यहां भी वोट चोरी? महाराष्ट्र की सबसे बड़ी डेयरी का चुनाव हार गई भाजपा; फिर भी नियंत्रण पाने की जुगत में जुटी

पिछले महीने महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जब कांग्रेस के कद्दावर नेता सतेज पाटिल ने सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के दो कैबिनेट मंत्रियों, दो सांसदों और 10 विधायकों को सीधे मुकाबले में पटखनी दे दी. यह हार कोल्हापुर की प्रतिष्ठित और बेहद प्रभावशाली “गोकुल दूध सहकारी समिति” के चुनाव में हुई थी. इस चुनावी पराजय के ठीक बाद, राज्य कैबिनेट ने एक ऐसा दूरगामी प्रस्ताव पारित किया है जो इस सहकारी संस्था में सत्ता के पूरे समीकरण को मौलिक रूप से बदल सकता है. नए नियमों के तहत सरकार को इसके बोर्ड में पांच नए निदेशकों को नियुक्त करने की असीमित शक्ति मिल जाएगी, जिनमें से चार को मतदान का पूर्ण अधिकार होगा.

ज़ीशान शेख और आलोक देशपांडे की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह निर्णय महाराष्ट्र के सबसे ताकतवर सहकारी संस्थानों में से एक पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की सियासी जंग का एक नया और अहम अध्याय है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए 19 अक्टूबर को हुए चुनाव में सतेज पाटिल के पैनल को पछाड़ने में असफल रहने के बाद, अब सत्तारूढ़ गठबंधन 'महाराष्ट्र सहकारी समिति अधिनियम' में संशोधन का सहारा लेकर पिछले दरवाजे से बोर्ड में अपनी घुसपैठ और दखل सुनिश्चित करने की तैयारी कर चुका है.

नए संशोधनों के मायने और कानूनी दांव-पेच

कैबिनेट द्वारा मंजूर किए गए इस नए प्रस्ताव के अनुसार, राज्य सरकार अब गोकुल जैसे विशाल और शीर्ष सहकारी संस्थानों के संचालक मंडलों (बोर्ड) में चार विशेषज्ञ निदेशकों के साथ-साथ उप-निबंधक (डिप्टी रजिस्ट्रार) रैंक के एक प्रशासनिक अधिकारी को भी नामित कर सकेगी.  हालांकि इन चार विशेषज्ञ निदेशकों को बोर्ड की बैठकों में वोट देने का अधिकार तो होगा, परंतु वे संस्था के अध्यक्ष पद के लिए होने वाले चुनाव में उम्मीदवार बनने के पात्र नहीं होंगे. सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह विशेष प्रावधान जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों पर लागू नहीं होगा.

यह पूरा घटनाक्रम गोकुल के नवनिर्वाचित अध्यक्ष के चुनाव पर बने गंभीर राजनीतिक गतिरोध के बीच सामने आया है. हालिया चुनावों में सतेज पाटिल समर्थित 'राजर्षि शाहू शेतकरी समविचारी अघाड़ी' ने समिति की कुल 25 में से 13 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि महायुति समर्थित पैनल को 12 सीटें मिली थीं. इसके बावजूद, सत्तारूढ़ गठबंधन के 12 नवनिर्वाचित निदेशकों ने अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए बुलाई गई बोर्ड बैठक से पूरी तरह दूरी बना ली. परिणाम यह हुआ कि पाटिल के पैनल के पास वैधानिक रूप से आवश्यक कोरम (गणपूर्ति) के लिए जरूरी 14 सदस्यों का जादुई आंकड़ा पूरा नहीं हो सका.

इस प्रकार, कैबिनेट का यह नया फैसला चुनावी शिकस्त के बावजूद महायुति को बोर्ड के भीतर निर्णायक प्रभाव बनाने का एक मजबूत जरिया प्रदान करता है. दूसरी ओर, कांग्रेस नेता सतेज पाटिल ने इसे सहकारी आंदोलन और दुग्ध उत्पादकों के लोकतांत्रिक जनादेश की खुली हत्या करार देते हुए इस सरकारी निर्णय को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया है.

गोकुल डेयरी का राजनीतिक और आर्थिक महत्व क्यों है?

16 मार्च 1963 को स्थापित 'कोल्हापुर जिला सहकारी दूध उत्पादक संघ', जिसे इसके लोकप्रिय ब्रांड नाम 'गोकुल' से देश भर में जाना जाता है, महाराष्ट्र की सबसे बड़ी और समृद्ध डेयरी सहकारी समितियों में शुमार है. इसका प्रभाव केवल इसके वित्तीय वर्ष 2024-25 के लगभग 4,000 करोड़ रुपये के भारी-भरकम वार्षिक टर्नओवर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा बहुत विस्तृत है. गोकुल लगभग 1,810 गांवों में फैली हुई 8,009 गांव-स्तरीय प्राथमिक दुग्ध समितियों के जरिए सीधे तौर पर करीब 4.41 लाख छोटे-बड़े दूध उत्पादक किसानों से जुड़ा हुआ है.

जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक वसंत भोसले का मानना है कि इस संस्था की असली ताकत ग्रामीण परिवारों और सीमांत किसानों के साथ इसके गहरे जुड़ाव में छिपी है. दुग्ध संकलन का भुगतान सीधे तौर पर महिला उत्पादकों के बैंक खातों में ट्रांसफर किया जाता है, जो ग्रामीण परिवारों की आजीविका और घरेलू आय का एक मुख्य जरिया है. यही कारण है कि गोकुल पर जिसका भी नियंत्रण होता है, उसका प्रभाव कोल्हापुर और आसपास के जिलों की पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहराई से स्थापित हो जाता है.

बीजेपी के लिए गोकुल पर कब्जा जमाना पश्चिमी महाराष्ट्र में अपने राजनीतिक पैर पसारने की रणनीति का अहम हिस्सा है, क्योंकि इस क्षेत्र में पारंपरिक रूप से कांग्रेस और एनसीपी का दबदबा रहा है. लेकिन इस बार खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने महायुति के तमाम घटक दलों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई थी. गठबंधन ने मंत्री हसन मुश्रिफ के नेतृत्व में एक साझा पैनल उतारा था, लेकिन वे जीत दर्ज करने में नाकाम रहे. इस हार ने सतेज पाटिल को कोल्हापुर के सबसे ताकतवर क्षत्रपों में स्थापित कर दिया, विशेषकर तब जब कांग्रेस पार्टी 2024 के विधानसभा चुनावों में जिले की एक भी सीट जीतने में असफल रही थी.

बहिष्कार से लेकर विधायी हस्तक्षेप तक का सफर

चुनाव परिणाम आने के बाद पहला सीधा टकराव 29 अक्टूबर को हुआ, जब नवनिर्वाचित बोर्ड अध्यक्ष चुनने के लिए एकत्र हुआ. महायुति समर्थित सभी 12 निदेशक अनुपस्थित रहे। गोकुल के उपनियमों के तहत बैठक के लिए 14 सदस्यों का कोरम अनिवार्य है. केवल 13 सदस्यों की उपस्थिति के कारण पीठासीन अधिकारी को बैठक स्थगित करनी पड़ी.  इसके बाद पाटिल के 13 निदेशकों ने अलग से बैठक कर शशिकांत पाटिल चुयेकर को अध्यक्ष घोषित कर दिया, जिसे डेयरी प्रशासन ने मान्यता नहीं दी.

मामला बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर सर्किट बेंच पहुँचा, जिसने 10 नवंबर को सभी 25 निदेशकों की उपस्थिति में नए सिरे से बैठक बुलाने का निर्देश दिया. महायुति ने अपने इस बहिष्कार को उचित ठहराते हुए कहा है कि कोरम का नियम पुराना है और सतेज पाटिल को अपनी मामूली जीत को व्यापक जनादेश नहीं समझना चाहिए. बहरहाल, 16 अक्टूबर को मंत्री चंद्रकांत पाटिल द्वारा लिखे गए पत्र के आधार पर कैबिनेट द्वारा उठाया गया यह विधायी कदम आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की सहकारी राजनीति में एक बड़ा भूचाल लाने के लिए पूरी तरह तैयार है.

इस बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा, "गोकुल में दुग्ध उत्पादकों ने बीजेपी को हराया है. इसलिए बीजेपी ने चुनाव के बाद नियम बदल दिए — 4 निदेशकों को जबरन शामिल किया, 12 को 16 में बदला और बहुमत चुरा लिया. यह दुग्ध उत्पादकों के वोटों की चोरी है — जनादेश में मिलावट है."

उन्होंने आगे कहा, "बीजेपी इतनी बौखला गई है कि सत्ता बचाने के लिए हर जगह किसी भी हद तक जा रही है. दुग्ध उत्पादकों के वोट चुराने वाले याद रखें — किसान भूलते नहीं हैं."

Previous
Previous

बीजेपी नैरेटिव की लड़ाई में पिछड़ गई है? प्रभावी तोड़ के लिए पार्टी आगे के रास्ते पर कर रही विचार

Next
Next

अशोक के. कंठ | अरुणाचल सीमा पर, चुप्पी कोई रणनीति नहीं है