बेटे के केस में बंदी संजय ने मीडिया पर की कार्रवाई
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री बंदी संजय कुमार के बेटे पर लगे पॉक्सो आरोपों के मामले में तेलंगाना पुलिस की भूमिका लगातार सवालों के घेरे में है. 8 मई को मामला दर्ज होने के बाद भी एक सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आरोपी बंदी साई बागीरथ की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है. इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी टिप्पणी करते हुए साउथ फर्स्ट में पत्रकार जी एस वासु ने राज्य पुलिस और सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
साउथ फर्स्ट की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने आरोपी को पेश होने का नोटिस उसके करीमनगर स्थित चाचा के जरिए भेजा, जबकि केंद्रीय मंत्री का हैदराबाद के बंजारा हिल्स स्थित सरकारी आवास पुलिस के लिए कोई अज्ञात पता नहीं है. ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर पुलिस आरोपी तक पहुंचने में असफल क्यों रही. आम नागरिकों से जुड़े मामलों में पुलिस जिस तेजी से कार्रवाई करती है, वैसी तत्परता इस मामले में दिखाई नहीं दी.
मामले की सुनवाई के दौरान तेलंगाना हाईकोर्ट में सरकारी पक्ष की तैयारी भी कमजोर दिखाई दी. लोक अभियोजक अदालत में पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए तुरंत दसवीं की मार्कशीट या पासपोर्ट जैसे सामान्य दस्तावेज तक पेश नहीं कर सके. आरोपी पक्ष ने पीड़िता की उम्र पर सवाल उठाए, जिसके बाद अभियोजन की तैयारी पर और सवाल खड़े हुए. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज करने से पहले पुलिस ने सभी रिकॉर्ड की जांच की होगी, इसलिए अदालत में इस तरह की कमजोरी हैरान करने वाली है.
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि जमानत पर विचार करते समय अदालत तीन प्रमुख बिंदुओं को देखती है — आरोपी के फरार होने की संभावना, जांच को प्रभावित करने की आशंका और अपराध की गंभीरता. इस मामले में आरोपी एक सप्ताह से गायब है, जबकि उसके पिता सार्वजनिक रूप से उसे निर्दोष बता चुके हैं. ऐसे में जांच प्रभावित होने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
रिपोर्ट में तेलंगाना सरकार के “दोहरे रवैये” पर भी सवाल उठाए गए हैं. आमतौर पर चर्चित मामलों में राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों की सेवाएं लेती रही है, लेकिन इस मामले में केवल लोक अभियोजक पर निर्भर रहा गया. तुलना करते हुए रिपोर्ट में उस मामले का जिक्र किया गया जिसमें एक बीआरएस कार्यकर्ता को एक्स पर पोस्ट रीट्वीट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. तब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा को पैरवी के लिए नियुक्त किया था.
इस बीच पीड़िता की मां ने मीडिया के सामने पांच पन्नों का भावुक बयान जारी किया है. उन्होंने कहा कि उनकी बेटी को “सुरक्षा, सम्मान और सार्वजनिक अपमान से मुक्त भविष्य” मिलना चाहिए. मां ने आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर उनकी नाबालिग बेटी की तस्वीरें और वीडियो फैलाए जा रहे हैं, लेकिन पुलिस की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है.
मां ने कहा कि परिवार ने पुलिस से सीसीटीवी फुटेज, एफआईआर रिकॉर्ड, स्टेशन डायरी और इलेक्ट्रॉनिक सबूत सुरक्षित रखने की मांग की है ताकि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच हो सके. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उम्र से जुड़े रिकॉर्ड में विसंगतियों को ठीक करने की प्रक्रिया इस विवाद से पहले ही शुरू की जा चुकी थी. उनके अनुसार, “दस्तावेजों में तकनीकी विसंगतियां किसी बच्ची की पीड़ा को खत्म नहीं कर सकतीं और न ही पॉक्सो कानून के तहत मिलने वाली सुरक्षा को कमजोर कर सकती हैं.”
पूरे मामले ने तेलंगाना पुलिस और सरकार की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. विपक्षी दलों से लेकर सामाजिक संगठनों तक, कई लोग पूछ रहे हैं कि अगर आरोपी कोई सामान्य व्यक्ति होता, तब भी क्या पुलिस इतनी ही धीमी कार्रवाई करती?
बेटे के केस में बंदी संजय ने मीडिया पर की कार्रवाई
वहीं, लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, बंदी संजय ने हैदराबाद सिटी सिविल कोर्ट में अर्जी देकर विभिन्न मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों और कुछ अज्ञात लोगों द्वारा उनके बारे में पोस्ट की गई कथित तौर पर मानहानिकारक सामग्री को हटाने की मांग की है. मंत्री ने कई मीडिया संस्थानों, सोशल मीडिया कंपनियों और अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ याचिका दायर की है.
जिसमें गूगल एलएलसी, मेटा (फेसबुक/इंस्टाग्राम) और एक्स कॉर्प, टीवी9 तेलुगु, टीवी5 न्यूज़, एबीएन तेलुगु, साक्षी टीवी, एनटीवी, आरटीवी और ईनाडु टेलीविजन (ईटीवी) सहित 20 से अधिक प्रमुख चैनल शामिल है. साथ ही जॉन डो’ क्लॉज के तहत उन अज्ञात व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है, जो सोशल मीडिया पर यह सामग्री साझा कर रहे हैं.

