पिछले कुछ समय से लगातार ऐसी रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं कि अरुणाचल प्रदेश के असाफिला, ताकसिंग और लोंगजू क्षेत्रों में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) द्वारा अतिक्रमण किया जा रहा है. हालांकि इस मामले में तथ्य पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं और आधिकारिक तौर पर भी इन्हें उस रूप में स्वीकार नहीं किया गया है, फिर भी ऐसे साफ संकेत मिल रहे हैं कि सीमा के इस संवेदनशील हिस्से पर कुछ असामान्य घटित हो रहा है. यह मामला बेहद गंभीर है और इस पर गहन ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, जैसा कि अशोक के. कंठ ने ‘द हिंदू’ में लिखा है.
कंठ के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे स्पष्ट संकेत 22 अक्टूबर 2026 को मिला. जब भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के एक कार्यक्रम में बोलते हुए, महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने कहा: "पिछले कुछ दिनों में, ऐसी स्थिति पैदा हुई जहाँ अरुणाचल में कई स्थानों पर आमना-सामना (फेस-ऑफ) हुआ और यह अभी भी जारी है." यह समस्या के पैमाने की पहली आधिकारिक पुष्टि थी. इस समाचार पत्र ने "सरकारी सूत्रों" का हवाला देते हुए रिपोर्ट दी कि ताकसिंग के पास असाफिला में जुलाई के अंत से दोनों पक्ष आमने-सामने की स्थिति में डटे हुए हैं.
लोंगजू के पास माजा के समीप एक संक्षिप्त आमने-सामने के बाद, पीएलए कथित तौर पर बड़ी संख्या में वापस लौटी और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार लगभग छह से सात किलोमीटर अंदर तक अपने तंबू गाड़ दिए. यह गतिरोध भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए बने कार्यकारी तंत्र (डब्ल्यूएमसीसी), विशेष प्रतिनिधियों और कोर कमांडरों की बैठकों के साथ-साथ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (सितंबर 2026) के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान भी लगातार बना रहा.
आधिकारिक प्रतिक्रियाएं और स्थानीय चिंताएं
लेखक के मुताबिक, इस मामले पर आधिकारिक प्रतिक्रियाएं काफी कुछ बयां करती हैं. किसी भी पक्ष ने आमने-सामने की इस घटना से पूरी तरह इनकार नहीं किया है. 23 अक्टूबर को, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने विशिष्ट विवरणों से जुड़े सवालों को रक्षा मंत्रालय के पास भेज दिया. उन्होंने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिति "समय-समय पर तब अस्त-व्यस्त हो जाती है जब चीनी बल स्थापित गश्ती पैटर्न से अलग हटते हैं." वहीं, उनके चीनी समकक्षी ने 26 अक्टूबर को बयान दिया कि चीन "अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता और सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिरता की रक्षा के लिए सामान्य सीमा गश्त और नियंत्रण गतिविधियां चलाता है."
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू इस मामले में अधिक स्पष्ट नजर आए. उन्होंने 29 अक्टूबर को दो टूक कहा, "इसमें कोई शक नहीं कि अतिक्रमण हुआ है. यह होता रहता है," और साथ ही यह भी नोट किया कि चीन ऐतिहासिक रूप से मैकमोहन रेखा को स्वीकार नहीं करता है.
स्थानीय समूह भी लगातार अपनी चिंताएं उठा रहे हैं. जून में, ताकसिंग की 'नाह वेलफेयर सोसाइटी' ने जिला प्रशासन को सूचित किया था कि पीएलए ने पारंपरिक चराई और शिकार के मैदानों पर सड़कों, पुलों और शिविरों का निर्माण कर लिया है. अगस्त में, एक क्षेत्रीय दल की तथ्य-शोधक टीम ने भी बताया कि भारतीय गश्ती दलों को कुछ क्षेत्रों तक पहुँचने से रोका जा रहा है. सेना ने जून की रिपोर्टों को "गलत और बिना किसी आधार के" बताया था, लेकिन आईटीबीपी के महानिदेशक की ताज़ा टिप्पणियां अब इन स्थानीय आवाजों को भारी मजबूती प्रदान करती हैं.
ऐतिहासिक संदर्भ और चीन की सोची-समझी रणनीति
कंठ का मानना है कि पूर्वी क्षेत्र में चीनी अतिक्रमण कोई नई बात नहीं है. हालांकि, अतीत में अंतरराष्ट्रीय सीमा के दक्षिण में प्रतिकूल चीनी कब्जे के उदाहरण कुछ ही इलाकों तक सीमित रहे हैं: नमखा चू और सुमदोरोंग चू घाटियां, तथा लोंगजू. बाकी अन्य स्थानों पर एलएसी काफी हद तक सीमा के साथ मेल खाती है. यदि चीन ने अब और गहरा अतिक्रमण किया है, नए क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, या भारतीय गश्ती दलों को रोका है, तो यह एक गंभीर घटनाक्रम है. हममें से कई लोगों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि चीन पूर्वी क्षेत्र में भी वही रणनीति अपना सकता है जो उसने 2020 में पूर्वी लद्दाख में अपनाई थी.
