आपसी संदेह से सियासी आगोश तक: अमेरिका ने पाकिस्तान से प्यार करना कैसे सीखा

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने हाल ही में संडे टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि अमेरिका-ईरान युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका निभाना “हमारे इतिहास के चमकदार पलों में से एक है.” अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत मसूद खान ने इसमें और रंग भरते हुए कहा: “मैं सातवें आसमान पर हूँ, यह नशे जैसा है. मेरा लंबा कूटनीतिक करियर रहा है और मैंने पाकिस्तान को इतनी ऊँचाई पर कभी नहीं देखा.” लेकिन ड्रॉप साइट न्यूज़ की गहन पड़ताल बताती है कि पाकिस्तान की यह “बुलंदी” न तो अचानक आई है, न ही बेदाग़ है — यह एक सुविचारित सैन्य रणनीति, अमेरिकी दबाव और इमरान ख़ान के सफ़ाए का नतीजा है.

‘ड्रॉप साइट न्यूज़’ में लेखक वक़ास अहमद के अनुसार, कहानी की शुरुआत जून 2021 में होती है जब सीआईए निदेशक विलियम बर्न्स इस्लामाबाद पहुँचे और तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से मिलने के लिए पूरा एक दिन इंतज़ार करते रहे — लेकिन मुलाक़ात हुई ही नहीं. ख़ान के दफ़्तर ने फ़ोन पर सूचित किया कि प्रधानमंत्री प्रोटोकॉल के मुताबिक़ केवल अपने समकक्षों — यानी राष्ट्रपति बाइडेन — से ही बात करेंगे. बाइडेन ने ख़ान के साथ सीधी बातचीत के बार-बार के अनुरोधों को नज़रअंदाज़ किया था. बर्न्स का असली मक़सद था — अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद वहाँ ड्रोन हमलों के लिए पाकिस्तानी ज़मीन का इस्तेमाल करने की अनुमति लेना. वे ख़ाली हाथ लौटे. ख़ान ने उसी महीने एक्सियोस को साफ़ कह दिया: “बिल्कुल नहीं. हम किसी भी हालत में पाकिस्तानी धरती से अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं करने देंगे.” कुछ ही हफ़्तों बाद काबुल तालिबान के हाथ आ गया और अमेरिकी निकासी अभियान अफ़रातफ़री में बदल गया.

असली मोड़ आया फ़रवरी 2022 में. जिस दिन रूसी सेनाएँ यूक्रेन में घुसीं — 24 फ़रवरी 2022 — उसी दिन इमरान ख़ान मॉस्को में पुतिन से हाथ मिला रहे थे. बाइडेन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने पहले ही पाकिस्तान के मोईद यूसुफ़ को फ़ोन कर ख़ान को यह दौरा रद्द करने को कहा था — लेकिन ख़ान ने अनसुना कर दिया. यूएनजीए में पाकिस्तान ने रूस की निंदा के प्रस्ताव पर मतदान से परहेज़ किया. तब 7 मार्च 2022 को वाशिंगटन में पाकिस्तानी राजदूत असद मजीद ख़ान की अमेरिकी विदेश उपमंत्री डोनाल्ड लू से बैठक हुई. ड्रॉप साइट द्वारा उजागर किए गए एक वर्गीकृत राजनयिक केबल के अनुसार लू ने कहा कि यदि ख़ान को अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए हटाया जाए तो अमेरिका की सभी शिकायतें माफ़ हो जाएँगी — “all will be forgiven.” 9 अप्रैल 2022 को पाकिस्तानी सेना के समर्थन से अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया और ख़ान सत्ता से बाहर. इसी दिन पाकिस्तान ने शाहीन-3 बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया — जिसकी रेंज लगभग 3,000 किलोमीटर है और जो इज़राइल तक पहुँचने में सक्षम है.

