लाखों लोगों को मनमाने ढंग से मताधिकार से वंचित करना, कोई भी तर्क इसे सही नहीं ठहरा सकता: सुप्रीम कोर्ट के जज भुइयां

उच्चतम न्यायालय में मतदाता सूचियों के एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के खिलाफ दायर याचिकाओं के बीच, शीर्ष अदालत के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने कहा है कि कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो भारतीय नागरिकों को बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करती है और उन्हें बिना मतदान अधिकार वाला नागरिक बनाती है, संविधान का उल्लंघन होगी. उन्होंने कहा कि कोई भी टालमटोल या अन्य तर्कों (व्हाटअबाउटरी) से इसे सही नहीं ठहराया जा सकता.

न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि किसी भारतीय नागरिक से वोट देने का अधिकार छीनना “शरीर से आत्मा निकालने” के समान होगा.

निखिला हेनरी की रिपोर्ट के अनुसार, हैदराबाद स्थित 'नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ' में आयोजित न्यायमूर्ति बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा, “यदि कोई भी प्रक्रिया लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित करती है और उन्हें अपने ही देश में इस अर्थ में द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनाती है कि वे बिना मतदान अधिकार वाले नागरिक बन जाएं, तो ऐसी प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से मनमानी है. कोई भी तर्क या टालमटोल इसे सही नहीं ठहरा सकती.”

उन्होंने कहा, “यह संविधान की मूल भावना पर आघात करता है और मैं यहाँ तक कहूँगा कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था का निषेध (नकारना) है, जिसे हमने भारत के संविधान के तहत अपनाया है.”

विशेष रूप से भारत के संदर्भ में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के महत्व पर बोलते हुए न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, “एक भारतीय नागरिक के व्यक्तित्व से, वोट देने के अधिकार या मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार को अलग नहीं किया जा सकता. यह शरीर से आत्मा निकालने जैसा होगा.” उन्होंने कहा कि भारत में वयस्क मताधिकार का सबसे पहला उल्लेख 1895 के 'कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया बिल' में मिलता है, जिसे 'स्वराज बिल' के नाम से भी जाना जाता है.

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर संविधान सभा में हुई बहस के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा, “प्रारूप संविधान (ड्राफ्ट कॉन्स्टिट्यूशन) में, जिस पर संविधान सभा द्वारा बहस की गई थी, दो प्रासंगिक अनुच्छेद थे, जिन्हें बाद में शामिल किया गया था. ये अनुच्छेद 289A और 289B थे... प्रारूप का अनुच्छेद 289A (संविधान का) अनुच्छेद 325 बना और प्रारूप का अनुच्छेद 289B अनुच्छेद 326 बना... अनुच्छेद 326 अनुच्छेद 14 में निहित समानता के सिद्धांत को अर्थ और स्वरूप प्रदान करता है.”

“भारत के संविधान का अनुच्छेद 325 यह घोषित करता है कि लोकसभा या किसी राज्य के विधानमंडल के चुनाव के लिए प्रत्येक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र की एक ही सामान्य मतदाता सूची होगी; केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या इनमें से किसी भी आधार पर कोई भी व्यक्ति ऐसी किसी सूची में शामिल होने के लिए अयोग्य नहीं होगा और न ही किसी ऐसे निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल किए जाने का दावा कर सकता है.”

उन्होंने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार, लोकसभा और प्रत्येक राज्य की विधानसभा के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे. दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति जो भारत का नागरिक है और जिसकी आयु 18 वर्ष से कम नहीं है (28 मार्च 1989 से पहले यह 21 वर्ष थी) और जो अनिवास, चित्तविकृति (अस्वस्थ दिमाग), अपराध या भ्रष्ट या अवैध आचरण के आधार पर भारत के संविधान या उपयुक्त विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत अयोग्य घोषित नहीं किया गया है, ऐसे किसी भी चुनाव में मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार होगा.”

डॉ. बी.आर. अंबेडकर का उद्धरण देते हुए न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का औचित्य सिद्ध करते हुए डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि चूंकि हमने एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जो व्यावहारिक रूप से अतीत को समाप्त करता है, इसलिए यह बेहतर है कि संविधान को स्पष्ट शब्दों में यह बताना चाहिए कि यह प्रारूप संविधान में अनुच्छेद 289A और 289B को शामिल करने का आधार है, जो अब अनुच्छेद 325 और 326 हैं.”

उन्होंने कहा, “डॉ. अंबेडकर के समापन भाषण में चेतावनी दी गई थी कि वोट देने के अधिकार और वयस्क मताधिकार के भारतीय नागरिक के हक को संसदीय कानून की मर्जी पर छोड़ने के बजाय भारत के संविधान में दर्ज किया जाना चाहिए.”

न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपनाना संविधान सभा के इस दृढ़ विचार को दर्शाता है कि स्वतंत्रता संग्राम के वर्षों और विदेशी शासन के खिलाफ विद्रोह ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को एक स्वाभाविक विकल्प और लोकतंत्र का एक आवश्यक अंग बना दिया, जिसे हमने शासन के रूप में अपनाया है.”

“इसलिए, यह भारत के आम आदमी में और उसके व्यावहारिक दृष्टिकोण तथा बुद्धिमत्ता में हमारे संस्थापकों (संविधान निर्माताओं) के विश्वास का प्रतीक था. यह भारत में समानता प्राप्त करने की दिशा में उठाया गया पहला कदम था.”

उन्होंने कहा, “कोई अरबपति हो सकता है, और कोई रिक्शा चालक हो सकता है. फिर भी दोनों के पास उनका वोट होगा, और उनके वोट का मूल्य बराबर होगा. इसी तरह, एक तरफ सामाजिक रूप से उच्च स्थान प्राप्त मंदिर का पुजारी और दूसरी तरफ समाज के सबसे निचले तबके का व्यक्ति जिसे मैला ढोने के लिए मजबूर किया जाता है, दोनों के पास समान मूल्य वाला समान वोट है. यह भारतीय संविधान की परिवर्तनकारी दृष्टि है.”

अपने समापन भाषण में उन्होंने नालसार के छात्रों को बधाई देते हुए कहा कि “उन्हें वैसा ही होना चाहिए जैसा कि छात्रों, विशेष रूप से कानून के छात्रों को होना चाहिए.”

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