दूसरी ओर, चीनी टिप्पणीकार इस मामले में ज्यादा संकोच नहीं दिखाते हैं. आईटीबीपी महानिदेशक के बयान के एक दिन बाद, उनमें से एक ने तर्क दिया कि चीन के दृष्टिकोण की "बॉटम लाइन" (निचली रेखा) "1959 की रेखा" को लागू करना था. उसने लिखा कि चीन ने पश्चिमी क्षेत्र में इस लक्ष्य को काफी हद तक हासिल कर लिया है और "भविष्य में पूर्वी क्षेत्र में इसे लागू करने की बहुत संभावना है".
चीन के दावे और भारत का रुख
तथाकथित 7 नवंबर 1959 की एलएसी का भारत के लिए कोई कानूनी या ऐतिहासिक आधार नहीं है. पूर्वी क्षेत्र में, चीन का दावा है कि यह 'अवैध' मैकमोहन रेखा के साथ मेल खाती है. हालांकि, चीन 1914 के मानचित्रों के कोऑर्डिनेट्स को आज के मानचित्रों पर स्थानांतरित करके उस रेखा को परिभाषित करता है, और सबसे ऊंचे जल-विभाजक की उपेक्षा करता है, जो 1914 के संरेखण (एलाइनमेंट) का मुख्य आधार था. यह दृष्टिकोण पूरी तरह से अवैज्ञानिक है, जिसे भारत ने कभी स्वीकार नहीं किया.
1993 के समझौते के दौरान, भारत ने एलएसी की अवधारणा को स्वीकार किया था, लेकिन 1959 की रेखा की चीनी धारणा को विशेष रूप से खारिज कर दिया था. अतिक्रमण के मामलों में, भारत ने हमेशा 'स्टेटस को एंटी' (पूर्व स्थिति की बहाली) की बहाली पर जोर दिया. इसके विपरीत, चीन ने एलएसी को संप्रभुता के संदर्भ में परिभाषित करना शुरू कर दिया है, जो इसके मूल सिद्धांतों के खिलाफ है.
दुर्भाग्य से, भारत लगातार एलएसी की "अलग-अलग धारणाओं" का हवाला देता रहता है. ऐसा करके, भारत चीनी अतिक्रमणों को एक हद तक वैधता प्रदान करता है और अपनी स्थिति को कमजोर करता है. जब बीजिंग ने अरुणाचल प्रदेश पर अपने "ज़ांगनान" (दक्षिण तिब्बत) के आख्यान को आक्रामक रूप से पुनर्जीवित किया है, तब भारत को एकतरफा रूप से ऐसा संदर्भ नहीं देना चाहिए. भारत के लिए एलएसी की केवल एक ही धारणा होनी चाहिए—जो कि भारत की अपनी धारणा है.
घुसपैठ छिपाने से कमजोर होती है सुरक्षा
इसका मतलब यह नहीं है कि हर अतिक्रमण को सार्वजनिक किया जाए, लेकिन यदि पैटर्न बदलता है, घुसपैठ नए क्षेत्रों में फैलती है, या प्रतिकूल कब्जा बढ़ता है, तो स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है. ऐसा कोई संकेत नहीं है कि ऐसे अतिक्रमणों को गुप्त रखने से उनका समाधान करने में मदद मिलती है. सरकार का यह दायित्व है कि वह उन्हें सार्वजनिक पटल पर लाए, जैसा कि उसने अतीत में किया है. जब 1986 में चीनी बल वांगडुंग में दाखिल हुए थे, तो मामले को सार्वजनिक किया गया था और संसद में इस पर चर्चा हुई थी. सरकार ने 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीनी अतिक्रमण को भी स्वीकार किया था, हालांकि उसके बाद से पारदर्शिता अपर्याप्त रही है. कंठ मानते हैं कि यदि भारत इनकार, भ्रम या विरोधाभासी संकेतों के ढर्रे में फंस जाता है, तो यह केवल अधिक आक्रामक सलामी-स्लाइसिंग (कदम-दर-कदम जमीन कब्जाने) को बढ़ावा देगा.
अनुभव स्पष्ट है कि सितंबर 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति के सामने चुमार अतिक्रमण का मुद्दा कड़ाई से उठाया था, जिससे चीन पूर्व स्थिति बहाल करने पर सहमत हुआ था. इसके विपरीत, पूर्वी लद्दाख में आज भी अप्रैल 2020 की स्थिति बहाल नहीं हो पाई है. यदि वास्तविक अतिक्रमण हुए हैं, तो भारत के लिए यह बेहतर होगा कि वह इसे खुलकर स्वीकार करे. स्पष्टता और पारदर्शिता से ही बीजिंग से निपटने में नई दिल्ली का पक्ष मजबूत होगा.
(अशोक के. कंठ चाणक्य विश्वविद्यालय, बेंगलुरु में अंतर्राष्ट्रीय संबंध के सुभाष चंद्र बोस चेयर प्रोफेसर हैं, और चीन में भारत के राजदूत रह चुके हैं. यहां उनके लेख को हिंदी में अनूदित और संपादित कर पेश किया गया है.)

