मौलाना बरकतुल्लाह: भारत के ‘पहले प्रधानमंत्री’, जिनका नाम हटाने पर हो रहा है विवाद

भाजपा की राज्य सरकारों ने शहरों, रेलवे स्टेशनों, स्कूलों, संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों के नाम बदलने का एक निरंतर अभियान चला रखा है. इसके पीछे सरकारों का तर्क रहता है कि यह कवायद स्थानीय नायकों, स्वतंत्रता सेनानियों और आदिवासी प्रतीकों को सम्मानित करते हुए ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान को बहाल करती है. लेकिन आलोचक इसे सार्वजनिक जीवन से मुस्लिम-जुड़े नामों को कम करने के एक चुनिंदा (चुनिंदा तौर पर किए गए) प्रयास के रूप में देखते हैं.

ताज़ा विवाद मध्यप्रदेश का है, जहां भोपाल के बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद (एग्जीक्यूटिव काउंसिल) ने इसका नाम बदलकर 'वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय' करने का एक प्रस्ताव पारित किया है. इस विश्वविद्यालय को अपना वर्तमान नाम 1988 में मिला था, जिससे पहले इसे भोपाल विश्वविद्यालय कहा जाता था. भोपाल के पूर्व महापौर दीपचंद यादव कहते हैं, “बीजेपी का मक़सद सिर्फ सियासत करना है. बरकतुल्लाह भोपाली चूंकि मुसलमान थे, इसलिए उसे लगता है कि नाम बदलने से हिंदू खुश हो जाएंगे. देश के सामने महंगाई, बेरोजगारी जैसे बड़े मुद्दे हैं. शिक्षा और उद्योग धंधों के लिए बीजेपी को कुछ नहीं करना है. उसे किसी से कोई मतलब नहीं है. न हिंदुओं से, न मुसलमानों से और न ही देवताओं से. उसको सिर्फ सियासी रोटी सेंकनी है.”

कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने कहा कि राज्य सरकार किसी नए संस्थान के माध्यम से राजा भोज या वाग्देवी का सम्मान कर सकती थी. उन्होंने कहा, "एक ऐतिहासिक संस्थान का नाम बदलना दुर्भाग्यपूर्ण है." उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बरकतुल्लाह के स्थान की अनदेखी नहीं की जा सकती. "लोग अब पूछ रहे हैं कि बरकतुल्लाह कौन थे."

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में याशी के मुताबिक, मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली एक स्वतंत्रता सेनानी और 'स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री' थे, क्योंकि उन्होंने कुछ सहयोगियों—विशेष रूप से राजा महेंद्र प्रताप—के साथ मिलकर 1915 में काबुल में भारत की पहली 'निर्वासित सरकार' (गवर्नमेंट इन एक्साइल) का गठन किया था.

नई दिल्ली स्थित 'भगत सिंह आर्काइव्स एंड रिसोर्स सेंटर' के मानद सलाहकार और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के सेवानिवृत्त प्रोफेसर चमन लाल ने कहा, “मौलाना बरकतुल्लाह ने अपना पूरा जीवन विदेशों में रहकर भारत की आज़ादी के लिए काम करने में समर्पित कर दिया. जापान से लेकर इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी, रूस और अफगानिस्तान तक, उन्होंने कई देशों की यात्रा की, ताकि भारत की स्वतंत्रता के लिए जागरूकता पैदा की जा सके और गठबंधन बनाए जा सकें. उनका निधन 1927 में अमेरिका में हुआ था, शायद यही वजह है कि देश के भीतर उनकी गतिविधियों के बारे में व्यापक रूप से जानकारी नहीं मिल पाई.  1988 में उनके गृहनगर (भोपाल) में एक विश्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखकर उन्हें जो पहचान दी गई, वह एक लंबे समय से बकाया सम्मान था.”

प्रोफेसर लाल ने आगे कहा कि विश्वविद्यालय का नाम बदलने के बजाय बरकतुल्लाह की विरासत को लोगों के बीच और अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए काम किया जाना चाहिए.

