द ग्रेट भाजपा वाशिंग मशीन
भारतीय राजनीति में इन दिनों एक शब्द की चर्चा खूब हो रही है - ‘भाजपा की वाशिंग मशीन’. यह सिर्फ एक तंज नहीं, बल्कि विपक्ष का वह राजनीतिक आरोप है जो लगातार सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनते रहा है. आरोप यह है कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार, घोटाले, मनी लॉन्ड्रिंग या सत्ता के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगते हैं, जिनके दरवाज़े पर ईडी, सीबीआई या आयकर विभाग की दस्तक सुनाई देती है, वे जैसे ही भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लेते हैं या एनडीए के साथ खड़े हो जाते हैं, उनके खिलाफ़ कार्रवाई की रफ्तार अचानक धीमी पड़ जाती है. कई मामलों में जांच ठंडी पड़ जाती है, फाइलें गायब होने लगती हैं, और कई नेता राजनीतिक पुनर्जन्म के साथ नई भूमिका में दिखाई देने लगते हैं.
हाल ही में आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा समेत कई नेताओं के भाजपा में शामिल होने की चर्चाओं ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है. सवाल वही पुराना है क्या भाजपा सचमुच एक ऐसी ‘वाशिंग मशीन’ बन चुकी है, जहां राजनीतिक दाग सत्ता की चमक में धुल जाते हैं? या यह सिर्फ विपक्ष का गढ़ा हुआ एक प्रभावशाली नैरेटिव है? इस ‘हरकारा एक्सप्लेनर’ में हम उन नेताओं, मामलों और राजनीतिक पैटर्न को समझेंगे, जिनकी वजह से यह जुमला भारतीय लोकतंत्र की सबसे चर्चित राजनीतिक उपमाओं में बदल गया.
भाजपा और केंद्र सरकार इस आरोप को हमेशा खारिज करती रही है. उनका कहना है कि ईडी, सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियां स्वतंत्र रूप से काम करती हैं, कार्रवाई सबूतों के आधार पर होती है और कई मामलों में कमज़ोर साक्ष्यों या न्यायिक प्रक्रिया के कारण जांच की रफ्तार प्रभावित होती है, न कि राजनीतिक हस्तक्षेप से.लेकिन सवाल इसलिए गहरा होता है क्योंकि एक ही पैटर्न बार-बार सामने आता है.
2024 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक पड़ताल में 2014 के बाद ऐसे 25 बड़े विपक्षी नेताओं की पहचान की गई, जो ईडी या सीबीआई की जांच के दायरे में थे और बाद में भाजपा में शामिल हो गए. इनमें से 23 नेताओं को किसी न किसी रूप में राहत मिली है. वहीं 3 मामलों में केस पूरी तरह बंद हो गए, जबकि 20 मामलों में जांच ठंडी पड़ गई. केवल दो नाम ऐसे रहे, जहां जांच में कोई स्पष्ट नरमी नहीं दिखी ज्योति मिर्धा और वाईएस चौधरी.
इन 25 नेताओं में 10 कांग्रेस से, 4-4 एनसीपी और शिवसेना से, 3 टीएमसी से, 2 टीडीपी से, और 1-1 समाजवादी पार्टी तथा वाईएसआर कांग्रेस से थे. सबसे दिलचस्प तथ्य यह था कि इनमें 12 नेता अकेले महाराष्ट्र से थे, जिनमें से 11 ने 2022 के बाद पाला बदला.
इस पूरे नैरेटिव को समझने के लिए सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि घटनाओं की टाइमलाइन देखना ज़रूरी है. कई मामलों में पैटर्न लगभग एक जैसा दिखता है. पहले ईडी/सीबीआई/आईटी की कार्रवाई, फिर राजनीतिक पाला बदलना, और उसके बाद जांच की रफ्तार का धीमा पड़ जाना.
