एक साल बाद भी अहमदाबाद ड्रीमलाइनर आपदा का कोई जवाब नहीं; “टेकऑफ के 32 सेकंड बाद क्यों गिर गया था?”
पिछले वर्ष 12 जून को एयर इंडिया की उड़ान AI171 ने अहमदाबाद से लंदन के लिए उड़ान भरी थी. टेकऑफ के महज 32 सेकंड बाद विमान का थ्रस्ट (प्रणोदक बल) खत्म हो गया और वह हवाई अड्डे के बाहर घनी आबादी वाले इलाके में दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इस भीषण हादसे में कुल 260 लोगों (विमान में सवार 241 यात्री व चालक दल और जमीन पर मौजूद 19 लोग) की दर्दनाक मौत हो गई थी, जबकि केवल एक ब्रिटिश यात्री जीवित बचा था. लेकिन, एक साल बाद भी यह पता नहीं चला है कि “टेकऑफ के 32 सेकंड बाद यह बोइंग विमान आसमान से नीचे क्यों गिर गया था?”
अंतर्राष्ट्रीय विमानन नियमों के अनुसार, हादसे के एक साल के भीतर अंतिम रिपोर्ट सौंपना अनिवार्य होता है. लेकिन, भारत का विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) इस महत्वपूर्ण समय-सीमा से चूक गया है, जैसा कि परन बालकृष्णन अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं. उनका कहना है कि अंतिम जांच रपट के बजाय, अब एक स्टेटस अपडेट (स्थिति विवरण) जारी किया जा रहा है. जांच में हो रही इस देरी का मुख्य कारण अमेरिका में विमान के जीई एयरोस्पेस इंजनों की जटिल तकनीकी जांच का अधूरा होना है. विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक जेट इंजनों को पूरी तरह खोलकर विश्लेषण करने में समय लग रहा है और अंतिम रिपोर्ट आने में अभी कम से कम तीन महीने का समय और लग सकता है.
जांचकर्ताओं (जिसमें भारत, अमेरिका, बोइंग और अमेरिकी एनटीएसबी शामिल हैं) ने शुरुआती फोरेंसिक विश्लेषण में किसी भी तरह की यांत्रिक विफलता (मैकेनिकल फेलियर) या तोड़फोड़ (सबोटॉज) की संभावना को पूरी तरह खारिज कर दिया है. इसके बाद, जांच का मुख्य केंद्र बिंदु पायलटों की गतिविधियां बन गया है.
जुलाई 2025 में जारी एएआईबी की प्रारंभिक रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ था कि उड़ान भरने के तुरंत बाद कॉकपिट में मौजूद दो "फ्यूल-कंट्रोल स्विच" अचानक 'रन' से 'कट-ऑफ' स्थिति में आ गए थे. चूंकि इन स्विचों को उड़ान के दौरान कभी नहीं छुआ जाता, इसलिए इनके बंद होते ही इंजनों को ईंधन मिलना बंद हो गया और विमान क्रैश हो गया. कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर के अनुसार, एक पायलट ने दूसरे से पूछा भी था कि उसने स्विच क्यों बंद किए, जिस पर दूसरे ने मना कर दिया था. हालांकि, ‘रॉयटर्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि कैप्टन ने ही ईंधन की आपूर्ति बंद की होगी.
इस निष्कर्ष पर तीखा विवाद छिड़ गया. 'फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स' ने जांचकर्ताओं की "पायलट आत्महत्या (सुसाइड) थ्योरी" का कड़ा विरोध किया. यूनियन के अध्यक्ष सी.एस. रंधावा ने सरकार से अंतरिम रिपोर्ट जारी न करने की मांग की है, क्योंकि इससे अफवाहें और गलतफहमियां बढ़ेंगी. उनका कहना है कि अधिकारियों को केवल पायलटों को दोषी ठहराने के बजाय एयर इंडिया के विमानों में बार-बार होने वाली तकनीकी गड़बड़ियों और मेंटेनेंस (रखरखाव) रिकॉर्ड की भी गहन जांच करनी चाहिए. मृत कैप्टन के परिवार ने भी इस थ्योरी को सिरे से नकारा है और पायलट के पिता ने स्वतंत्र जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.
इसके विपरीत, एयर इंडिया ने रखरखाव में लापरवाही के आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि घटना के बाद उन्होंने डीजीसीए की देखरेख में अपने पूरे बोइंग 787 बेड़े की सुरक्षा जांच के लिए उड़ानों को कुछ समय के लिए कम कर दिया था.
