-बहुसंख्यक कारगिल ने इस विभाजन का विरोध किया था और वह जम्मू-कश्मीर का हिस्सा ही बने रहना चाहता था. हालाँकि, मोदी सरकार के उदासीन रवैये ने दोनों क्षेत्रों को लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग के लिए एक साथ ला दिया है.
जिन्होंने पृथक्कीकरण का स्वागत किया था, उन्हें अपने मामलों पर अधिक नियंत्रण की उम्मीद थी. इसके बजाय, लद्दाख ने पूर्व जम्मू-कश्मीर राज्य विधायिका में अपना प्रतिनिधित्व खो दिया और उसे अपनी कोई विधायिका भी नहीं मिली. हिल काउंसिल (पहाड़ी परिषदें) किसी चुनी हुई विधानसभा के प्रति जवाबदेह सरकार के समान नहीं होतीं. लद्दाख के लोग श्रीनगर के दबदबे और उपेक्षा से तो मुक्त हो गए, लेकिन उन्होंने पाया कि इस क्षेत्र को अब बिना चुने हुए नौकरशाहों और केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल द्वारा नियंत्रित एक बाहरी चौकी की तरह समझा जा रहा है. शासन का यह ऊपर-से-नीचे थोपा जाने वाला मॉडल बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलता है और स्वाभिमानी नागरिकों को अपनी ही मातृभूमि में असहाय दर्शक बना देता है.
लद्दाख के लोगों ने कश्मीरियों के अनुभवों से भी सबक सीखा है: पूर्व राज्य में नियमों के एक जटिल सेट का उपयोग करके मोदी सरकार द्वारा लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेताओं को अधिकारहीन कर दिया गया था. इसलिए वे पर्याप्त संवैधानिक सुरक्षा उपायों के साथ एक ऐसा शासन ढांचा चाहते हैं जहाँ स्थानीय आवाजें बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के स्थानीय मामलों का संचालन करें.
लेह की सड़कों पर पुलिस की गोलीबारी और मौतों के विरोध प्रदर्शनों के बाद, मोदी सरकार ने दो समूहों—एक लेह और दूसरा कारगिल—के संयुक्त मंच के साथ बातचीत फिर से शुरू की. जून 2025 में, अलग भर्ती और अधिवास (डोमिसाइल) उपायों से संबंधित कुछ छोटी मांगों को गृह मंत्रालय द्वारा स्वीकार कर लिया गया था.
हालाँकि, दोनों पक्षों के बीच मुख्य सहमति मई 2026 में बनी और इसके विवरण जुलाई में जारी किए गए. इन मिनट्स में "कार्यकारी, वित्तीय और विधायी शक्तियों" से युक्त एक कस्टमाइज्ड केंद्र शासित प्रदेश-स्तरीय निर्वाचित निकाय पर सहमति दर्ज की गई थी. इसके विषयों को संभालने वाले नौकरशाहों की देखरेख—जिसमें उनकी वार्षिक प्रदर्शन रिपोर्ट भी शामिल है—की जिम्मेदारी लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई राजनीतिक कार्यपालिका को दी जानी थी. अनुच्छेद 371 के तहत लद्दाख की अनूठी जरूरतों के अनुसार संवैधानिक सुरक्षा उपाय दिए जाने थे और राज्य के दर्जे की दीर्घकालिक आकांक्षा को भी स्वीकार किया गया था.
हालाँकि, अपने 15 अक्टूबर के प्रस्ताव में, केंद्र ने उस दिशा को पूरी तरह पलट दिया है. इसके 32-पेज के मसौदे में एक नए अनुच्छेद 371K के तहत एक निर्वाचित निकाय का प्रस्ताव है, लेकिन इसकी शक्तियाँ और संरचना अनुच्छेद 240 के तहत लागू राष्ट्रपति के नियमों द्वारा तय की जाएगी, न कि संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से. यह लद्दाख के प्रतिनिधियों के पास एक ऐसा निकाय छोड़ता है जिसे इच्छाअनुसार कभी भी खारिज किया जा सकता है. निर्वाचित निकाय द्वारा पारित प्रत्येक कानून को लागू होने से पहले उपराज्यपाल की सहमति की आवश्यकता होगी. नौकरशाही पर व्यापक लोकतांत्रिक नियंत्रण को अस्वीकार ही रखा गया है, जिसका अर्थ है कि नई दिल्ली बिना चुने हुए अधिकारियों के माध्यम से इस क्षेत्र पर पूरा नियंत्रण बनाए रखेगी.
