‘सैनिटाइज्ड रिपब्लिक’: जाति और ठेका श्रम पर बनी फिल्म की स्क्रीनिंग तीसरी बार रोकी गई

'द मूकनायक' में गीता सुनील पिल्लई ने लिखा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान दिल्ली के दो बड़े अस्पतालों में काम करने वाले सफाई कर्मचारियों पर बनी डॉक्यूमेंट्री 'सैनिटाइज्ड रिपब्लिक: कास्ट(ई) एंड कॉन्ट्रैक्ट्स' की स्क्रीनिंग तीसरी बार रोक दी गई है. अफिया खालिद और रिजवान रहमान द्वारा निर्देशित यह फिल्म केरल के 18वें इंटरनेशनल डॉक्यूमेंट्री एंड शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल ऑफ केरल के लिए आधिकारिक रूप से चुनी गई थी. 25 से 30 सितंबर के बीच तिरुवनंतपुरम में होने वाले महोत्सव में इसे दिखाया जाना था, लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से जरूरी सेंसर छूट नहीं मिलने के कारण स्क्रीनिंग रोक दी गई.

मंत्रालय ने महोत्सव की 31 फिल्मों को अनुमति नहीं दी है. इससे पहले फिल्म को दुर्गापुर फिल्म फेस्टिवल और ऋतु रंगम फिल्म फेस्टिवल में भी स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं मिली थी.

फिल्म दिल्ली के कलावती सरन चिल्ड्रन हॉस्पिटल और लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में काम करने वाले सफाई कर्मचारियों की कहानी पर आधारित है. इनमें बड़ी संख्या दलित और हाशिए के समुदायों से आने वाले कर्मचारियों की है. कोविड के दौरान इन कर्मचारियों ने संक्रमण के जोखिम के बीच अस्पतालों को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. निर्देशकों के मुताबिक, उन्होंने अपने नियमित काम के अलावा अतिरिक्त और कई बार बिना भुगतान वाला काम भी किया. उन्हें उम्मीद थी कि महामारी के बाद उन्हें स्थायी रोजगार मिलेगा, लेकिन जून 2022 में उनकी नौकरियां चली गईं.

इसके बाद फिल्म उनके रोजगार, सम्मान और अधिकारों के लिए संघर्ष को दर्ज करती है. निर्देशकों के मुताबिक, फिल्म का केंद्रीय सवाल है कि सफाई का काम आज भी जाति से क्यों जुड़ा हुआ है और जरूरी सेवाएं देने वाले कर्मचारियों को बार-बार असुरक्षित ठेका रोजगार में क्यों धकेला जाता है.

फिल्मकारों का कहना है कि मंत्रालय की आपत्तियां भी हर बार बदलती रहीं. शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कोविड लॉकडाउन की घोषणा के कुछ सेकंड के ऑडियो पर आपत्ति जताई गई. इसे फिल्म से हटा दिया गया. इसके बाद प्रधानमंत्री से जुड़े कुछ "विशिष्ट संदर्भों" पर आपत्ति जताई गई और फिल्म में फिर बदलाव किए गए, लेकिन इसके बावजूद अनुमति नहीं मिली.

निर्देशकों का कहना है कि उन्हें मंत्रालय की वास्तविक आपत्ति की जानकारी नहीं दी गई. उनके मुताबिक, फिल्म केवल जाति और ठेका श्रम पर केंद्रित है और इसमें कर्मचारियों के अपने अनुभव दर्ज किए गए हैं.

करीब 19 मिनट 30 सेकंड की डॉक्यूमेंट्री तीन चरणों में शूट हुई. कई कर्मचारी फिल्म पूरी होने तक करीब तीन वर्षों से स्थायी रोजगार से बाहर थे और आर्थिक संकट झेल रहे थे. फिल्मकारों का कहना है कि यदि यह फिल्म सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं होती है तो सबसे बड़ा नुकसान उनका नहीं, बल्कि उन कर्मचारियों का होगा जिन्होंने अपने अनुभव कैमरे के सामने रखे.

फिल्म का अब तक आधिकारिक प्रीमियर नहीं हुआ है और यह ऑनलाइन भी उपलब्ध नहीं है. निर्देशकों ने आगे सीमित स्क्रीनिंग आयोजित करने और बाद में इसे अपने यूट्यूब चैनल 'काउबेल्ट स्टूडियोज' पर जारी करने की योजना बताई है.

Previous
Previous

उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं का प्रभाव

Next
Next

श्रवण गर्ग | ये चुनाव आयोग में मतभेद नहीं, दो लोगों का विद्रोह है