भारत में घट रही आबादी की रफ्तार, जन्म दर 2.1 से नीचे पहुंची 

भारत की जनसंख्या अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां “जनसंख्या विस्फोट” की जगह “जनसंख्या संतुलन” और भविष्य में संभावित “जनसंख्या गिरावट” की चर्चा शुरू हो गई है. गृह मंत्रालय के तहत रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त कार्यालय की ओर से जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024 के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर अब 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिरकर 1.9 पर पहुंच गई है. यानी औसतन एक महिला अपने जीवनकाल में अब दो से भी कम बच्चों को जन्म दे रही है.

‘डाउन टू अर्थ’ के मुताबिक, यह आंकड़ा सिर्फ जनसंख्या का नहीं, बल्कि भारत के बदलते समाज, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, शहरीकरण और पारिवारिक संरचना का भी संकेत है. कभी “हम दो हमारे दो” का नारा देने वाला देश अब उस स्थिति में पहुंच रहा है जहां आने वाले दशकों में वृद्ध आबादी बढ़ने और कामकाजी युवाओं की संख्या घटने की आशंका पर बहस शुरू हो सकती है.

रिपोर्ट के मुताबिक बिहार अब भी देश का सबसे अधिक प्रजनन दर वाला बड़ा राज्य है, जहां कुल प्रजनन दर 2.9 दर्ज की गई. इसके बाद उत्तर प्रदेश 2.6, मध्य प्रदेश 2.4 और राजस्थान 2.3 पर हैं. दूसरी ओर दिल्ली देश में सबसे कम प्रजनन दर वाला क्षेत्र बन गया है, जहां कुल प्रजनन दर सिर्फ 1.2 है. तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल 1.3 पर हैं. महाराष्ट्र, पंजाब, आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य भी 1.4 के स्तर पर पहुंच चुके हैं.

रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि गांव और शहर के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है. ग्रामीण भारत में TFR 2.1 है जबकि शहरी क्षेत्रों में यह घटकर 1.5 रह गई है. यानी शहरों में लोग छोटे परिवारों को तेजी से अपना रहे हैं. इसके पीछे बढ़ती महंगाई, करियर का दबाव, महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में बढ़ती भागीदारी, देर से शादी और बच्चों की परवरिश की बढ़ती लागत जैसे कारण माने जा रहे हैं.

दिलचस्प बात यह है कि 1971 से 2024 के बीच भारत की प्रजनन दर में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज हुई है. 1971 में भारत की TFR 5.2 थी, जो 1981 में 4.5 और फिर 1991 में 3.6 होते हुए अब 1.9 पर पहुंच गई है. ग्रामीण भारत में यह गिरावट 5.4 से 2.1 तक और शहरी भारत में 4.1 से 1.5 तक पहुंच चुकी है.

रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है. देश में संस्थागत प्रसव यानी अस्पतालों में डिलीवरी का प्रतिशत अब 95.4 प्रतिशत तक पहुंच गया है. शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 97.9 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 94.6 प्रतिशत है. इसे स्वास्थ्य सेवाओं तक बढ़ती पहुंच और मातृ-शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों की सफलता के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.

लेकिन इन आंकड़ों के साथ एक नई बहस भी खड़ी हो रही है. लंबे समय तक भारत की सबसे बड़ी चिंता जनसंख्या वृद्धि रही, लेकिन अब विशेषज्ञ यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या भारत भी भविष्य में जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है, जहां जन्म दर लगातार गिरने से बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है और कामकाजी आबादी कम हो रही है.

हालांकि भारत फिलहाल दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है, लेकिन राज्यों के बीच असमानता साफ दिखती है. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अब भी उच्च प्रजनन दर है, जबकि दक्षिण भारत और महानगरों में जन्म दर बहुत नीचे जा चुकी है. इसका असर भविष्य की राजनीति, संसाधनों के बंटवारे, लोकसभा सीटों और आर्थिक नीतियों तक पर पड़ सकता है.

भारत की गिरती प्रजनन दर सिर्फ एक जनसांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है. यह बदलते भारत की कहानी है. एक ऐसा भारत जहां परिवार छोटे हो रहे हैं, महिलाएं ज्यादा पढ़ रही हैं, लोग देर से शादी कर रहे हैं और बच्चों को “संख्या” नहीं बल्कि “जिम्मेदारी” की तरह देखा जाने लगा है.

Previous
Previous

एस.वाई. कुरैशी | सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानूनी तौर पर सही, पर ज़मीनी हकीकत के मामले में लगभग पूरी तरह गलत

Next
Next

“मुझे अपने घर में मरने दो”: बांग्लादेश से लौटने के बाद ‘पुशबैक’ की पीड़ा से जूझ रही असम की एक महिला