गंगातटीय हिंदुत्व, क्षेत्रीय संस्कृतियाँ और भारतीय लोकतंत्र की लड़ाई
‘काउंटर करेंट’ के मुताबिक, भारत के हालिया विधानसभा चुनावों ने एक ऐसे देश की तस्वीर सामने रखी है जो केवल राजनीतिक विचारधारा या आर्थिक हितों के आधार पर नहीं, बल्कि अलग-अलग सभ्यतागत कल्पनाओं के आधार पर भी विभाजित हो रहा है. असम और पश्चिम बंगाल में मतदाताओं ने हिंदू बहुसंख्यकवादी राजनीति को समर्थन दिया, जबकि तमिलनाडु और केरल ने धर्मनिरपेक्ष राजनीति को चुना. अगर इसे सांस्कृतिक संदर्भ में देखा जाए, तो ऐसा लगता है कि पूर्वी भारत गंगातटीय हिंदुत्व की वैचारिक लहर की ओर झुक गया है, जबकि दक्षिण भारत अब भी क्षेत्रीय पहचान और विविधता के पक्ष में खड़ा है.
हिंदुत्व की राजनीति मूलतः गंगातटीय-वैदिक अनुभव को भारत की “प्रामाणिक” पहचान के रूप में स्थापित करने का प्रयास करती है. इस ढांचे में इस्लामी प्रभावों को विदेशी और पश्चिमी उदारवाद को सांस्कृतिक प्रदूषण की तरह प्रस्तुत किया जाता है. स्थानीय और क्षेत्रीय परंपराओं को या तो आत्मसात करने की कोशिश होती है या उन्हें हाशिये पर धकेल दिया जाता है.
तमिलनाडु और केरल इस केंद्रीकृत सांस्कृतिक परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती हैं. दिलचस्प बात यह है कि ये समाज अधार्मिक नहीं हैं. यहाँ मंदिर, मस्जिद और चर्चों की बड़ी उपस्थिति है और लोग गहराई से धार्मिक भी हैं. लेकिन धर्म यहाँ राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा है. यही कारण है कि तमिल समाज एक ईसाई फिल्म स्टार, जोसेफ विजय, को राजनीतिक नेतृत्व के रूप में स्वीकार कर सकता है और केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग जैसे दल एक हिंदू नेता को समर्थन दे सकते हैं.
स्थानीय धार्मिक परंपराओं की ताकत और प्रतिरोध
इन राज्यों का अपने उत्तरी या पूर्वी समकक्षों से अलग होना स्थानीय धार्मिक परंपराओं की ताकत से जुड़ा है. दक्षिण भारतीय हिंदू धर्म ने अपने विशिष्ट लोकाचार को बनाए रखते हुए बौद्ध, जैन और उत्तरी हिंदू परंपराओं से संवाद किया. द्रविड़ देवता, जैसे मुरुगन, लोकजीवन, प्रकृति और क्षेत्रीय संस्कृति से जुड़े रहे. तमिल भक्ति परंपरा ने देवताओं को मानवीय रूप दिया, न कि केंद्रीकृत राजनीतिक शक्ति का प्रतीक बनाया. यही कारण है कि दक्षिण भारत में एकरूप ब्राह्मणवादी हिंदू पहचान को पूरे देश पर थोपने के प्रयासों का प्रतिरोध दिखाई देता है.
केरल इसका एक और महत्वपूर्ण उदाहरण है. 2016 में अमित शाह द्वारा “वामन जयंती” की शुभकामना देते हुए साझा की गई तस्वीर पर विवाद हुआ था. उस तस्वीर में वामन अवतार को राजा महाबली को दबाते हुए दिखाया गया था. लेकिन मलयाली समाज ओणम को महाबली की वापसी के उत्सव के रूप में देखता है. महाबली उनके लिए समानता और न्याय के प्रतीक हैं. यह केवल धार्मिक मतभेद नहीं, बल्कि दो सामाजिक दृष्टिकोणों का संघर्ष है.एक स्थानीय और समतावादी, दूसरा केंद्रीकृत और श्रेणीबद्ध.
सभ्यताओं का टकराव और पूंजीवादी हताशा
भारत में हो रही इस प्रक्रिया को केवल वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ या धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता के पुराने ढांचे में नहीं समझा जा सकता. दुनिया भर में राजनीति तेजी से सभ्यतागत पहचान के इर्द-गिर्द घूम रही है. अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुअल हंटिंगटन ने “सभ्यताओं का टकराव” सिद्धांत में इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत किया था. आज अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप, भारत में नरेंद्र मोदी और यूरोप की अप्रवासी विरोधी राजनीति इसी बदलाव को दिखाती है.
इस बदलाव की एक बड़ी वजह वैश्विक पूंजीवाद का संकट भी है. अर्थव्यवस्था अब स्थिर उत्पादन से ज्यादा सट्टेबाजी और अस्थिरता पर आधारित होती जा रही है. बेरोजगारी, महंगाई, तकनीकी बदलाव और सामाजिक असुरक्षा ने मध्यम वर्ग को भय और असुरक्षा में धकेल दिया है. इसी दौरान धन कुछ बड़े कॉर्पोरेट समूहों के हाथों में केंद्रित होता गया है.
आर्थिक एकाधिकार के साथ राजनीतिक केंद्रीकरण भी बढ़ा है. ट्रंप और मोदी जैसे नेता खुद को केवल निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं, बल्कि “राष्ट्र की इच्छा” के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं. कॉर्पोरेट शक्ति और केंद्रीकृत राजनीति एक-दूसरे को मजबूत करती हैं. ऐसी परिस्थितियों में लोग सुरक्षा और पहचान के लिए धर्म, जातीयता और सभ्यता की ओर लौटते हैं. यही कारण है कि अल्पसंख्यक, प्रवासी और सांस्कृतिक विविधताएँ राजनीतिक निशाना बनती जाती हैं.
विविधता की रक्षा ही लोकतंत्र की असली लड़ाई
वैश्विक दक्षिणपंथ ने इस भावनात्मक राजनीति को बेहतर ढंग से समझा है. प्रगतिशील राजनीति अक्सर सभ्यता, धर्म और सांस्कृतिक पहचान को केवल “झूठी चेतना” कहकर खारिज कर देती है. लेकिन मनुष्य केवल आर्थिक प्राणी नहीं है. वह स्मृतियों, मिथकों, प्रतीकों और अपनेपन से भी संचालित होता है. यदि लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों को सत्तावादी राजनीति का मुकाबला करना है, तो उन्हें क्षेत्रीय संस्कृतियों और स्थानीय परंपराओं की रक्षा को लोकतांत्रिक संघर्ष के रूप में समझना होगा.
भारतीय लोकतंत्र की लड़ाई केवल कॉर्पोरेट वर्चस्व के खिलाफ नहीं है. यह विविधता की रक्षा की लड़ाई भी है. जैसे बाजार में एकाधिकार प्रतिस्पर्धा को खत्म करता है, वैसे ही केंद्रीकृत राजनीति सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को मिटाना चाहती है.
आज भारत में असली संघर्ष इस बात को लेकर है कि भारतीय सभ्यता की परिभाषा क्या होगी. एक दृष्टिकोण भारत को वैदिक-गंगातटीय मानदंडों पर आधारित केंद्रीकृत हिंदू राष्ट्र के रूप में देखता है. दूसरा दृष्टिकोण भारत को अनेक संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं के लोकतांत्रिक महासंघ के रूप में समझता है. भारतीय लोकतंत्र का भविष्य अंततः इसी पर निर्भर करेगा कि इन दोनों दृष्टियों में से कौन-सी जीतती है.

