मोहम्मद जियाउल्लाह खान | जब मनुस्मृति का बचाव पितृसत्ता में महिलाओं की समानता पर हमला बन जाए

महाराष्ट्र में 22 अगस्त 2026 को छात्राओं से बातचीत के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने "मनुस्मृति की मानसिकता" के खिलाफ बोलते हुए पितृसत्ता को चुनौती देने और महिलाओं की स्वतंत्रता की बात की. इसके बाद मनुस्मृति को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई. सवाल केवल एक प्राचीन ग्रंथ का नहीं, बल्कि उस सामाजिक सोच का है जिसमें महिलाओं की स्वतंत्रता, समानता और निर्णय लेने के अधिकार को सीमित किया गया.

मनुस्मृति का सबसे बड़ा विवाद इसके कुछ ऐसे विचारों को लेकर रहा है, जिनमें महिलाओं को पुरुष संरक्षक के अधीन रखने की बात कही गई है. अक्सर उद्धृत किए जाने वाले श्लोक 5.148 में कहा गया है कि बचपन में महिला पिता के संरक्षण में, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्रों के संरक्षण में रहे तथा स्वतंत्र न रहे. आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में यह विचार गंभीर सवाल खड़े करता है.

यदि किसी महिला को अपने जीवन के फैसले लेने के लिए हमेशा पिता, पति या पुत्र पर निर्भर रहना पड़े, तो फिर उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाता है? आज भारत की महिलाएं डॉक्टर, वैज्ञानिक, न्यायाधीश, वकील, उद्यमी, पत्रकार, सैनिक और राजनीतिक नेता हैं. वे संपत्ति की मालिक हैं, संस्थानों का नेतृत्व करती हैं और अपने भविष्य के फैसले स्वयं लेती हैं. ऐसे में महिलाओं को स्थायी रूप से पुरुष संरक्षण के अधीन रखने वाली सोच को आधुनिक समाज का आदर्श नहीं माना जा सकता.

आलोचकों का कहना है कि मनुस्मृति के कई हिस्सों में महिलाओं को लेकर अविश्वास, नियंत्रण और पुरुष प्रधान व्यवस्था की झलक मिलती है. ऐसी सोच में अक्सर पुरुष के व्यवहार की जिम्मेदारी भी महिला पर डाल दी जाती है. पुरुष स्वयं पर नियंत्रण न रख सके तो महिला को सीमित किया जाए. महिला स्वतंत्रता चाहे तो उसकी निगरानी की जाए. यह नैतिकता नहीं, बल्कि पितृसत्ता को सामाजिक व्यवस्था के रूप में स्थापित करने का प्रयास है.

भारत का इतिहास बताता है कि सामाजिक सुधार हमेशा परंपराओं पर सवाल उठाने से ही आगे बढ़ा है. राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ संघर्ष किया. बाल विवाह, जातिगत भेदभाव और महिलाओं की शिक्षा पर रोक जैसी प्रथाओं को भी सुधारकों ने चुनौती दी. यदि हर सामाजिक बुराई को केवल इसलिए स्वीकार कर लिया जाता कि वह पुरानी परंपरा का हिस्सा है, तो भारत आधुनिक समाज नहीं बन पाता.

इस बहस में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि दूसरे धर्मों और समाजों में भी महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण विचार मौजूद रहे हैं. लेकिन यह तर्क मूल सवाल से ध्यान हटाता है. किसी दूसरी जगह की बुराई किसी विशेष परंपरा की बुराई को सही नहीं बना देती. गलत बात गलत ही रहती है.

असल प्रश्न यह है कि मनुस्मृति को ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में देखा जा रहा है या उसके सामाजिक सिद्धांतों को आज भी सही ठहराया जा रहा है. इतिहास को मिटाने की मांग नहीं की जा रही, लेकिन इतिहास में मौजूद भेदभावपूर्ण विचारों को आधुनिक राजनीति और समाज का आदर्श बनाना निश्चित रूप से सवालों के घेरे में आता है.

भारत का संविधान समानता, स्वतंत्रता और गरिमा को नागरिकों का अधिकार मानता है. संविधान किसी महिला को पिता, पति या पुत्र की संपत्ति नहीं मानता. वह उसे स्वतंत्र नागरिक के रूप में स्वीकार करता है, जिसे शिक्षा, संपत्ति, अवसर और अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार है.

यही कारण है कि मनुस्मृति की आक्रामक रक्षा केवल धार्मिक या सांस्कृतिक बहस नहीं रह जाती. यह महिलाओं की समानता और आधुनिक भारत की संवैधानिक सोच से जुड़ा प्रश्न बन जाती है.

भारत को अपनी सभ्यता और संविधान में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है. लेकिन जब किसी प्राचीन सामाजिक व्यवस्था और एक जीवित महिला की गरिमा के बीच टकराव पैदा हो, तो प्राथमिकता स्पष्ट होनी चाहिए. किसी भी ग्रंथ या परंपरा से ऊपर एक महिला की स्वतंत्रता, समानता और सम्मान है.

भारत आगे बढ़ चुका है. असली सवाल यह है कि क्या राजनीति भी महिलाओं को आगे बढ़ने देगी, या फिर उन्हें अतीत की उन बेड़ियों में वापस ले जाने की कोशिश करेगी जिनसे बाहर आने के लिए सदियों तक संघर्ष करना पड़ा.

(मोहम्मद जियाउल्लाह खान स्वतंत्र पत्रकार हैं.  यह 'काउंटरकरंट्स' में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है. )

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