अजित पवार (महाराष्ट्र)
एनसीपी के दिवंगत नेता अजित पवार महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक से जुड़े कथित धनशोधन और अनियमितताओं के मामले में जांच के घेरे में आए. अगस्त 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने अजित पवार, शरद पवार और अन्य नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की. इसी प्राथमिकी के आधार पर सितंबर 2019 में प्रवर्तन निदेशालय ने भी जांच शुरू की.
अक्टूबर 2020 में आर्थिक अपराध शाखा ने समापन रिपोर्ट दाखिल कर दी, लेकिन प्रवर्तन निदेशालय ने इसका विरोध किया. अप्रैल 2022 में प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपपत्र दाखिल किया, लेकिन उसमें अजित पवार का नाम शामिल नहीं था. जून 2022 में शिवसेना टूटने के बाद एकनाथ शिंदे गुट ने भाजपा के साथ सरकार बनाई. इसके बाद अक्टूबर 2022 में मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा ने प्रवर्तन निदेशालय के सबूतों के आधार पर आगे जांच की मांग की.
फिर जुलाई 2023 में अजित पवार खुद एनडीए सरकार में शामिल होकर उपमुख्यमंत्री बने. जनवरी 2024 में आर्थिक अपराध शाखा ने दूसरी समापन रिपोर्ट दाखिल कर दी. बाद में जनवरी 2026 में विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया. फिलहाल इस मामले में कानूनी प्रक्रिया और समापन रिपोर्ट को लेकर बहस जारी है, लेकिन जांच की रफ्तार लंबे समय से लगभग ठहर चुकी दिखती है.
प्रफुल्ल पटेल (महाराष्ट्र)
पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल पर एयर इंडिया के 111 विमानों की खरीद, एयर इंडिया-इंडियन एयरलाइंस विलय और विदेशी एयरलाइंस को लाभ पहुंचाने जैसे मामलों में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय की जांच चल रही थी. मई 2017 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने एयर इंडिया-इंडियन एयरलाइंस विलय मामले में प्राथमिकी दर्ज की. मई 2019 में प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी आरोपपत्र में प्रफुल्ल पटेल का नाम शामिल किया. जून 2023 में वे भाजपा-समर्थित एनडीए खेमे के साथ आ गए.
इसके बाद मार्च 2024 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए समापन रिपोर्ट दाखिल कर दी. फिलहाल यह समापन रिपोर्ट अदालत में लंबित है. मामला कानूनी रूप से पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन जांच की दिशा और गति ने “भाजपा की वाशिंग मशीन” वाले आरोप को और मजबूत किया.
प्रताप सरनाईक (महाराष्ट्र)
शिवसेना नेता प्रताप सरनाईक पर उनकी कंपनियों और एक सुरक्षा फर्म के बीच कथित अनियमितताओं को लेकर प्रवर्तन निदेशालय ने कार्रवाई की. नवंबर 2020 में प्रवर्तन निदेशालय ने मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा की प्राथमिकी के आधार पर छापेमारी की.
जनवरी 2021 में आर्थिक अपराध शाखा ने समापन रिपोर्ट दाखिल की. जून 2021 में सरनाईक ने तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर भाजपा से समझौते की सलाह दी और कहा कि वे प्रवर्तन निदेशालय की “प्रताड़ना” झेल रहे हैं.
जून 2022 में शिवसेना टूटने पर वे एकनाथ शिंदे गुट के साथ भाजपा-समर्थित एनडीए में चले गए. सितंबर 2022 में अदालत ने समापन रिपोर्ट स्वीकार कर ली, जिससे प्रवर्तन निदेशालय का मामला लगभग निष्प्रभावी हो गया. फिलहाल एक अन्य मामले में जांच जारी है, लेकिन इस केस में कार्रवाई लगभग ठंडी पड़ चुकी है.
हिमंत बिस्वा सरमा (असम)
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जब कांग्रेस में थे, तब उन पर शारदा चिटफंड घोटाले में संलिप्तता के आरोप लगे थे. वर्ष 2014 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने उनके आवास और कार्यालयों पर छापेमारी की थी. नवंबर 2014 में उनसे पूछताछ भी की गई.
