क्रिस्टोफ़ जाफ़रलो | भारत में परजीवी कौन हैं?

थोक सब्जी मंडी में एक मजदूर सब्जियों से भरी टोकरी लेकर जाता हुआ. फोटो: पीटीआई.

कॉकरोच जनता पार्टी आज उस गुस्से की आवाज बनकर उभरी है जिसे भारत का युवा वर्ग महसूस कर रहा है. यह गुस्सा केवल सत्ता की अक्षमता या बार-बार सामने आने वाले परीक्षा-पत्र लीक घोटालों तक सीमित नहीं है. इसके केंद्र में बेरोजगारी है. भारत लंबे समय से रोजगारहीन विकास का उदाहरण माना जाता रहा है, लेकिन आर्थिक वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ने के साथ यह संकट और गहरा हो गया है.

स्थिति इसलिए भी अधिक विस्फोटक है क्योंकि शिक्षा और रोजगार के बीच का संबंध लगातार कमजोर होता जा रहा है. जितनी ऊंची शैक्षणिक योग्यता, उतनी ही बेहतर नौकरी मिलने की उम्मीद होती है, लेकिन वास्तविकता इसके उलट दिखाई देती है. 2024 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट में स्नातक युवाओं के बीच बेरोजगारी दर 29.1 प्रतिशत बताई गई थी.

इस संकट के पीछे रोजगार के अवसरों की कमी और नौकरी चाहने वालों तथा नियोक्ताओं की अपेक्षाओं के बीच बढ़ती खाई दोनों जिम्मेदार हैं. सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के कमजोर होने के कारण परिवार महंगे निजी संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं. कई छात्र भारी आर्थिक बोझ उठाकर डिग्रियां हासिल करते हैं और फिर ऐसी नौकरियों को स्वीकार करने से हिचकते हैं जिन्हें वे अपनी योग्यता के अनुरूप नहीं मानते. दूसरी ओर कंपनियों का कहना है कि उन्हें आवश्यक कौशल वाले कर्मचारी नहीं मिल रहे हैं.

लेकिन समस्या केवल शिक्षा की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है. उतना ही बड़ा सवाल युवाओं को मिलने वाली नौकरियों की गुणवत्ता का भी है.

कुशल इंजीनियरों की कमी

इस विरोधाभास को सबसे स्पष्ट रूप से सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में देखा जा सकता है. लंबे समय तक भारतीय अर्थव्यवस्था के चमकदार क्षेत्रों में गिने जाने वाले आईटी उद्योग में रोजगार वृद्धि लगभग ठहर गई है. ऑटोमेशन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार ने बड़ी संख्या में नौकरियों को प्रभावित किया है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत में आईटी क्षेत्र की लगभग 40 प्रतिशत नौकरियां एआई और स्वचालन के कारण खतरे में पड़ सकती हैं.

इसका संबंध भारत की वैश्विक मूल्य श्रृंखला में स्थिति से भी है. आईटी उद्योग के लाखों कर्मचारी ऐसे कार्यों में लगे रहे हैं जिन्हें अपेक्षाकृत आसानी से स्वचालित किया जा सकता है. यही कारण है कि हाल के वर्षों में कई प्रमुख आईटी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की संख्या घटाई है. इंफोसिस, विप्रो और टीसीएस जैसी कंपनियों में पहली बार कार्यबल में कमी दर्ज की गई. अब रोजगार के अवसर पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, लेकिन उनका स्वरूप बदल गया है.

2025 में आईटी क्षेत्र में भर्ती फिर बढ़नी शुरू हुई, लेकिन यह पहले जैसी व्यापक भर्ती नहीं थी. अब कंपनियां बड़ी संख्या में नए स्नातकों की जगह विशेष कौशल वाले कर्मचारियों की तलाश कर रही हैं. ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटरों के विस्तार ने भी इस प्रवृत्ति को मजबूत किया है क्योंकि उन्हें सामान्य कर्मचारियों की नहीं बल्कि विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है.

यहीं इंजीनियरों की रोजगार-योग्यता का प्रश्न सामने आता है. यह नई समस्या नहीं है. एक दशक से अधिक समय से विभिन्न अध्ययनों में यह संकेत मिलता रहा है कि बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग स्नातकों के पास बुनियादी कौशल की कमी है. अब जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विज्ञान और उन्नत डिजिटल तकनीकों की मांग तेजी से बढ़ रही है, तब यह अंतर और स्पष्ट दिखाई दे रहा है. उद्योग संगठनों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में भारत को उन्नत तकनीकी कौशल वाले दस लाख से अधिक इंजीनियरों की आवश्यकता होगी, जबकि मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है.

क्या भारत दुनिया का सबसे असमान देश है?