यह आपदा केवल एयर इंडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक व्यावसायिक और वैश्विक निहितार्थ हैं: बोइंग पर संकट: बोइंग कंपनी के लिए यह उसकी साख का सवाल है, जो पहले से ही गुणवत्ता नियंत्रण और सुरक्षा संबंधी विवादों से जूझ रही है. अहमदाबाद हादसे से पहले तक बोइंग 787 ड्रीमलाइनर का सुरक्षा रिकॉर्ड बेदाग था और कभी कोई घातक दुर्घटना नहीं हुई थी. हालांकि, 2013 में बैटरी खराबी के कारण इस बेड़े को ग्राउंडेड किया गया था. इसके अलावा, कंपनी के पूर्व गुणवत्ता प्रबंधक जॉन बार्नेट और जोशुआ डीन जैसे व्हिसलब्लोअर्स की रहस्यमयी मौतों (जिसका जांच में व्हिसलब्लोइंग से कोई सीधा संबंध नहीं मिला) ने पहले ही बोइंग पर जनता के भरोसे को कमजोर किया था.
एयर इंडिया और टाटा समूह: निजीकरण के बाद टाटा समूह के स्वामित्व में वापसी (टर्नअराउंड) का प्रयास कर रही एयर इंडिया के लिए यह आपदा एक बेहद संवेदनशील समय पर आई है. कंपनी पहले से ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं और अंतरराष्ट्रीय हवाई मार्गों को प्रभावित करने वाले ईरान संघर्ष जैसी चुनौतियों से जूझ रही है.
पीड़ितों के परिवारों की मांग और मुआवजा
दुर्घटना की पहली बरसी पर पीड़ितों के परिवार न्याय और स्पष्टता की मांग कर रहे हैं. हादसे में अपने भाई को खोने वाले एकमात्र जीवित बचे यात्री, विश्वास कुमार रमेश ने जांच में पूर्ण ईमानदारी और पारदर्शिता की मांग की है. यूके की एक लॉ फर्म के अनुसार, कई परिवार इस हादसे के लिए जिम्मेदार संभावित पक्षों के खिलाफ दीवानी दावों (सिविल क्लेम्स) पर कानूनी विचार कर रहे हैं.
दूसरी ओर, टाटा समूह और एयर इंडिया ने बताया कि उन्होंने चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन द्वारा घोषित 1 करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि (एक्स-ग्रेशिया पेमेंट) को करीब 96 प्रतिशत प्रभावित परिवारों में वितरित कर दिया है, हालांकि इसे अंतिम कानूनी समझौता नहीं माना गया है.
इतने बड़े हादसे के साल भर बाद भी विमानों को उड़ान-योग्य रखने वाली डीजीसीए की इकाई आधी खाली
एयर इंडिया उड़ान 171 की भयावह आपदा के बाद देश की विमानन सुरक्षा को सुदृढ़ करने के सरकारी दावों के विपरीत, वास्तविक स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. कुणाल पुरोहित के अनुसार, 'द वायर' द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त नवीनतम आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि विमानों की सुरक्षा प्रमाणित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण इकाई—उड़ान योग्यता निदेशालय (डीएडब्ल्यू)—हादसे के पहले की तुलना में अब और भी अधिक कर्मचारियों की कमी से जूझ रही है.
आंकड़ों के अनुसार, निदेशालय (डीएडब्ल्यू) में स्वीकृत कुल 310 पदों में से 136 पद (यानी लगभग 44 प्रतिशत) वर्तमान में खाली पड़े हैं. पिछले साल जुलाई में यह संख्या 133 थी, जो कम होने के बजाय अब और बढ़ गई है. चौंकाने वाली बात यह है कि आपदा के बाद के 11 महीनों में सरकार द्वारा इस विभाग में एक भी नई नियुक्ति नहीं की गई और न ही सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कोई नया पद सृजित किया गया. यह स्थिति सरकार और नागरिक उड्डयन मंत्री के उन आश्वासनों पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिनमें विमानन सुरक्षा में दीर्घकालिक सुधार करने और कोई कसर न छोड़ने की बात कही गई थी.
उड़ान योग्यता निदेशालय (डीएडब्ल्यू) नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) की एक फ्रंट-लाइन (अग्रिम पंक्ति) सुरक्षा और ऑडिट इकाई है. इसके मुख्य कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: विमानों को उड़ान भरने के लिए पूरी तरह उपयुक्त होने का प्रमाणपत्र देना, उड़ानों और उनके चालक दल (क्रू) की औचक व आकस्मिक जांच करना और विमानों के रख-रखाव, मरम्मत और ओवरहालिंग (एमआरओ) करने वाले केंद्रों का विस्तृत ऑडिट करना.
