“मुझे अपने घर में मरने दो”: बांग्लादेश से लौटने के बाद ‘पुशबैक’ की पीड़ा से जूझ रही असम की एक महिला

स्क्रोल के मुताबिक, असम के बरपेटा जिले के एक छोटे से गांव में 68 वर्षीय अमीना बेगम अब बिस्तर से ठीक से उठ भी नहीं पातीं. एक साल पहले तक वह चलती-फिरती थीं, गांव की औरतों से बातें करती थीं, अपने पोते-पोतियों को देखती थीं. लेकिन अब उनकी आंखों में सिर्फ डर बचा है. ऐसा डर, जो हर रात उन्हें याद दिलाता है कि बंदूकधारी लोग कभी भी आ सकते हैं और उन्हें फिर “सीमा के उस पार” फेंक सकते हैं.

अमीना बार-बार सिर्फ एक बात कहती हैं- “मैंने पूरी जिंदगी यहीं बिताई है. मुझे अपने घर में मरने दो.”

यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं है. यह उस पूरे संकट की कहानी है जिसमें नागरिकता, पहचान और इंसान की गरिमा एक साथ उलझ गई है.

पिछले साल असम में बीजेपी सरकार की ओर से कथित “अवैध प्रवासियों” के खिलाफ एक नया अभियान शुरू हुआ. इस दौरान कम-से-कम 300 लोगों को रात के अंधेरे में बंदूक की नोक पर भारत-बांग्लादेश सीमा पार धकेल दिया गया. इसे प्रशासनिक भाषा में “पुशबैक” कहा गया. लेकिन जिन लोगों पर यह बीती, उनके लिए यह किसी निर्वासन से कम नहीं था.

अमीना बेगम भी उन्हीं में से एक थीं.

उनकी कहानी लगभग तीन दशक पहले शुरू हुई थी. 1998 में असम बॉर्डर पुलिस ने उन्हें “संदिग्ध नागरिक” मानते हुए विदेशी न्यायाधिकरण यानी फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में पेश होने को कहा. असम में यह एक विशेष व्यवस्था है, जहां किसी व्यक्ति को अपनी भारतीय नागरिकता साबित करनी पड़ती है.

समस्या यह थी कि अमीना के पास पर्याप्त दस्तावेज नहीं थे.

वह एक गरीब बंगाली मुस्लिम किसान परिवार में पैदा हुई थीं. कम उम्र में शादी हो गई. स्कूल कभी नहीं गईं. जन्म प्रमाणपत्र नहीं था. जमीन उनके नाम नहीं थी. गांव की हजारों दूसरी महिलाओं की तरह उनकी पहचान सिर्फ रिश्तों से तय होती थी — किसी की बेटी, किसी की पत्नी.

उन्होंने अदालत में 1966 की वोटर लिस्ट पेश की, जिसमें उनके पिता का नाम था. फिर 1997 की वोटर लिस्ट दिखाई, जिसमें उनका नाम पति अजमल खान की पत्नी के रूप में दर्ज था. लेकिन समस्या यह थी कि अलग-अलग वोटर लिस्ट में उनके नाम की स्पेलिंग अलग थी. कहीं “अमीना खातून”, कहीं “अमिन खातून”. उनके पति का नाम भी अलग-अलग तरीके से लिखा गया था.

अदालत ने इसे पर्याप्त नहीं माना.

2012 में ट्रिब्यूनल ने उन्हें विदेशी घोषित कर दिया. 2015 में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने भी फैसला बरकरार रखा. जबकि उनके सारे भाई-बहन भारतीय नागरिक हैं, उनके माता-पिता की मौत भारत में हुई, और उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी असम के गांवों में बिताई.

लेकिन कानून ने उनके जीवन की कहानी से ज्यादा दस्तावेजों की स्पेलिंग पर भरोसा किया.