इसके बाद उनका नाम 2015 में उनका नाम लुई बर्जर रिश्वत मामले में भी आया. इस मामले में राज्य पुलिस की जांच पर सवाल उठे थे. हालांकि अगस्त 2015 में ही हिमंत बिस्वा सरमा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके थे. इसके बाद दोनों मामलों में कोई बड़ी प्रगति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई. इसके बाद मामला खुला तो रहा, लेकिन जांच में कोई बड़ी प्रगति नहीं दिखी. आज वे भाजपा के सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं.
हसन मुश्रीफ (महाराष्ट्र)
एनसीपी नेता हसन मुश्रीफ पर कोल्हापुर की सर सेनापति संताजी घोरपड़े शुगर फैक्ट्री में कथित धनशोधन और किसानों के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगा.
फरवरी और मार्च 2023 में प्रवर्तन निदेशालय ने लगातार तीन बार उनके ठिकानों पर छापेमारी की. एजेंसी का आरोप था कि हजारों किसानों से पूंजी के नाम पर धन जुटाया गया, लेकिन उन्हें शेयर प्रमाणपत्र नहीं दिए गए और यह पैसा कथित रूप से शेल कंपनियों के जरिए परिवार और करीबी रिश्तेदारों से जुड़ी संस्थाओं तक पहुंचाया गया.
जुलाई 2023 में हसन मुश्रीफ अजित पवार के साथ भाजपा-समर्थित एनडीए में शामिल हो गए. इसके बाद न तो कोई नई छापेमारी हुई और न ही जांच में कोई विशेष तेजी दिखाई दी. मामला तकनीकी रूप से खुला है, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार लगभग ठहर चुकी है.
भावना गवली (महाराष्ट्र)
शिवसेना सांसद भावना गवली पर एक ट्रस्ट से करोड़ों रुपये के कथित गबन और धनशोधन का मामला सामने आया. यह मामला यवतमाल-वाशिम क्षेत्र के एक ट्रस्ट से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित था, जिसमें लगभग 17 करोड़ रुपये तक की गड़बड़ी की बात कही गई.
अगस्त 2021 में प्रवर्तन निदेशालय ने उनके ठिकानों पर छापेमारी की. सितंबर 2021 में उनके करीबी सहयोगी सईद खान को गिरफ्तार किया गया. नवंबर 2021 में प्रवर्तन निदेशालय ने ट्रस्ट और सहयोगी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया. एजेंसी ने मुंबई में लगभग 3.75 करोड़ रुपये की एक कार्यालय इमारत भी जब्त की, जिसे इस मामले से जुड़ा बताया गया.
जून 2022 में शिवसेना टूटने के बाद भावना गवली एकनाथ शिंदे गुट के साथ भाजपा-समर्थित एनडीए में शामिल हो गईं. इसके बाद इस मामले में कोई पूरक आरोपपत्र दाखिल नहीं हुआ.
सुवेंदु अधिकारी (पश्चिम बंगाल)
पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी नारदा स्टिंग ऑपरेशन मामले के प्रमुख आरोपियों में गिने जाते हैं. इस मामले में कई तृणमूल कांग्रेस नेताओं पर आरोप था कि वे एक कथित फर्जी कंपनी को लाभ पहुंचाने के बदले नकद राशि लेते या उस पर बातचीत करते कैमरे में दिखाई दिए थे.
अप्रैल 2017 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की. अप्रैल 2019 में सीबीआई ने लोकसभा स्पीकर से अभियोजन की मंजूरी मांगी, क्योंकि कथित घटना के समय सुवेंदु अधिकारी लोकसभा सांसद थे.
दिसंबर 2020 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया. इसके बाद मामला कानूनी रूप से खुला रहा, लेकिन अभियोजन की मंजूरी अब तक लंबित है. फाइल वर्षों से स्पीकर की मेज पर अटकी हुई है और जांच में कोई निर्णायक प्रगति नहीं दिखी.
