उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं का प्रभाव
दलित मतदाताओं के बीच बसपा अब भी सबसे लोकप्रिय विकल्प रही है, लेकिन खासकर गैर-जाटव दलितों के बीच भाजपा लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रही है
'द हिंदू' में संजय कुमार और विभा अत्री ने लिखा है कि उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों में अभी छह महीने से अधिक का समय है, लेकिन राजनीतिक दल मतदाताओं को लामबंद करने वाले मुद्दों की तलाश में जुट गए हैं. हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली और उसके बाद कुछ लोगों द्वारा की गई पूजा, जिसे शुद्धिकरण पूजा बताया गया, ऐसा ही एक मुद्दा बनकर उभरा है. कांग्रेस इसे दलित समुदायों के बीच अपनी अपील बढ़ाने के अवसर के रूप में देख रही है, हालांकि राज्य में उसका दलित समर्थन फिलहाल बहुत सीमित है.
उत्तर प्रदेश में बड़ा सवाल यह है कि दलित वोट अब कितना स्थानांतरित होने वाला है और 2027 में कौन-सा दल या गठबंधन इसे बड़े पैमाने पर अपने पक्ष में कर पाता है.
दलित वोट का पैटर्न
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) लंबे समय से दलित मतदाताओं के बीच सबसे लोकप्रिय विकल्प रही है. इसका प्रभाव जाटवों में अधिक और गैर-जाटव दलितों में अपेक्षाकृत कम रहा है. 2007 के विधानसभा चुनाव में, जब बसपा सत्ता में आई थी, तब 86% जाटवों ने बसपा को वोट दिया था, जबकि गैर-जाटव दलितों में यह आंकड़ा 54% था. 2022 के विधानसभा चुनाव तक जाटवों में बसपा का समर्थन घटकर 65% और गैर-जाटव दलितों में 27% रह गया.
दूसरी ओर, भाजपा ने दलित मतदाताओं के बीच उल्लेखनीय बढ़त बनाई है. जाटवों में भाजपा-राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का समर्थन 2002 में केवल 3% था, जो 2022 में बढ़कर करीब 20% हो गया. इसी अवधि में जाटवों के बीच बसपा का समर्थन 76% से घटकर 65% रह गया.
गैर-जाटव दलितों में बदलाव और तेज रहा. भाजपा-राजग का समर्थन 2002 के 12% से बढ़कर 2022 में 40% हो गया, जबकि बसपा का समर्थन 45% से घटकर 27% रह गया. यानी 2002 से 2022 के बीच गैर-जाटव दलितों में भाजपा-राजग का समर्थन 28 प्रतिशत अंक बढ़ा, जबकि जाटवों में यह बढ़ोतरी 17 प्रतिशत अंक रही.
बसपा की कमजोर होती पकड़
उत्तर प्रदेश में बसपा का कुल वोट शेयर भी लगातार घटा है. 2007 में उसका वोट शेयर 30.4% था, जो 2022 में घटकर 12.8% रह गया. इसी अवधि में भाजपा-राजग का वोट शेयर 18.5% से बढ़कर 43.8% और समाजवादी पार्टी तथा उसके सहयोगियों का वोट शेयर 25.4% से बढ़कर 36.3% हो गया.
आंकड़े संकेत देते हैं कि बसपा से दूर हुआ दलित वोट केवल अलग-अलग हिस्सों में बंटा नहीं है, बल्कि उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा भाजपा की ओर गया है, खासकर गैर-जाटव दलितों के बीच.
कांग्रेस की कोशिश
दलित मतदाताओं के बीच कांग्रेस का समर्थन अब भी बेहद कम है. जाटव और गैर-जाटव दोनों समूहों में उसका वोट शेयर ज्यादातर एकल अंक में रहा है. 2012 में गैर-जाटव दलितों के बीच कांग्रेस को 16% समर्थन मिला था, लेकिन यह बदलाव स्थायी नहीं रहा. 2022 तक इस समूह में कांग्रेस का समर्थन घटकर केवल 4% रह गया.
2027 के चुनाव में दलित मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश सभी दल करेंगे. उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि दलित वोट अब किसी एक दल से पहले की तरह मजबूती से जुड़ा नहीं है. बसपा की कमजोर होती पकड़ से भाजपा को विशेष रूप से गैर-जाटव दलितों के बीच लाभ मिला है, जबकि समाजवादी पार्टी ने भी दलित मतदाताओं के बीच अपना एक महत्वपूर्ण आधार बनाए रखा है. कांग्रेस अब तक इस बदलाव की बड़ी लाभार्थी नहीं बन सकी है.
उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए 2027 के चुनाव में उनकी राजनीतिक पसंद महत्वपूर्ण बनी रहेगी. सवाल यह होगा कि कोई दल जाटव और गैर-जाटव दोनों समूहों में कितना व्यापक समर्थन जुटा पाता है.

