ओडिशा में खनन विरोध पर सख्ती: दलित-आदिवासी प्रदर्शनकारियों को ज़मानत के बदले पुलिस थाने साफ करने की शर्त
ओडिशा के रायगढ़ा जिले के तिजिमाली इलाक़े में खनन के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन पर 2023 से लगातार सख़्ती बढ़ती जा रही है. दलित और आदिवासी गांव वाले वेदांता लिमिटेड की बॉक्साइट खनन परियोजना का विरोध कर रहे हैं, जिसके लिए कंपनी को 2023 में खनन का ठेका दिया गया था. इस परियोजना के तहत क़रीब 1,560.40 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन होना है, जिसमें लगभग 46.37% ज़मीन जंगल की है. इससे दो गांव मालिपदार (रायगढ़ा) और तिजिमाली (कालाहांडी), पूरी तरह हट जाएंगे और 140 से ज़्यादा परिवार प्रभावित होंगे, जो खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं. गांव वालों का कहना है कि अभी तक मुआवज़े पर कोई साफ बात नहीं हुई है और कई लोग ऐसे हैं जो दूसरों की ज़मीन पर काम करते हैं, इसलिए उन्हें मुआवज़ा भी नहीं मिलेगा.
इस विरोध के दौरान 2023 से अब तक कम से कम 40 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. अगस्त 2023 में ही 24 लोगों को पकड़ा गया था, जब उन्होंने पुलिस और कंपनी के अधिकारियों को इलाके में घुसने से रोका था. सितंबर 2024 में एक बड़े विरोध के बाद पुलिस ने 58 नामज़द और करीब 140 अज्ञात लोगों पर केस दर्ज किया, जिनमें दंगा, सरकारी काम में बाधा और हत्या की कोशिश जैसी गंभीर धाराएं शामिल थीं. जनवरी 2025 में कुमेश्वर नायक नाम के 26 वर्षीय दलित युवक को भी गिरफ्तार किया गया है. वह कांतामाल गांव का रहने वाला है और एक छोटी किराना दुकान चलाता है.
कुमेश्वर नायक को 28 मई 2025 को ओडिशा हाईकोर्ट से ज़मानत मिली, लेकिन इसके साथ एक विवादित शर्त भी रखी गई कि उन्हें हर दिन सुबह 6 बजे से 9 बजे तक काशीपुर पुलिस स्टेशन की सफाई करनी होगी. उन्हें करीब दो महीने तक झाड़ू, फिनाइल और सफाई के सामान से पुलिस स्टेशन साफ करना पड़ा. कुमेश्वर ने बताया कि जेल से निकलने के बाद यह उनके लिए राहत का समय होना चाहिए था, लेकिन यह शर्त उन्हें अपमानित करने के लिए लगाई गई थी. उन्होंने कहा कि पुलिस के कुछ लोग भी इस शर्त से असहज थे और शुरू में उन्हें सिर्फ साइन करके जाने को कहते थे, लेकिन बाद में जब 45 साल के दलित किसान और कार्यकर्ता हिरामल नायक को भी इसी शर्त पर रिहा किया गया था.
आर्टिकल 14 को ऐसे कुल 8 ज़मानत आदेश मिले हैं, जो मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच दिए गए थे. इनमें से 7 रायगढ़ा जिला अदालत के दो जजों, अल्पना स्वैन (एडीजे) और नर्मदा कर (जेएमएफसी) ने दिए थे, जबकि एक आदेश ओडिशा हाईकोर्ट के जज एस.के. पाणिग्रही ने दिया था. इन 8 लोगों में 6 दलित और 2 आदिवासी हैं. इनमें से कम से कम 5 मामलों में यह शर्त लागू भी की गई है. 18 फरवरी 2026 को तीन और लोगों, नारिंग देई माझी, रामाकांत नायक और सुंदर सिंह माझी को एक साल से ज़्यादा जेल में रहने के बाद ज़मानत मिली, लेकिन उन्हें भी दो महीने तक हर सुबह पुलिस स्टेशन साफ करने की शर्त दी गई, इन्हें 25 किलोमीटर दूर से रोज आना पड़ता है.
सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों का कहना है कि ये ज़मानत की शर्तें जातिगत भेदभाव को दिखाती हैं और दलित-आदिवासी समुदाय को अपमानित करने वाली हैं. उनका कहना है कि यह काम ऐतिहासिक रूप से इन्हीं समुदायों से जबरन कराया जाता रहा है. “द लीफलेट” की सितंबर 2025 की रिपोर्ट में भी कहा गया कि इस तरह की शर्तें अदालत की सीमा से बाहर हैं, क्योंकि ज़मानत का मकसद सिर्फ यह सुनिश्चित करना होता है कि आरोपी कोर्ट में पेश हो, न कि उसे सज़ा देना. जबकि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में कुछ मामलों में सामुदायिक सेवा की सज़ा का प्रावधान है, लेकिन कुमेश्वर नायक पर जो धाराएं लगी थीं, जैसे हत्या की कोशिश और दंगा, उनमें ऐसी शर्त लागू नहीं होती हैं.
इस पूरे आंदोलन में “मां माटी माली सुरक्षा मंच” नाम का संगठन सक्रिय है, जिसमें दलित और आदिवासी लोग शामिल हैं. उनका कहना है कि ग्राम सभा की सहमति के बिना खनन किया जा रहा है, जबकि फॉरेस्ट राइट्स एक्ट और पेसा अधिनियम 1996 के तहत यह ज़रूरी है. ग्रामीणों का आरोप है कि फ़र्ज़ी सहमति पत्र बनाए गए, जिनमें नाबालिगों, मृत लोगों और बाहर रहने वालों के नाम शामिल थे. इन आरोपों के कारण लोगों का गुस्सा बढ़ा और बड़े स्तर पर विरोध शुरू हुआ. इस विरोध को दबाने के लिए लगातार कार्रवाई हो रही है. वकील मंगल मूर्ति बेउरिया का कहना है कि पुलिस आदिवासियों के पारंपरिक हथियारों, जैसे कुल्हाड़ी और धनुष को बहाना बनाकर उन पर हमला करने का आरोप लगा देती है. कई लोगों को बार-बार अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार किया गया है. कुछ परिवारों के 5-6 सदस्यों तक पर केस दर्ज हैं. गांवों में डर का माहौल है और लोग बाहर जाने से भी डर रहे हैं.
महिलाओं ने भी इस आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई है. जब पुरुषों को गिरफ्तार किया गया, तब महिलाओं ने गांव संभाला और पुलिस आने पर लोगों को चेतावनी दी. लेकिन उन्हें भी धमकियों का सामना करना पड़ा. कुछ महिलाओं ने आरोप लगाया कि कंपनी से जुड़े लोगों ने उन्हें रेप की धमकी दी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की. इस बीच, जुलाई 2025 में 86 वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर इन जमानत शर्तों को हटाने की मांग की, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