अशोक चव्हाण (महाराष्ट्र)
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले के प्रमुख आरोपियों में रहे हैं. यह मामला मुंबई की आदर्श कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी में फ्लैट आवंटन और निर्माण नियमों में कथित अनियमितताओं से जुड़ा था.
दिसंबर 2011 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने अशोक चव्हाण के खिलाफ मामला दर्ज किया. आरोप था कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने अतिरिक्त फ्लोर स्पेस इंडेक्स को मंजूरी दी और बदले में अपने रिश्तेदारों के लिए दो फ्लैट सुनिश्चित किए. जुलाई 2012 में सीबीआई ने आरोपपत्र दाखिल किया. इसके आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने भी धनशोधन की जांच शुरू की और उनसे पूछताछ की. जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही पर रोक लगा दी, जिससे मुकदमे की रफ्तार धीमी पड़ गई.
फरवरी 2024 में अशोक चव्हाण कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. इसके बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया. फिलहाल मुकदमे पर रोक जारी है और जांच की दिशा को लेकर राजनीतिक सवाल लगातार उठते रहे हैं.
नवीन जिंदल (हरियाणा)
उद्योगपति और पूर्व कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल का नाम कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में प्रमुख रूप से सामने आया. उन पर आरोप था कि कोयला खदानों के आवंटन में अनियमितताओं के जरिए लाभ प्राप्त किया गया.
जून 2013 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने कोल ब्लॉक आवंटन मामले में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की. वर्ष 2016 और 2017 में उन्हें दो अलग-अलग मामलों में आरोपपत्र का सामना करना पड़ा. इन मामलों में आरोप था कि गलत जानकारी और प्रभाव का उपयोग कर कोयला ब्लॉकों का लाभ लिया गया.
प्रवर्तन निदेशालय ने भी धनशोधन के आरोपों की जांच शुरू की और आरोपपत्र दाखिल किया. अप्रैल 2022 में प्रवर्तन निदेशालय ने विदेशी मुद्रा उल्लंघन से जुड़े एक नए मामले में जिंदल स्टील एंड पावर तथा नवीन जिंदल के ठिकानों पर छापेमारी की.
मार्च 2024 में नवीन जिंदल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. इसके बाद वे भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में उतरे. मामले तकनीकी रूप से अब भी खुले हैं, लेकिन गति धीमी है.
बाबा सिद्दीकी (महाराष्ट्र)
मुंबई के वरिष्ठ नेता रहे दिवंगत बाबा सिद्दीकी के खिलाफ स्लम पुनर्विकास परियोजना से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर प्रवर्तन निदेशालय की जांच शुरू हुई. आरोप था कि इस परियोजना में वित्तीय गड़बड़ी और नियमों के उल्लंघन के जरिए बड़े पैमाने पर लाभ पहुंचाया गया.
मई 2017 में प्रवर्तन निदेशालय ने बाबा सिद्दीकी से जुड़े परिसरों पर छापेमारी की. वर्ष 2018 में एजेंसी ने इस मामले से जुड़े एक डेवलपर की 450 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की. यह मामला मुंबई के एक बड़े स्लम पुनर्विकास प्रोजेक्ट से जुड़ा बताया गया.
फरवरी 2024 में बाबा सिद्दीकी कांग्रेस छोड़कर अजित पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए, जो भाजपा-समर्थित एनडीए का हिस्सा थी. इसके बाद जांच औपचारिक रूप से जारी रही, लेकिन कार्रवाई की गति को लेकर सवाल लगातार उठते रहे.
दिगंबर कामत (गोवा)
गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत का नाम लुई बर्जर जल परियोजना घोटाले और अवैध खनन से जुड़े मामलों में सामने आया. उन पर आरोप था कि जल परियोजना के ठेकों और अन्य प्रशासनिक फैसलों में अनियमितताएं हुईं.
वर्ष 2015 में प्रवर्तन निदेशालय ने लुई बर्जर मामले में उनके घर पर छापेमारी की. बाद में एजेंसी ने उनकी और एनसीपी नेता चर्चिल अलेमाओ से जुड़ी करीब 2 करोड़ रुपये की संपत्तियां भी जब्त कीं. जुलाई 2021 में अदालत ने मामले में आरोप तय किए.