विमानन सुरक्षा में इसकी महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डीजीसीए की वर्ष 2026-27 की वार्षिक निगरानी योजना के तहत तय किए गए कुल 5,435 ऑडिटों में से अकेले 1,802 ऑडिट (यानी हर तीन में से एक जांच) इसी निदेशालय द्वारा किए जाने निर्धारित हैं. इन जांचों में रात का निरीक्षण, रनवे, हैंगर और रैंप पर विमानों की तकनीकी जांच शामिल हैं, जो यात्री सुरक्षा की रीढ़ मानी जाती हैं.
निदेशालय इस समय नाममात्र के स्टाफ के सहारे इतने बड़े कार्यभार को संभाल रहा है: अग्रिम पंक्ति के अधिकारी : ग्राउंड लेवल पर ऑडिट करने वाले एयरवर्दीनेस ऑफिसर्स के स्वीकृत 121 पदों में से केवल 52 पद ही भरे हुए हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि लगभग 57% पद खाली पड़े हैं. सबसे गंभीर स्थिति शीर्ष स्तर पर है. पूरे देश में संचालन की देखरेख के लिए स्वीकृत उड़ान योग्यता निदेशकों के सभी 18 पद (100 फीसदी) पूरी तरह खाली पड़े हैं.
डीएडब्ल्यू के पूर्व निदेशक राजेंद्र प्रसाद के अनुसार, विमान के रख-रखाव से लेकर उसके कल-पुर्जों को बदलने और यहाँ तक कि विमान पर कोई विज्ञापन चिपकाने तक के लिए इस निदेशालय की तकनीकी मंजूरी अनिवार्य होती है. कर्मचारियों की इतनी भारी कमी के कारण आवश्यक निगरानी और सर्विलांस का काम बुरी तरह प्रभावित होता है. ऐसी स्थिति में, अधिकारी तय लक्ष्यों को जल्दबाजी में पूरा करने के लिए केवल सतही और ऊपर से दिखने वाली छोटी-मोटी कमियों की जांच करते हैं और गहरे तकनीकी पहलुओं को छोड़ देते हैं. एयरलाइन ऑपरेटर भी इस शॉर्टकट संस्कृति का स्वागत करते हैं, क्योंकि वे खुद गहन निरीक्षण से बचना चाहते हैं.
निगरानी और ऑडिट तंत्र के कमजोर होने के गंभीर परिणाम पहले ही सामने आने लगे हैं: इस वर्ष फरवरी में एयर इंडिया को डीएडब्ल्यू से आवश्यक सुरक्षा मंजूरी (क्लियरेंस) प्राप्त किए बिना ही कम से कम आठ बार बड़े शहरों (दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु) के लिए विमान संचालित करते पाया गया. पिछले साल जुलाई में यह उजागर हुआ कि एयर इंडिया ने यूरोपीय संघ सुरक्षा एजेंसी (ईएएसए) द्वारा विमान के इंजन के पुर्जे बदलने के निर्देश को न केवल नजरअंदाज किया, बल्कि उसका पालन दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेज भी तैयार किए.
एयर इंडिया के एक अन्य वार्षिक ऑडिट में पर्याप्त पायलट ट्रेनिंग न होने और गैर-मंजूरशुदा सिमुलेटरों के उपयोग जैसी 51 से अधिक सुरक्षात्मक कमियां पाई गईं. संसद में पेश सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में देश के हवाई क्षेत्र में सुरक्षा उल्लंघनों और तकनीकी गड़बड़ियों में भारी उछाल आया है. वर्ष 2025 में प्रतिदिन औसतन लगभग एक तकनीकी खराबी दर्ज की गई (कुल 353 मामले) और इस दौरान अनुसूचित एयरलाइनों से जुड़ी 11 गंभीर घटनाएं भी सामने आईं.
कुलमिलाकर, विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि पदों के खाली रहने से विमानन इकोसिस्टम के भीतर लापरवाही की एक खतरनाक संस्कृति जन्म ले रही है. पांच सतही जांचों की तुलना में एक गहन जांच सुरक्षा के लिहाज से कहीं अधिक प्रभावी होती है. यदि समय रहते इन खाली पदों को भरकर निगरानी तंत्र को दुरुस्त नहीं किया गया, तो विमानों के पुराने होने के साथ-साथ यह लापरवाही भविष्य में किसी और बड़ी विमानन आपदा का कारण बन सकती है.

