काली के लिए मटन, दुर्गा के लिए मछली, लेकिन नए बंगाल में बच्चों के लिए अंडा नहीं
पश्चिम बंगाल में स्कूली बच्चों के मिड-डे मील से अंडा हटाने का फैसला अब केवल पोषण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह संस्कृति, राजनीति और धार्मिक मान्यताओं के टकराव का विषय बन चुका है. कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के स्कूलों में मिड-डे मील की जिम्मेदारी इस्कॉन (इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस) की अक्षय पात्र योजना को सौंपे जाने के बाद भोजन में अंडा और अन्य पशु-आधारित प्रोटीन समाप्त कर दिए गए हैं. इसकी जगह पूरी तरह शाकाहारी भोजन परोसा जाएगा.
‘द वायर’ में अवंतिका घोष लिखती हैं कि यह फैसला ऐसे राज्य में लिया गया है जहां लगभग 98 प्रतिशत आबादी मांसाहारी है. बंगाल की सांस्कृतिक पहचान में मछली, मांस और अंडा केवल भोजन नहीं बल्कि परंपरा का हिस्सा हैं. यहां देवी काली को मटन और चावल का भोग लगाया जाता है, जबकि दुर्गा पूजा की नवमी पर देवी को मछली या अन्य मांसाहारी व्यंजन अर्पित करना कई परिवारों की परंपरा है. ऐसे राज्य में बच्चों की थाली से अंडा हटाए जाने को कई लोग सांस्कृतिक असंगति के रूप में देख रहे हैं.
मुद्दा केवल संस्कृति तक सीमित नहीं है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार 2021 में पश्चिम बंगाल की 71.4 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित थीं, जबकि पांच वर्ष से कम आयु के लगभग एक चौथाई बच्चे कुपोषण का सामना कर रहे थे. ऐसे में आलोचकों का कहना है कि स्कूलों में मिलने वाला भोजन कई गरीब बच्चों के लिए दिन का सबसे महत्वपूर्ण भोजन होता है. पहले सप्ताह में एक या दो अंडे दिए जाते थे, जो भले ही पर्याप्त पोषण न देते हों, लेकिन बच्चों को आवश्यक प्रोटीन उपलब्ध कराने का एक माध्यम जरूर थे.
राज्य सरकार का तर्क है कि अंडा ही पोषण का एकमात्र स्रोत नहीं है और संतुलित शाकाहारी भोजन भी पर्याप्त पोषण दे सकता है. शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने विधानसभा में कहा कि दुनिया की बड़ी आबादी शाकाहारी भोजन पर स्वस्थ जीवन जी रही है. हालांकि आलोचक इस दावे को तथ्यात्मक रूप से गलत बताते हैं. उनका कहना है कि भारत में भी बहुसंख्यक लोग मांसाहारी हैं और पश्चिम बंगाल तो लगभग पूरी तरह मांसाहारी समाज है.
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि पशु-आधारित प्रोटीन और शाकाहारी प्रोटीन में अंतर होता है. सोया को छोड़कर अधिकांश वनस्पति प्रोटीन में सभी आवश्यक अमीनो अम्ल पर्याप्त मात्रा में नहीं होते. इसके अलावा विटामिन बी-12 जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी मुख्य रूप से पशु-आधारित भोजन से ही प्राप्त होते हैं. किशोरावस्था में पहुंचने वाली लड़कियों, विशेषकर मासिक धर्म शुरू होने के बाद, प्रोटीन और आयरन की जरूरत और बढ़ जाती है. ऐसे में केवल आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां पर्याप्त नहीं मानी जातीं.
आलोचकों का आरोप है कि यदि सरकार भ्रष्टाचार रोकने और भोजन की गुणवत्ता सुधारने में सफल होना चाहती थी तो इसके लिए बच्चों की थाली से अंडा हटाना आवश्यक नहीं था. उनका कहना है कि बेहतर निगरानी और पारदर्शिता के जरिए भी मिड-डे मील व्यवस्था सुधारी जा सकती थी. वहीं समर्थकों का मानना है कि स्वच्छ और नियमित शाकाहारी भोजन भी बच्चों के लिए पर्याप्त हो सकता है.
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब देश के कई राज्यों में पहले भी मिड-डे मील से अंडा हटाने को लेकर बहस हो चुकी है. लेकिन पश्चिम बंगाल का मामला अलग इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यहां की खान-पान संस्कृति मूल रूप से मांसाहारी है और धार्मिक परंपराएं भी उसी के अनुरूप विकसित हुई हैं.
अब बहस इस सवाल पर आकर टिक गई है कि क्या बच्चों के पोषण संबंधी निर्णय वैज्ञानिक आवश्यकताओं और स्थानीय खाद्य संस्कृति के आधार पर लिए जाने चाहिए या फिर धार्मिक मान्यताओं और वैचारिक प्राथमिकताओं के आधार पर. पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील का यह विवाद आने वाले समय में शिक्षा, पोषण और सांस्कृतिक पहचान की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है.