सितंबर 2022 में दिगंबर कामत कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए और अपने साथ कई विधायकों को भी ले गए. इसके बाद मामला कानूनी रूप से जारी रहा, लेकिन राजनीतिक रूप से वे भाजपा के वरिष्ठ विधायक और रणनीतिक चेहरा बन गए.
सी.एम. रमेश (आंध्र प्रदेश)
आंध्र प्रदेश के नेता सी.एम. रमेश का नाम आयकर अनियमितताओं और कथित वित्तीय गड़बड़ियों के मामलों में सामने आया. आरोप था कि उनकी कंपनी से जुड़े परिसरों में लगभग 100 करोड़ रुपये की अनियमितताओं के संकेत मिले.
अक्टूबर 2018 में आयकर विभाग ने उनके ठिकानों पर छापेमारी की. इसके बाद वे उन नेताओं में शामिल थे, जिनके खिलाफ भाजपा सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव ने संसद की आचार समिति को शिकायत भेजी थी.
जून 2019 में सी.एम. रमेश तेलुगु देशम पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. इसके बाद मामले में कोई बड़ी कार्रवाई सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई. आज वे भाजपा के महत्वपूर्ण दक्षिण भारतीय चेहरों में गिने जाते हैं.
गीता कोड़ा (झारखंड)
झारखंड की नेता गीता कोड़ा का नाम सीधे किसी बड़े घोटाले में नहीं, बल्कि उनके पति और पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा से जुड़े मामलों के कारण चर्चा में रहा. मधु कोड़ा पर खनन घोटाला, आय से अधिक संपत्ति और कोल ब्लॉक आवंटन जैसे मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की जांच चलती रही.
सितंबर 2012 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने मधु कोड़ा के खिलाफ कोयला ब्लॉक मामले में प्राथमिकी दर्ज की. दिसंबर 2014 में आरोपपत्र दाखिल हुआ. दिसंबर 2017 में उन्हें सजा सुनाई गई, हालांकि जनवरी 2018 में सजा पर रोक मिल गई.
फरवरी 2024 में गीता कोड़ा कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं. इसके बाद वे भाजपा की प्रमुख आदिवासी महिला चेहरों में शामिल हो गईं. जांच अभी भी अन्य मामलों में जारी है, लेकिन राजनीतिक रूप से उनका स्थान मजबूत हुआ.
संजय सेठ (उत्तर प्रदेश)
उत्तर प्रदेश के कारोबारी और नेता संजय सेठ लंबे समय तक समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे. उन पर आय से अधिक संपत्ति, बिल्डर नेटवर्क और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोप लगते रहे.
जून 2015 में आयकर विभाग ने उनकी कंपनी शालीमार कॉर्प से जुड़े परिसरों पर छापेमारी की. इसके बाद वे जांच एजेंसियों की निगरानी में रहे. समाजवादी पार्टी ने उन्हें पहले राज्यसभा भेजा था और वे पार्टी के प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते थे.
अगस्त 2019 में संजय सेठ भाजपा में शामिल हो गए. इसके बाद जांच की रफ्तार धीमी पड़ती दिखी. फरवरी 2024 में भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा भेजा और बाद में वे केंद्र सरकार में रक्षा राज्य मंत्री बने. यह मामला भी “वाशिंग मशीन” वाले आरोप के प्रमुख उदाहरणों में गिना जाता है.
छगन भुजबल (महाराष्ट्र)
महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल का नाम सार्वजनिक निर्माण विभाग के ठेकों और महाराष्ट्र सदन निर्माण से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में प्रमुख रूप से सामने आया. उन पर आरोप था कि मंत्री रहते हुए ठेकों के आवंटन में अनियमितताएं हुईं और इससे करोड़ों रुपये का आर्थिक लाभ पहुंचाया गया.