ख़ान की विदाई के साथ ही पाकिस्तान ने वह सब देना शुरू कर दिया जो उसने पहले देने से इनकार किया था. लीक दस्तावेज़ों के अनुसार पाकिस्तान अमेरिकी रक्षा ठेकेदारों और तीसरे देशों के मध्यस्थों के ज़रिए यूक्रेन को तोपखाने के गोले और अन्य हथियार गुपचुप भेजने लगा. पूर्व अमेरिकी और पाकिस्तानी अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस हथियार आपूर्ति के बदले आईएमएफ़ से पाकिस्तान के लिए अगले क़र्ज़ कार्यक्रम को अमेरिकी समर्थन सुनिश्चित किया गया. जुलाई 2023 में आईएमएफ़ ने पाकिस्तान के लिए 3 अरब डॉलर का स्टैंडबाय कार्यक्रम मंज़ूर किया. फ़रवरी 2024 में अमेरिका और यूरोपीय संघ ने आँखें मूँद लीं जब सेना ने चुनाव में भारी धाँधली कर अपनी पसंद की सरकार बिठाई.

परमाणु हथियारों का मामला इस पूरी कहानी का सबसे संवेदनशील अध्याय है. अक्टूबर 2022 में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बाजवा वाशिंगटन गए और रक्षा मंत्री ऑस्टिन व सुलिवन को आश्वासन दिया कि पाकिस्तान अपनी मिसाइलों की रेंज को इज़राइल तक पहुँचने से कुछ कम रखेगा, परमाणु कार्यक्रम सीमित करेगा और चीन से दूरी बनाएगा. उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को कुछ संवेदनशील परमाणु स्थलों का निरीक्षण करने देने का भी वादा किया — लेकिन सामरिक योजना प्रभाग के प्रमुख ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि सेना प्रमुख परमाणु श्रृंखला ऑफ कमांड में सीधे नियंत्रण नहीं रखते. इसी संदर्भ में बाइडेन ने अचानक बयान दिया कि “पाकिस्तान दुनिया के सबसे ख़तरनाक देशों में हो सकता है क्योंकि उसके पास परमाणु हथियार हैं पर कोई एकता नहीं.” ड्रॉप साइट के सूत्रों का कहना है कि यह बयान सीधे तौर पर बाजवा की परमाणु स्थलों तक पहुँच देने की नाकामी से जुड़ा था.

नवंबर 2022 में बाजवा की जगह जनरल आसिम मुनीर आए. मुनीर का इमरान ख़ान से पुराना पंगा था — 2019 में ख़ान ने ईरान दौरे के दौरान “अकूटनीतिक भाषा” इस्तेमाल करने और तय रणनीति से भटकने के कारण उन्हें आईएसआई प्रमुख पद से मात्र आठ महीने में बर्ख़ास्त कर दिया था. ड्रॉप साइट के सूत्रों के अनुसार मुनीर ने लंदन जाकर पाकिस्तान निर्वासित पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से मुलाक़ात की और वहीं से तथाकथित “लंदन प्लान” की शुरुआत हुई जिसके तहत मुनीर को सेना प्रमुख बनाए जाने के बदले ख़ान की सरकार और पार्टी को न्यायिक और राजनीतिक तरीक़े से ध्वस्त करना था. इस योजना पर अमल हुआ. आज ख़ान और उनकी पत्नी बुशरा बीबी जेल में हैं — ख़ान पिछले एक साल से एकांत कारावास में हैं. उनकी अपील सुनने वाले तीन इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जजों को हाल ही में लाहौर, पेशावर और कराची के प्रांतीय न्यायालयों में स्थानांतरित कर दिया गया.

2025 में मुनीर ने ख़ुद को फ़ील्ड मार्शल का पद दे दिया, ख़ुद के लिए “चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस फ़ोर्सेज़” का नया पद बनाया और संवैधानिक संशोधन के ज़रिए जेसीएससी की भूमिका समाप्त कर दी. इन क़दमों का सबसे महत्वपूर्ण नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की कमान पहली बार एकल व्यक्ति के हाथ आ गई — और वह व्यक्ति है पूरी तरह अमेरिका-समर्थक सेनाध्यक्ष. ट्रंप मुनीर को “मेरा पसंदीदा फ़ील्ड मार्शल” कहते हैं और इस उपाधि का ज़िक्र करते हुए आनंदित होते हैं.

