जसिंता केरकेट्टा | आदिवासी जीवन-दर्शन का मूल है कि हर इंसान आज़ाद भी रहे और प्रकृति, समाज और समुदाय से जुड़ा भी रहे

कड़वी कॉफी के इस खास एपिसोड में लेखक-पत्रकार अपूर्वानंद ने चर्चित आदिवासी कवयित्री, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता जसिंता केरकेट्टा से आदिवासी जीवन-दर्शन, लोकतंत्र, प्रकृति, विकास, भाषा, धर्म, राजनीति और भारतीय समाज के बदलते स्वरूप पर विस्तार से बातचीत की. यह संवाद केवल आदिवासी समाज की समस्याओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आधुनिक सभ्यता, लोकतंत्र, सत्ता और मनुष्य के भविष्य पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है. बातचीत का केंद्र यह समझने की कोशिश है कि क्या विकास की आज की परिभाषा मनुष्य को अधिक मानवीय बना रही है या उसे उसकी जड़ों से दूर ले जा रही है.

अपूर्वानंद बातचीत की शुरुआत इस सवाल से करते हैं कि ऐसे समय में, जब पूरी दुनिया युद्ध, हिंसा, ध्रुवीकरण और राजनीतिक टकराव के दौर से गुजर रही है, तब जसिंता केरकेट्टा ने अपने हालिया व्याख्यान का विषय "इस आत्मविध्वंसकारी समय में फूल, पत्ती और चिड़ियों की बात करना" क्यों चुना.

इस सवाल के जवाब में जसिंता कहती हैं कि समाज में परिवर्तन केवल बड़ी राजनीतिक विचारधाराओं या क्रांतियों से नहीं आता. असली बदलाव मनुष्यों के बीच मौजूद छोटी-छोटी मानवीय संवेदनाओं से जन्म लेता है. वे अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए बताती हैं कि जब वे गांव से निकलकर शहर में पढ़ाई करने पहुंचीं, तब आर्थिक कठिनाइयों के बीच कई ऐसे सामान्य लोग मिले जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के मदद की. किसी ने रहने के लिए छोटा-सा कमरा दिया, किसी ने उधार में राशन दिया, किसी ने कंप्यूटर इस्तेमाल करने दिया और किसी ने गैस भरवाने तक में सहयोग किया. यही छोटी-छोटी घटनाएं उनके भीतर मनुष्यता पर विश्वास मजबूत करती रहीं.

उनका कहना है कि मार्क्सवाद, पूंजीवाद या साम्राज्यवाद जैसी बड़ी अवधारणाएं आम लोगों के लिए अक्सर दूर की चीजें होती हैं, लेकिन इंसानियत के छोटे-छोटे व्यवहार समाज को टूटने से बचाते हैं. यही संवेदनाएं किसी भी संघर्ष को मानवीय बनाती हैं और व्यक्ति को संकीर्ण पहचान की राजनीति से बाहर निकालती हैं.

जसिंता का मानना है कि आज बड़ी-बड़ी विचारधाराओं का इस्तेमाल लोगों को संगठित करने के बजाय उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के लिए अधिक किया जा रहा है. अंततः यही विचारधाराएं युद्ध, हिंसा और जनसंहार तक पहुंच जाती हैं. इसलिए उन्हें लगता है कि फूल, पेड़, घास, तितलियों और प्रकृति की बात करना किसी रोमांटिक कल्पना का हिस्सा नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी मूल मानवीय संवेदना से जोड़ने की कोशिश है.

इसी क्रम में अपूर्वानंद सवाल उठाते हैं कि क्या यह दुनिया को देखने की एक विशिष्ट आदिवासी दृष्टि है. इस पर जसिंता कहती हैं कि उनका बचपन बिहार और झारखंड, दोनों तरह के सामाजिक परिवेश में बीता. बिहार के विभिन्न शहरों में रहते हुए उन्होंने जाति व्यवस्था, पितृसत्ता और सामाजिक विभाजन को बहुत करीब से देखा, जबकि अपने आदिवासी गांव लौटने पर उन्हें बिल्कुल अलग तरह का समाज दिखाई देता था.

वे बताती हैं कि बिहार में लड़कियों का अकेले बाहर निकलना असुरक्षित माना जाता था, जबकि आदिवासी समाज में महिलाओं के लिए अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता थी. उन्होंने यह भी महसूस किया कि पितृसत्तात्मक समाज का प्रभाव धीरे-धीरे आदिवासी पुरुषों पर भी पड़ने लगा था. बाहर के समाज में रहकर लौटने वाले पुरुष परिवार के भीतर महिलाओं पर नियंत्रण स्थापित करने लगे, जबकि पारंपरिक आदिवासी समाज में ऐसा व्यवहार स्वीकार्य नहीं था.

जसिंता के अनुसार, इन दो बिल्कुल अलग सामाजिक अनुभवों ने उन्हें यह समझने का अवसर दिया कि समाज केवल कानूनों से नहीं, बल्कि उसके जीवन-दर्शन से बनता है. अगर किसी समाज की बुनियाद बराबरी, साझेदारी और सामूहिकता पर टिकी हो तो उसका पूरा वातावरण अलग दिखाई देता है.

आगे बातचीत आदिवासी जीवन-दर्शन की मूल अवधारणा पर पहुंचती है. जसिंता कहती हैं कि आदिवासी समाज का सबसे बड़ा सिद्धांत यह है कि हर व्यक्ति स्वतंत्र भी रहे और समुदाय, प्रकृति तथा धरती से जुड़ा भी रहे. उनके अनुसार स्वतंत्रता और सामूहिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं.

वे बताती हैं कि आदिवासी समाज में मनुष्य, जंगल, नदी, मिट्टी, पेड़, पशु और पक्षी सभी एक बड़े परिवार का हिस्सा माने जाते हैं. इसलिए प्रकृति की पूजा किसी चमत्कारिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के रूप में की जाती है. यह जीवन-दर्शन मनुष्य को सत्ता और वर्चस्व की बजाय सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाता है. पूरी बातचीत यहाँ देख सकते हैं.

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