वर्ष 2015 में महाराष्ट्र की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया. इसी के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने धनशोधन का मामला शुरू किया. मार्च 2016 में प्रवर्तन निदेशालय ने छगन भुजबल को गिरफ्तार किया और अप्रैल 2016 में आरोपपत्र दाखिल किया.
करीब दो वर्ष जेल में रहने के बाद मई 2018 में उन्हें जमानत मिली. इसके बाद उन्हें विदेश यात्रा की अनुमति भी मिली, जिसका प्रवर्तन निदेशालय ने विरोध किया था. सितंबर 2021 में विशेष अदालत से उन्हें राहत मिली और मामले की गति धीमी पड़ने लगी.
जुलाई 2023 में छगन भुजबल अजित पवार गुट के साथ भाजपा-समर्थित एनडीए में शामिल हो गए. नवंबर 2023 में विशेष अदालत ने खुद टिप्पणी की कि मामला ‘घोंघे की चाल’ से आगे बढ़ रहा है. दिसंबर 2023 में प्रवर्तन निदेशालय ने विदेश यात्रा की अनुमति के खिलाफ अपनी याचिका भी वापस ले ली. आज छगन भुजबल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं.
मुकुल रॉय (पश्चिम बंगाल)
पश्चिम बंगाल की राजनीति के बड़े चेहरों में गिने जाने वाले मुकुल रॉय लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकार रहे. उनका नाम शारदा चिटफंड घोटाले और नारदा स्टिंग ऑपरेशन जैसे चर्चित मामलों में सामने आया, जहां कई नेताओं पर वित्तीय अनियमितताओं और कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगे.
शारदा चिटफंड घोटाले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने कई तृणमूल नेताओं से पूछताछ की और मुकुल रॉय से भी जांच एजेंसियों ने सवाल किए. नारदा स्टिंग मामले में भी उनका नाम राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा. इन मामलों ने बंगाल की राजनीति में उनकी स्थिति को लगातार दबाव में रखा.
वर्ष 2017 में मुकुल रॉय ने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी और बाद में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. भाजपा में आने के बाद वे पश्चिम बंगाल में पार्टी के बड़े रणनीतिक चेहरों में शामिल हुए और संगठन विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
इसके बाद जांच के मामलों में कोई विशेष आक्रामकता दिखाई नहीं दी. न तो कार्रवाई की गति पहले जैसी रही और न ही कोई बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया.
यामिनी और यशवंत जाधव (महाराष्ट्र)
शिवसेना विधायक यामिनी जाधव और उनके पति यशवंत जाधव कई केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में आए. उन पर विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के उल्लंघन, संदिग्ध कंपनियों से असुरक्षित ऋण लेने और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे.
फरवरी 2022 में आयकर विभाग ने उनके ठिकानों पर छापेमारी की. मई 2022 में प्रवर्तन निदेशालय ने मामला दर्ज कर यशवंत जाधव को पूछताछ के लिए तलब किया. जांच में परिवार से जुड़ी कई कंपनियों और संपत्तियों की पड़ताल हुई.
जून 2022 में शिवसेना टूटने के बाद यामिनी जाधव एकनाथ शिंदे गुट के साथ भाजपा-समर्थित एनडीए में शामिल हो गईं. इसके बाद मामले में कोई बड़ी प्रगति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई. जांच औपचारिक रूप से जारी रही, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई.
रणिंदर सिंह (पंजाब)
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बेटे रणिंदर सिंह पर विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम से जुड़े मामलों में प्रवर्तन निदेशालय की जांच चली. यह मामला आयकर विभाग की जांच के आधार पर आगे बढ़ा था.
वर्ष 2016 से एजेंसियां उनसे पूछताछ कर रही थीं. नवंबर 2020 में प्रवर्तन निदेशालय ने उनसे फिर पूछताछ की. इसी दौरान अमरिंदर सिंह का कांग्रेस से टकराव बढ़ा.
