राकेश कायस्थ | किसने चुराई हमारी नीली जर्सी?
जिस तरह राम मंदिर में चढ़ावा लूट लिया गया. जिस तरह जनता की गाढ़ी कमाई जेब में आते ही छूत-मंतर हो जाती है, जिस पुल नदी में छलांग लगाकर आत्महत्या कर लेते हैं और सुसाइड नोट में लिख जाते हैं कि मैंने बालू और सीमेंट नहीं खाया, जिस तरह इस देश में विधायक और सांसद चोरी हो जाते हैं, उसी तरह हम सबकी आँखों में बसी भारतीय हॉकी टीम की नीली जर्सी भी चोरी हो गई. नीला यानी सपनों का रंग, आसमान का रंग, वो रंग जिसे देखकर हर हिंदुस्तानी के मन में जगते थे अरमान—हॉकी का सुनहरा दौर फिर से वापस आएगा.
सुनहरा दौर आया भी. चार दशक के लंबे इंतज़ार के बाद भारत ने टोकियो ओलंपिक में ब्रांज मेडल जीता और यही कारनामा पेरिस के अगले ओलंपिक में भी दोहराया. बैक टू बैक दो मेडल, वो भी चार दशक के इंतज़ार के बाद.
अनगिनत यादें जुड़ी हैं, इस नीली जर्सी के साथ. संघर्ष की, सपनों का पीछा करने की, बार-बार गिरने की और गिरकर फिर से उठ खड़े होने की यादें. आखिर ये नीली जर्सी गई कहाँ? वीरेंद्र रसकिन्हा से लेकर धुरंधर धनराज पिल्ले और 1980 में भारत को अंतिम बार ओलंपिक में गोल्ड मेडल दिलाने वाले कप्तान भास्करन तक पूछ रहे हैं कि हमारी पहचान रातों-रात क्यों मिटा दी गई?
हॉकी इंडिया फेडरेशन के अध्यक्ष और भारत के लिए 412 मैच खेल चुके दिलीप तिर्की हैरान हैं कि ये सब उनकी जानकारी के बिना हो गया. दिलीप तिर्की ने हॉकी फेडरेशन का कामकाज देख रहे अधिकारियों को ईमेल भेजकर पूछा है कि ऐसा क्यों हुआ? अभी तक ये साफ नहीं हो पाया है कि इसका मास्टर माइंड कौन है?
नीली जर्सी का गायब होना जितनी बड़ी खबर है, उतनी ही बड़ी खबर है चोर दरवाज़े से चुपचाप भारतीय जर्सी का भगवा कर दिया जाना. अब आपके दिल में बसी भारतीय टीम टर्फ पर उतरेगी तो देखकर लगेगा कांवड़ियों के जत्थे ने हॉकी स्टिक उठा लिया है. टीम इंडिया को चीयर करने के बदले जय श्रीराम बोलिए. वैसे आजकल कांवड़िये भी बोल बम या हर-हर महादेव नहीं बल्कि जय श्रीराम ही बोल रहे हैं.
जर्सी एक खिलाड़ी के लिए वैसी ही चीज़ होती है, जैसे लेखक के लिए उसकी अपनी भाषा, गायक के लिए आवाज़ और सैनिक के लिए देश. बरसों तक मेन इन ब्लू सुनने के आदी रहे खिलाड़ी अब किस नाम से पुकारे जाएंगे? जर्सी एक तरह का ब्रांड है और बनाने वाले जानते हैं कि एक ब्रांड को खड़ा करने में किस तरह की परिकल्पना, श्रम और समय लगता है.
चोर दरवाज़े से नीली जर्सी को भगवा करने वालों ने जीवन में आज तक कुछ नहीं बनाया है. या तो चुराया है, या फिर तोड़ा है. उन्हें लगता है कि वो कुछ प्रतीकों को चुपके से ठेलकर इस देश की समस्त चेतना पर हावी हो जाएंगे. उन्हें मालूम नहीं कि ये पैंतरे लोगों में उनके प्रति घिन पैदा कर रहे हैं.
भगवा ब्रिगेड की हरकतें कुछ वैसी ही हैं, जैसी अफगानिस्तान पर दोबारा कब्जे के बाद तालिबान के रंगरूटों की थीं. वो सरकारी दफ्तरों की बड़ी कुर्सियों में बैठकर खुशी से गोल-गोल घूम रहे थे, लेकिन ये पता नहीं था कि यहां बैठकर करना क्या है. भारत में इस समय जो कुछ हो रहा है, इतिहास खामोशी से उसे दर्ज कर रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां यकीन कर सकें कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक दौर ऐसे लोगों का भी था.