मौलाना बरकतुल्लाह के विचार और आदर्श

माना जाता है कि मौलाना बरकतुल्लाह का जन्म 7 जुलाई 1854 को भोपाल में हुआ था. एक मेधावी छात्र होने के नाते वे पढ़ाई के लिए पहले बॉम्बे (मुंबई) और फिर लंदन गए. इसके बाद उन्होंने लिवरपूल में पढ़ाना शुरू किया, जहाँ वे भारतीय क्रांतिकारियों के संपर्क में आए. उनके लेखों और भाषणों ने ब्रिटिश सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचा, जिसके बाद (ब्रिटिश दमन से बचने के लिए) वे 1899 में अमेरिका चले गए. यहाँ रहकर उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी मौलाना हसरत मोहानी (जिन्होंने 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा दिया था) के साथ पत्र-व्यवहार किया. ये पत्र उनके विचारों को साफ तौर पर दर्शाते हैं.

'प्रोसीडिंग्स ऑफ द इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस' (खंड 66, 2005-2006) में प्रकाशित इकबाल हुसैन के एक लेख में इन पत्रों में से एक का हवाला दिया गया है. बरकतुल्लाह ने लिखा था, “भुखमरी और भूख के कारण लगभग 2 करोड़ लोग मारे जा चुके हैं. ये गरीबी से पीड़ित लोग हिंदू और मुसलमान दोनों थे... भूख के कारण एक पूरा देश तबाह हो गया है.”

बरकतुल्लाह का यह दृढ़ विश्वास था कि अंग्रेजों को भारत से तभी खदेड़ा जा सकता है जब हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर लड़ें और अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति का विरोध करें.

'इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस' के सचिव और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में इतिहास के प्रोफेसर अली नदीम रेज़वी ने कहा, “जो बात बरकतुल्लाह को खास बनाती है, वह उनका यह अटूट विश्वास था कि भारत तभी आज़ाद हो सकता है जब उसके सभी समुदाय एक साथ खड़े हों. उन्होंने हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों और हर क्षेत्र के लोगों के साथ मिलकर करीब से काम किया.”

प्रोफेसर रेज़वी ने आगे कहा, “इसका सबसे अच्छा उदाहरण 1915 में काबुल में स्थापित की गई भारत की अनंतिम सरकार (प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ इंडिया) है. उन्होंने एक हिंदू राजा, राजा महेंद्र प्रताप और एक महान इस्लामी विचारक, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी के साथ मिलकर निर्वासन में एक सरकार बनाई. राजा महेंद्र प्रताप इसके राष्ट्रपति बने और बरकतुल्लाह इसके प्रधानमंत्री. यह उन शुरुआती मौकों में से एक था जब भारतीयों ने ब्रिटिश नियंत्रण से बाहर अपनी खुद की स्वतंत्र राजनीतिक संस्था बनाई थी. यह कहानी केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि इसने अंग्रेजों को चुनौती दी थी, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि इसने भारत की एक ऐसी कल्पना को दिखाया जहाँ अलग-अलग धर्मों के लोगों ने एक साझा लक्ष्य के लिए मिलकर लड़ाई लड़ी.”

संयोग से, हाथरस के राजा महेंद्र प्रताप ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए कड़ा परिश्रम किया था और इस कॉलेज के लिए ज़मीन भी दान दी थी.

प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की जीत के बाद भारतीय क्रांतिकारियों की योजनाओं को गहरा झटका लगा. इसके बावजूद, बरकतुल्लाह ने अपने मिशन के लिए ब्रसेल्स, स्विट्जरलैंड, फ्रांस आदि देशों की यात्राएं जारी रखीं.

साल 1927 में, खराब स्वास्थ्य के बावजूद, वे गदर पार्टी के एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कैलिफ़ोर्निया (अमेरिका) गए. यहीं सितंबर 1927 में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली. उन्हें सैक्रामेंटो में सुपुर्द-ए-खाक किया गया, और राजा महेंद्र प्रताप अंत तक उनके साथ रहे.

प्रोफेसर रेज़वी और चमन लाल दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि केंद्र सरकार इस समय राजा महेंद्र प्रताप की विरासत को लोकप्रिय बनाने के लिए काम कर रही है, और उनके करीबी सहयोगी होने के नाते बरकतुल्लाह को भी वही सम्मान और स्थान मिलना चाहिए.

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