नागालैंड दिल्ली के इस रुख की कमजोरी को उजागर करता है. नागालैंड के पास राज्य का दर्जा और अनुच्छेद 371A है, जो इसे भूमि, संसाधनों और प्रथागत कानूनों पर विशेष सुरक्षा देता है, जिसे राज्य विधानसभा की सहमति के बिना कोई भी केंद्रीय कानून रद्द नहीं कर सकता. लद्दाख के प्रतिनिधि एक ऐसे ही सहमति तंत्र की मांग कर रहे हैं. इसके विपरीत, गृह मंत्रालय का मसौदा उस सुरक्षा के बिना केंद्रीय कानूनों के आवेदन को बनाए रखता है. एक लंबे उग्रवादी इतिहास वाला क्षेत्र अपने महत्वपूर्ण स्थानीय हितों पर लद्दाख की तुलना में अधिक मजबूत संवैधानिक अधिकार रखता है, जबकि लद्दाख के नेता भारत के संवैधानिक ढांचे के भीतर शांतिपूर्वक अपनी मांगें रख रहे हैं. मोदी सरकार इस असमानता के लिए कोई ठोस लोकतांत्रिक औचित्य नहीं देती है.
इन बार-बार मिलने वाले धोखों पर जनता का आक्रोश बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के रूप में सामने आया है. स्थानीय शिकायतों की अनदेखी करना एक भारी भू-राजनीतिक नुकसान भी पहुँचाता है, खासकर चीन के संदर्भ में. 13 अक्टूबर को, बीजिंग ने लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे को "एकपक्षीय और अवैध" बताते हुए फिर से खारिज कर दिया और सीमा के पश्चिमी क्षेत्र पर दावा ठोका, जिसका लद्दाखी नेताओं ने कड़ा विरोध किया. केंद्र को उन नागरिकों के रणनीतिक मूल्य को पहचानना चाहिए जो बीजिंग के दावों को खारिज करते हैं.
लोकतांत्रिक अधिकार कोई ऐसी विलासिता नहीं हैं जिन्हें राजनीतिक या सुरक्षा सुविधा के अनुसार बांटा जाए. यही वे कारण हैं जिनकी वजह से लोग राष्ट्र निर्माण के विचार से जुड़े रहते हैं. मोदी सरकार का तर्क है कि संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए प्रशासनिक नियंत्रण और सीधा केंद्रीय पर्यवेक्षण आवश्यक है, लेकिन अरुणाचल प्रदेश ने साबित किया है कि लोकतांत्रिक समावेशिता एक विवादित सीमा को मजबूत कर सकती है. लद्दाख को भी इसी भरोसे की जरूरत है. सीमा को मजबूत करने के लिए इसके निवासियों के दिलों और दिमागों को जीतना जरूरी है; यह स्थानीय आबादी को मताधिकार से वंचित करके हासिल नहीं होगा.
सुशांत का मानना है कि सार्थक लोकतंत्र से इनकार करना, तय की गई प्रतिबद्धताओं को कमजोर करना, और नागरिकों को दूर बैठे प्रशासकों पर निर्भर छोड़ना—उस क्षेत्र में अलगाव पैदा करता है जहाँ भारत को विश्वास की आवश्यकता है. लद्दाख के लोगों को अपनी भूमि, नौकरियों और भविष्य का शासन खुद चलाने दें. इससे कम कुछ भी एक संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में आग से खेलने जैसा है.
(लेखक सुशांत सिंह रक्षा और सामरिक मामलों के जानकार, पत्रकार और येल यूनिवर्सिटी में लेक्चरर है. हिंदी में अनूदित और संपादित यह लेख अंग्रेजी में यहां पढ़ा जा सकता है.)

