आरक्षण विरोधी विचारधारा को क्रीमी लेयर से इतना लगाव क्यों है?
‘स्क्रोल’ में शोएब दानियाल की रिपोर्ट है कि जाति आधारित आरक्षण भारत में सामाजिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है. राजनीतिक वैज्ञानिक क्रिस्टोफ जाफ्रेलो इसे भारत की "मूक क्रांति" का हिस्सा मानते हैं, जिसके जरिए हजारों वर्षों से सामाजिक रूप से हाशिए पर रखे गए पिछड़े और वंचित समुदायों को लोकतांत्रिक व्यवस्था में जगह मिली. इसी वजह से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण हमेशा राजनीतिक और सामाजिक विवाद का विषय रहा है.
आरक्षण के खिलाफ हाल के आंदोलनों में "आरक्षण हटाओ आंदोलन" भी प्रमुख रूप से सामने आया है. अगस्त में इसके समर्थकों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया. आंदोलन का तर्क है कि आरक्षण के कारण सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध नौकरियों का हिस्सा कम हो रहा है. संगठन निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण का विरोध करता है और जाति के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करता है.
आंदोलन की एक प्रमुख मांग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में "क्रीमी लेयर" को बाहर करना भी है. क्रीमी लेयर से आशय किसी आरक्षित सामाजिक समूह के अपेक्षाकृत संपन्न और सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके वर्ग से है. आंदोलन यह भी चाहता है कि यदि किसी परिवार के सदस्य को पहले आरक्षण का लाभ मिल चुका है तो परिवार को दोबारा आरक्षित पदों के लिए आवेदन करने से रोका जाए.
हालांकि, क्रीमी लेयर को लेकर यह मांग पहली नजर में असामान्य लगती है. इसका कारण यह है कि क्रीमी लेयर को बाहर करने से सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित सीटों की संख्या नहीं बढ़ती. यानी सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को अतिरिक्त सीटें नहीं मिलतीं. इसके बावजूद आरक्षण विरोधी समूह इसे अपनी प्रमुख मांगों में शामिल कर रहे हैं.
आरक्षण का उद्देश्य क्या है?
इस सवाल को समझने के लिए यह समझना जरूरी है कि भारत में जाति आधारित आरक्षण की मूल अवधारणा क्या है. आरक्षण गरीबी उन्मूलन की योजना नहीं है. गरीबी कम करने के लिए सरकार की अलग-अलग कल्याणकारी योजनाएं मौजूद हैं. जाति आधारित आरक्षण का दायरा भी सीमित है और यह मुख्य रूप से सरकारी नौकरियों तथा उच्च शिक्षा जैसे क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व बढ़ाने से जुड़ा है.
आरक्षण का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित जातियों और समुदायों को उन संस्थानों में प्रतिनिधित्व देना है, जहां लंबे समय तक ऊंची जातियों का वर्चस्व रहा है. इसके जरिए इन समुदायों के लोगों को प्रशासन, शिक्षा और राज्य की महत्वपूर्ण संस्थाओं में प्रवेश का अवसर मिलता है.
इसका व्यापक तर्क यह है कि जब अलग-अलग सामाजिक समूह राज्य और संस्थानों में प्रतिनिधित्व हासिल करेंगे तो नीतियों और समाज को प्रभावित करने की उनकी क्षमता भी बढ़ेगी. इस अर्थ में आरक्षण का लक्ष्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि वंचित समुदायों के भीतर नए सामाजिक और आर्थिक नेतृत्व का निर्माण करना भी है.
क्रीमी लेयर पर विवाद क्यों?
क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर करने के समर्थकों का तर्क है कि इससे आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुंचेगा जो अभी तक इससे वंचित हैं. लेकिन आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो केवल क्रीमी लेयर को बाहर करने से आरक्षण के तहत उपलब्ध नौकरियों और सीटों की संख्या नहीं बढ़ती. ऐसे में बड़ी आबादी के लिए आरक्षण का लाभ उपलब्ध कराने की समस्या पूरी तरह हल नहीं होती.
इसके अलावा, किसी समुदाय के भीतर एक शिक्षित और आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग का निर्माण आरक्षण की प्रक्रिया का ही एक परिणाम माना जा सकता है. सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग बनने में कई पीढ़ियां लग सकती हैं.
भारत के उच्च जाति समूहों के बीच लंबे समय से चली आ रही सामाजिक और आर्थिक पूंजी इसके उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है. कई परिवारों में शिक्षा, प्रशासनिक पदों, जमीन और व्यापार से जुड़ी सुविधाएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं. इसके मुकाबले ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को समान सामाजिक पूंजी बनाने का अवसर अपेक्षाकृत हाल के दशकों में मिला है.
2022 में अर्थशास्त्रियों सैम आशर, पॉल नोवोसैड और चार्ली रफकिन के शोध में भी भारत में सामाजिक गतिशीलता को वैश्विक मानकों की तुलना में कमजोर बताया गया. उनके अध्ययन के अनुसार उच्च जाति समूहों में समय के साथ ऊपर उठने की दर लगातार मजबूत रही है. यह उस धारणा को चुनौती देता है कि उच्च जातियों के लिए सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ना लगातार मुश्किल होता जा रहा है.
आरक्षण से बने नए अभिजात वर्ग पर असर
इसी संदर्भ में क्रीमी लेयर का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है. आरक्षण का उद्देश्य यदि वंचित समुदायों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना है तो इन समुदायों के भीतर से शिक्षित और प्रभावशाली वर्ग का उभरना उस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
आरक्षण से लाभ पाने वाले परिवारों की अगली पीढ़ियां शिक्षा, प्रशासन और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अधिक मजबूत स्थिति हासिल कर सकती हैं. समय के साथ यही वर्ग अपने समुदायों के सामाजिक और राजनीतिक हितों का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता विकसित कर सकता है.
क्रीमी लेयर को बाहर करने की नीति इस प्रक्रिया को सीमित कर सकती है. आरक्षण से बने नए सामाजिक अभिजात वर्ग को आगे बढ़ने से रोकने पर उन समुदायों के लिए लंबे समय से चली आ रही सामाजिक असमानता को कम करना कठिन हो सकता है.
सुप्रीम कोर्ट और क्रीमी लेयर
क्रीमी लेयर की अवधारणा को सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण से जुड़े एक फैसले में स्थापित किया था. इसके तहत पिछड़े वर्गों के अपेक्षाकृत संपन्न हिस्से को आरक्षण के दायरे से बाहर करने की व्यवस्था बनी.
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में भी क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू करने से जुड़ा मुद्दा है. ऐसे में आरक्षण हटाओ आंदोलन जैसी संस्थाओं द्वारा इस मांग को प्रमुखता देना महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा सकता है.
इसका सीधा संबंध सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या से नहीं है. बल्कि इसका असर आरक्षण के जरिए पिछले कुछ दशकों में उभरे गैर-उच्च जाति के शिक्षित और प्रभावशाली वर्ग पर पड़ सकता है.
इस नजरिए से क्रीमी लेयर की मांग को केवल आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग के तौर पर देखना अधूरा होगा. यह बहस इस बड़े सवाल से भी जुड़ी है कि क्या आरक्षण का उद्देश्य केवल सीमित संख्या में नौकरियों और सीटों का वितरण है या फिर ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के भीतर ऐसा सामाजिक नेतृत्व तैयार करना भी है जो राज्य और समाज में उनके हितों का प्रतिनिधित्व कर सके.