चीन के साथ पाकिस्तान का रिश्ता — जो एक दशक से “मौसम की हर करवट झेलने वाली” और “गहरे समुद्र से भी गहरी” दोस्ती कहलाती थी — मुनीर के शासन में लगभग ठप हो गई है. सीपीईसी के मूल 90 प्रस्तावित परियोजनाओं में से केवल 38 पूरी हुई हैं, 23 निर्माणाधीन हैं और एक तिहाई शुरू ही नहीं हुईं. 2022 के बाद कोई बड़ी परियोजना शुरू नहीं हुई. ड्रॉप साइट द्वारा प्राप्त वर्गीकृत दस्तावेज़ों के अनुसार पाकिस्तान ने ग्वादर बंदरगाह को चीनी सैन्य अड्डे में बदलने की पेशकश तो की, लेकिन बदले में समुद्र-आधारित परमाणु सेकेंड-स्ट्राइक क्षमता की माँग रख दी. चीन ने साफ़ इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि यह परमाणु प्रसार में प्रत्यक्ष भागीदारी होगी, और बातचीत कड़वाहट के साथ समाप्त हुई.

ट्रंप परिवार के क्रिप्टो कारोबार में पाकिस्तान ने भी पैर पसारे — पाकिस्तान क्रिप्टो काउंसिल बनाई और ट्रंप परिवार के स्वामित्व वाली वर्ल्ड लिबर्टी फ़ाइनेंशियल के प्रतिनिधि इस्लामाबाद आए. फ़ील्ड मार्शल मुनीर की मौजूदगी में वित्त मंत्री ने पाकिस्तान के सालाना 3,600 करोड़ डॉलर के प्रेषण का एक हिस्सा ट्रंप परिवार के USD1 स्टेबलकॉइन के ज़रिए भेजने की प्रतिबद्धता पर दस्तख़त किए. इसके अलावा सितंबर 2025 में सऊदी अरब के साथ पारस्परिक रक्षा समझौता — जिसे ख़ान ने ठुकरा दिया था — हस्ताक्षरित किया गया. अमेरिका की दुर्लभ खनिजों की ज़रूरत भाँपते हुए पाकिस्तान ने 50 करोड़ डॉलर का एक खनिज समझौता भी किया — हालाँकि प्रतीकात्मक पहली खेप के बाद से कोई व्यावसायिक आपूर्ति नहीं हुई. गज़ा में अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल में भी पाकिस्तानी सेना ने स्वयंसेवा की.

लेकिन पाकिस्तान की मध्यस्थता की सीमाएँ जल्दी उजागर हो गईं. अप्रैल 2026 में पाकिस्तान के आईएसपीआर ने व्हाट्सएप पर पत्रकारों को ऑफ़-रिकॉर्ड संदेश भेजा कि ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची इस्लामाबाद आ रहे हैं और अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ़ और जेरेड कुशनर से त्रिपक्षीय बैठक होगी. यह ख़बर उड़ी, शेयर बाज़ार उछले — और फिर पूरी तरह झूठी निकली. ट्रंप ने दौरा रद्द कर दिया. ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रवक्ता इब्राहीम रेज़ाई ने सीधे कहा: “पाकिस्तान हमारा अच्छा दोस्त है लेकिन वार्ता के लिए उपयुक्त मध्यस्थ नहीं — यह हमेशा ट्रंप के हितों को ध्यान में रखता है और अमेरिका की इच्छा के ख़िलाफ़ एक शब्द नहीं कहता. मध्यस्थ निष्पक्ष होना चाहिए.” सीनेटर लिंडसी ग्रेहम ने भी पाकिस्तान पर “दोहरा खेल” खेलने का आरोप लगाते हुए उसकी मध्यस्थता की वैधता पर सवाल उठाया और पेंटागन प्रमुख हेगसेथ से जवाब माँगा. ट्रंप ने अपने अंदाज़ में कहा: “वे बेहतरीन हैं. फ़ील्ड मार्शल और प्रधानमंत्री बिल्कुल बेहतरीन रहे हैं.”

सार यह है: पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व वादे बड़े करता है, डिलीवरी कम. सीपीईसी की दूसरी पारी जानबूझकर सुस्त की गई, चीन से परमाणु माँग विफल रही, ईरान वार्ता में विश्वसनीयता की कमी उजागर हुई — फिर भी वाशिंगटन-इस्लामाबाद का यह गठजोड़ अभी टूटा नहीं है. सवाल यह है कि जिस डगमगाती नींव पर यह रिश्ता खड़ा है, वह कब तक टिकेगी.

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