यदि नियोक्ता कौशल की कमी की शिकायत करते हैं, तो कर्मचारियों की शिकायत नौकरियों की खराब गुणवत्ता को लेकर है. भारत की अर्थव्यवस्था का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अब भी असंगठित क्षेत्र पर आधारित है. इस क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोगों के पास न रोजगार की सुरक्षा है, न सामाजिक सुरक्षा और न ही पेंशन जैसी सुविधाएं.

इनमें बड़ी संख्या स्वरोजगार करने वालों की है, जबकि बाकी अस्थायी या अनौपचारिक काम पर निर्भर हैं. रोजगार की यह संरचना दिखाती है कि काम होना और सुरक्षित, सम्मानजनक रोजगार होना दो अलग-अलग बातें हैं.

समस्या केवल रोजगार की असुरक्षा तक सीमित नहीं है. आय का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है. विभिन्न अध्ययनों से संकेत मिलता है कि पिछले एक दशक में बड़ी संख्या में लोगों की वास्तविक आय लगभग स्थिर रही है. महंगाई को ध्यान में रखने पर कई क्षेत्रों में वेतन वृद्धि जीवन-यापन की बढ़ती लागत से पीछे रह गई है. विनिर्माण, सेवा और अन्य क्षेत्रों में वास्तविक मजदूरी या तो ठहरी हुई है या घटी है.

युवाओं की निराशा को समझना इसलिए कठिन नहीं है. एक तरफ उन्हें अपनी शिक्षा के अनुरूप रोजगार नहीं मिल रहा, दूसरी तरफ नौकरी मिलने पर भी उनकी क्रय-शक्ति में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा. लेकिन उनकी नाराजगी का एक और कारण है—बढ़ती आर्थिक असमानता.

विश्व असमानता से जुड़े अध्ययनों के अनुसार पिछले चार दशकों में भारत में राष्ट्रीय आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा लगातार सबसे धनी तबकों के हाथों में केंद्रित हुआ है. शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी की आय हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है, जबकि निचले तबकों की हिस्सेदारी घटी है. सबसे धनी एक प्रतिशत लोगों ने सबसे तेज गति से संपत्ति अर्जित की है.

इसके विपरीत, आबादी के निचले 50 प्रतिशत हिस्से की आय और संपत्ति में वृद्धि अपेक्षाकृत बहुत सीमित रही है. महामारी के बाद की आर्थिक रिकवरी ने भी इस अंतर को और चौड़ा किया. यदि संपत्ति के वितरण को देखा जाए तो सबसे धनी एक प्रतिशत आबादी का हिस्सा अब सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी की तुलना में कई गुना अधिक है.

कुछ अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि यदि सबसे अमीर और सबसे गरीब वर्गों को अलग कर दिया जाए तो भारतीय समाज अपेक्षाकृत समान दिखाई देता है. लेकिन यह समानता समृद्धि की नहीं बल्कि व्यापक गरीबी की अभिव्यक्ति है. यही कारण है कि आज भी करोड़ों लोग खाद्य सहायता योजनाओं पर निर्भर हैं.

ये आंकड़े उस धारणा पर भी सवाल उठाते हैं कि भारत में एक विशाल और मजबूत मध्य वर्ग मौजूद है. जो लोग स्वयं को मध्य वर्ग का हिस्सा मानते हैं, उनमें से एक बड़ा हिस्सा वास्तव में आर्थिक असुरक्षा, ठहरी हुई आय और बढ़ती जीवन-यापन लागत से जूझ रहा है. कुछ शोधकर्ताओं ने तो यहां तक कहा है कि भारत में वास्तविक अर्थों में मध्य वर्ग का आकार उतना बड़ा नहीं है जितना आमतौर पर माना जाता है.

यहीं से वह प्रश्न उभरता है जो इस पूरी बहस के केंद्र में है. यदि शिक्षित युवा रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, यदि बड़ी संख्या में लोग असुरक्षित नौकरियों में फंसे हुए हैं, यदि आय ठहरी हुई है और यदि आर्थिक विकास का लाभ लगातार एक छोटे से तबके तक सीमित होता जा रहा है, तो आखिर भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था में वास्तविक "परजीवी" कौन हैं? यही वह सवाल है जिसे आज का असंतुष्ट युवा अधिक तीखेपन के साथ पूछ रहा है.

क्रिस्टोफ़ जाफ़रलो पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में वरिष्ठ शोधकर्ता हैं. वह लंदन के किंग्स कॉलेज में भारतीय राजनीति और समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं. इसके साथ ही वह अंतरराष्ट्रीय शांति अध्ययन से जुड़े एक प्रमुख शोध संस्थान में मानद शोधकर्ता तथा दक्षिण एशियाई अध्ययन से संबंधित ब्रिटिश अकादमिक संगठन के अध्यक्ष हैं. भारतीय राजनीति, लोकतंत्र, जाति व्यवस्था, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पर उनका शोध और लेखन व्यापक रूप से चर्चित रहा है.

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