नवंबर 2021 में अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी और सितंबर 2022 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. इसके बाद रणिंदर सिंह से जुड़े मामले में कोई बड़ी प्रगति सामने नहीं आई. यह मामला भी “राजनीतिक बदलाव और जांच की रफ्तार” वाले पैटर्न में जोड़ा गया.
के. गीता (आंध्र प्रदेश)
आंध्र प्रदेश की नेता के. गीता और उनके पति पर बैंक धोखाधड़ी का गंभीर मामला दर्ज हुआ. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने आरोप लगाया कि उनकी कंपनी ने पंजाब नेशनल बैंक से लगभग 42 करोड़ रुपये का ऋण गलत जानकारी देकर लिया और बाद में चूक की.
जून 2015 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने आरोपपत्र दाखिल किया. सितंबर 2022 में विशेष अदालत ने दोनों को पांच साल की सजा सुनाई. बाद में तेलंगाना हाईकोर्ट ने सजा पर रोक लगाते हुए जमानत दे दी.
वर्ष 2019 में के. गीता भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं. मार्च 2024 में अदालत ने दोषसिद्धि पर भी रोक लगा दी, लेकिन केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने अब तक उस आदेश को चुनौती नहीं दी. इस मामले को भी जांच की धीमी रफ्तार के उदाहरण के रूप में देखा गया.
सोवन चटर्जी (पश्चिम बंगाल)
कोलकाता के पूर्व मेयर सोवन चटर्जी नारदा स्टिंग ऑपरेशन और शारदा चिटफंड मामले में जांच के घेरे में रहे. उन पर कथित रिश्वत और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोप लगे.
अप्रैल 2017 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने प्राथमिकी दर्ज की. अगस्त 2019 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा जॉइन की. कुछ समय तक जांच में कोई विशेष तेजी नहीं दिखी.
लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले जब उन्हें टिकट नहीं मिला, तो उन्होंने भाजपा छोड़ दी. इसके तुरंत बाद मई 2021 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने उन्हें नारदा मामले में गिरफ्तार कर लिया. बाद में उन्हें जमानत मिल गई. उनका मामला इस नैरेटिव का उल्टा उदाहरण माना जाता है.
कृपाशंकर सिंह (महाराष्ट्र)
मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह पर आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हुआ. आरोप था कि उन्होंने अपने ज्ञात आय स्रोतों से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की.
वर्ष 2012 में महाराष्ट्र पुलिस ने मामला दर्ज किया, जिसके आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने भी धनशोधन की जांच शुरू की. 2015 में आरोपपत्र दाखिल हुआ, जिसमें लगभग 95 करोड़ रुपये की संपत्ति का उल्लेख था.
फरवरी 2018 में अदालत ने अभियोजन की मंजूरी न होने के कारण उन्हें राहत दे दी. सितंबर 2019 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और जुलाई 2021 में भाजपा में शामिल हो गए. इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय का मामला लगभग निष्प्रभावी हो गया.
तपस रॉय (पश्चिम बंगाल)
पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ नेता तपस रॉय का नाम कोलकाता नगर निकाय भर्ती घोटाले से जुड़े धनशोधन मामले में सामने आया. आरोप था कि नियुक्तियों में अनियमितताओं के जरिए आर्थिक लाभ पहुंचाया गया.
जनवरी 2024 में प्रवर्तन निदेशालय ने उनके घर पर छापेमारी की. यह कार्रवाई राजनीतिक रूप से काफी चर्चित रही. कुछ ही हफ्तों बाद मार्च 2024 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया.
भाजपा ने उन्हें जल्द ही कोलकाता उत्तर से उम्मीदवार बना दिया. जांच तकनीकी रूप से जारी रही, लेकिन राजनीतिक संदेश स्पष्ट माना गया.
अर्चना पाटिल (महाराष्ट्र)
महाराष्ट्र की नेता अर्चना पाटिल का नाम सीधे किसी बड़े घोटाले में नहीं था, लेकिन उनके पति शैलेश पाटिल की कंपनी पर आयकर विभाग की कार्रवाई हुई थी. शैलेश, पूर्व केंद्रीय मंत्री शिवराज पाटिल के बेटे हैं.