हाईकोर्ट के आदेश के बाद अमीना को गिरफ्तार कर कोकराझार डिटेंशन सेंटर भेज दिया गया. वहां उन्होंने चार साल बिताए.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट ने असम के डिटेंशन सेंटरों को “मानवीय त्रासदी” बताया था. रिपोर्ट के मुताबिक महिलाएं लगातार रोती रहती थीं, परिवारों से उनका संपर्क लगभग टूट जाता था और उन्हें यह भी नहीं पता होता था कि वे कब बाहर निकल पाएंगी.

अमीना कहती हैं कि उन्हें वहां सिर्फ अपना घर याद आता था.

उनके पति अजमल खान हर महीने उनसे मिलने जाते थे. फल और घर का खाना लेकर. लेकिन हर गेट पर रिश्वत देनी पड़ती थी. मुलाकात के दौरान अमीना अक्सर रोते-रोते बेहोश हो जाती थीं.

2019 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें जमानत मिली. लगा कि शायद जिंदगी सामान्य हो जाएगी. लेकिन असली भय अभी बाकी था.

25 मई 2025 को पुलिस ने उन्हें थाने बुलाया. परिवार को कहा गया कि केस खत्म किया जा रहा है. लेकिन उसी शाम अमीना को हिरासत में लेकर असम के मटिया ट्रांजिट कैंप भेज दिया गया.

फिर 15 दिनों तक परिवार को उनकी कोई खबर नहीं मिली.

दरअसल, अमीना समेत दर्जनों लोगों को रात में सीमा पर ले जाकर बांग्लादेश की तरफ धकेल दिया गया था. अमीना बताती हैं कि बाकी लोग जान बचाने के लिए भाग गए, लेकिन वह बूढ़ी थीं, दौड़ नहीं सकीं. पूरी रात कीचड़ और पानी में पड़ी रहीं.

सुबह बांग्लादेश के कुरिग्राम जिले में एक परिवार ने उन्हें सड़क किनारे पाया. भीगे कपड़े, कांपता शरीर और आंखों में डर.

कुछ लोगों ने उन्हें खाना दिया, कपड़े दिए, शरण दी. लेकिन अमीना लगातार सिर्फ घर लौटना चाहती थीं.

इधर असम में उनके पति को एक बांग्लादेशी पत्रकार की रिपोर्ट से पता चला कि उनकी पत्नी जिंदा हैं. उन्होंने प्रशासन को पत्र लिखा, पुलिस और बीएसएफ कार्यालयों के चक्कर लगाए, लेकिन कोई मदद नहीं मिली.

आखिरकार गांव के लोगों और कुछ कार्यकर्ताओं की मदद से अमीना एक महीने बाद नदी पार कर भारत लौट पाईं. इस वापसी में परिवार के 60 हजार रुपये खर्च हो गए. उस परिवार के लिए जिसने पहले ही नागरिकता के मुकदमों में लगभग सब कुछ बेच दिया था.

लेकिन घर लौटने के बाद भी अमीना का डर खत्म नहीं हुआ.

अब वह ठीक से चल नहीं पातीं. अक्सर बातें करते-करते भूल जाती हैं. लोगों से मिलना बंद कर दिया है. लेकिन उन्हें वह रात याद है, जब उन्हें “बार्ब्ड वायर” के पार छोड़ दिया गया था.

उनकी आंखों में सबसे बड़ा डर यह नहीं है कि वे मर जाएंगी. डर यह है कि कहीं फिर से उन्हें उठा कर “विदेशी” बना दिया जाए.

भारत में नागरिकता पर बहस अक्सर आंकड़ों और राजनीति में सिमट जाती है. लेकिन अमीना बेगम की कहानी याद दिलाती है कि इन बहसों के बीच असली सवाल इंसान का है.

एक बूढ़ी औरत, जिसने कभी अपना गांव तक नहीं छोड़ा, आज अपने ही घर में यह दुआ मांग रही है - “मुझे अपने घर में मरने दो.”

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