बंगाल में इमामों-पुजारियों की मासिक सहायता बंद, ओबीसी प्रमाणपत्रों की होगी दोबारा जांच

‘टेलीग्राफ इंडिया’ के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की नई सरकार ने धर्म आधारित वित्तीय सहायता योजनाओं को बंद करने का फैसला लिया है. अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इसका सीधा असर इमामों, मुअज्जिनों और हिंदू पुजारियों को दी जाने वाली मासिक आर्थिक सहायता पर पड़ेगा.

राज्य की सामाजिक कल्याण मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि “सरकार की दूसरी कैबिनेट बैठक में सूचना एवं संस्कृति विभाग तथा अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग द्वारा चलाई जा रही धर्म आधारित सहायता योजनाओं को समाप्त करने का प्रस्ताव मंजूर किया गया है. हालांकि इस महीने तक लाभार्थियों को सहायता मिलती रहेगी और जल्द विस्तृत अधिसूचना जारी की जाएगी.

सरकारी सूत्रों के अनुसार अल्पसंख्यक मामलों का विभाग लगभग 41,205 इमामों और 39,028 मुअज्जिनों को आर्थिक सहायता देता था, जबकि सूचना एवं संस्कृति विभाग करीब 5,000 हिंदू पुजारियों को सहायता उपलब्ध कराता था.  

इमामों और मुअज्जिनों को सहायता देने की योजना ममता बनर्जी सरकार ने 2011 में सत्ता में आने के बाद शुरू की थी.  लेकिन सितंबर 2013 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था और कहा था कि यह धर्म के आधार पर भेदभाव करती है.  इसके बावजूद तत्कालीन सरकार ने वक्फ बोर्ड को मासिक अनुदान देकर इस योजना को जारी रखा, जहां से राशि इमामों और मुअज्जिनों तक पहुंचाई जाती थी.

हिंदू पुजारियों को आर्थिक सहायता देने की योजना 2021 विधानसभा चुनावों से ठीक पहले शुरू की गई थी. इस योजना को अदालत में कभी चुनौती नहीं दी गई.

सरकारी सूत्रों का कहना है कि दुर्गा पूजा समितियों को दी जाने वाली सरकारी सहायता भी धार्मिक आधार वाली योजना मानी जा सकती है और भविष्य में सरकार इस पर भी फैसला ले सकती है.

ओबीसी प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच 

साथ हीं, सरकार ने 2011 के बाद जारी किए गए सभी ओबीसी प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच की प्रक्रिया भी शुरू करने का फैसला लिया है. मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने बताया कि कैबिनेट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मई 2024 के आदेश के अनुरूप ओबीसी उप-जातियों की सूची पर काम करने का प्रस्ताव मंजूर किया है.

22 मई 2024 को हाई कोर्ट ने 2010 के बाद जारी सभी ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया था और राज्य सरकार को राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नई व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया था. अधिकारियों के अनुसार वाम मोर्चा सरकार ने 2010 में 53 मुस्लिम उप-जातियों को ओबीसी श्रेणी में शामिल किया था, जो राज्य की दो करोड़ से अधिक मुस्लिम आबादी के लगभग 87 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करती थीं. उसी समय सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण 7 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत कर दिया गया था.

बाद में तृणमूल सरकार ने कुछ और मुस्लिम उप-जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया और प्रमाणपत्र जारी करने शुरू किए. राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन अब नई सरकार उस अपील को वापस लेने की तैयारी कर रही है.

पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने भी जिला अधिकारियों को आदेश दिया है कि 2011 के बाद जारी सभी जाति प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच की जाए. आंकड़ों के अनुसार 2011 के बाद लगभग 48 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र जारी किए गए थे, जिनमें 8.64 लाख आवेदन ‘दुआरे सरकार’ शिविरों के जरिए आए थे.

सरकारी सूत्रों का कहना है कि अब इन सभी प्रमाणपत्रों को अमान्य माना जाएगा और संबंधित उप-जातियों के दस्तावेजों की दोबारा जांच के बाद ही ओबीसी सूची में उनके भविष्य पर फैसला लिया जाएगा.

Previous
Previous

अपूर्वानंद | जो आरएसएस कहता है, उस पर नहीं, जो करता है उस पर ध्यान देना चाहिए 

Next
Next

गंगातटीय हिंदुत्व, क्षेत्रीय संस्कृतियाँ और भारतीय लोकतंत्र की लड़ाई