अप्रैल 2017 में आयकर विभाग ने कंपनी से जुड़े परिसरों पर छापेमारी की. लंबे समय तक मामला जांच के दायरे में रहा.
फरवरी 2024 में आयकर अपीलीय अधिकरण ने कहा कि छापेमारी में कोई ठोस आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली, इसलिए नए कर दावे उचित नहीं हैं. इसके कुछ ही समय बाद मार्च 2024 में अर्चना पाटिल भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं. इसके बाद उन्हें चुनावी राजनीति में नई भूमिका मिली.
ज्योति मिर्धा और सुजाना चौधरी : जहां ‘वाशिंग मशीन’ पूरी तरह काम नहीं आई
भाजपा की ‘वाशिंग मशीन’ वाले नैरेटिव में ज्योति मिर्धा और वाईएस सुजाना चौधरी दो ऐसे नाम माने जाते हैं, जहां पार्टी बदलने के बावजूद जांच में स्पष्ट राहत दिखाई नहीं दी.
ज्योति मिर्धा वर्ष 2023 में कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुईं. उनका नाम सीधे किसी मामले में नहीं था, लेकिन इंडियाबुल्स, यस बैंक और शेयर मूल्य कृत्रिम रूप से बढ़ाने जैसे मामलों में उनके रिश्तेदारों, खासकर इंडियाबुल्स प्रमोटर समीर गहलौत, पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई जारी रही. मार्च 2020 से लेकर 2024 तक एजेंसी की जांच लगातार चलती रही और फरवरी 2024 में भी छापेमारी हुई.
इसी तरह वाईएस “सुजाना” चौधरी 2019 में तेलुगु देशम पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए. उन पर बेस्ट एंड क्रॉम्पटन इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स लिमिटेड से जुड़े बैंक धोखाधड़ी के मामले में आरोप लगे. जांच एजेंसियों के अनुसार उनकी कंपनी ने बैंकों के समूह से 360 करोड़ रुपये से अधिक का ऋण लेकर कथित रूप से धोखाधड़ी की और चूक की. प्रवर्तन निदेशालय ने 2016 में मामला दर्ज किया, 2018 में छापेमारी की और 2019 में संपत्तियां जब्त कीं. भाजपा में शामिल होने के बाद भी आरोपपत्र कायम रहा और मामला ट्रायल तक पहुंच गया. इसी वजह से इन दोनों नामों को अक्सर उन अपवादों के रूप में गिना जाता है, जहां पार्टी बदलने के बावजूद जांच की धार पूरी तरह कम नहीं हुई.
आख़िर में सवाल सिर्फ भाजपा, ईडी या सीबीआई का नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता का है. अगर जांच एजेंसियों की कार्रवाई राजनीतिक निष्ठा बदलते ही धीमी पड़ती दिखे, तो संदेह स्वाभाविक रूप से गहराता है. और अगर यह सिर्फ संयोग है, तो भी उसका सबसे बड़ा नुकसान संस्थाओं की साख को ही होता है.
‘भाजपा की वाशिंग मशीन’ एक राजनीतिक जुमला भर नहीं रह गया है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में सत्ता, जांच और अवसरवाद के रिश्ते का प्रतीक बन चुका है. विपक्ष इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताता है, जबकि भाजपा इसे अपने खिलाफ गढ़ा गया नैरेटिव कहती है. सच शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है, लेकिन जनता की नज़र में सवाल अब भी वही है क्या कानून सबके लिए बराबर है, या सत्ता बदलते ही न्याय का रंग भी बदल जाता है?
इसी मुद्दे पर ‘टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश’ के लाइव शो में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी ने पत्रकार राजेश चतुर्वेदी के साथ विस्तार से चर्चा की है.
इसी मुद्दे पर ‘टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश’ के लाइव शो में पत्रकार राजेश चतुर्वेदी के साथ वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी ने विस्तार से चर्चा किया है.

