जंक फूड के बढ़ते खतरे के सामने क्यों बेअसर साबित हुई सरकारी रणनीति

दो छह महीने के बच्चे हैं. एक लंदन में और दूसरा दिल्ली में. दोनों को नेस्ले का सेरेलैक खिलाया जाता है. वही ब्रांड, वही पीली पैकेजिंग और पोषण का वही दावा.

लेकिन 2024 में स्विट्जरलैंड की गैर-लाभकारी संस्था पब्लिक आई की एक जांच ने खुलासा किया कि दिल्ली में बिकने वाले सेरेलैक की एक सर्विंग में लगभग तीन ग्राम अतिरिक्त चीनी है, जबकि लंदन में बिकने वाले उसी उत्पाद में अतिरिक्त चीनी नहीं है. इस खुलासे ने दुनिया भर में बहस छेड़ दी. स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से शिशुओं और छोटे बच्चों के भोजन में अतिरिक्त चीनी के इस्तेमाल को लेकर चेतावनी देते रहे हैं.

‘स्क्रोल’ के मुताबिक, नेस्ले ने इन निष्कर्षों को खारिज करते हुए कहा कि उसके उत्पाद स्थानीय नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं. भारत सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने भी यही कहा कि उत्पाद भारतीय मानकों के अनुरूप है. इसके बावजूद विवाद के बाद कंपनी ने भारत में बिना रिफाइंड चीनी वाला एक नया संस्करण बाजार में उतारा.

यह कोई अकेला मामला नहीं है. 2016 में एक वैश्विक सर्वेक्षण में पाया गया था कि भारत में बिकने वाले केलॉग्स कॉर्न फ्लेक्स में दुनिया के अन्य देशों की तुलना में सबसे अधिक नमक था. बाद में कंपनी ने यूरोप में अपने उत्पादों में नमक और चीनी कम करने का वादा किया, लेकिन भारत के लिए ऐसा कोई सार्वजनिक संकल्प नहीं लिया.

इन उदाहरणों से एक बड़ा सवाल उठता है. क्या भारत में अस्वास्थ्यकर खाद्य उत्पादों के लिए नियम पर्याप्त हैं?

स्वास्थ्य संकट की बढ़ती चुनौती

भारत में मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी गैर-संचारी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2015 में देश में होने वाली 60 प्रतिशत से अधिक मौतों के पीछे ऐसी बीमारियां जिम्मेदार थीं.

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भी इस समस्या को रेखांकित किया. सर्वेक्षण के अनुसार 2009 से 2023 के बीच भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स का बाजार 150 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है. ये ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जो कारखानों में तैयार होते हैं, जिनमें अक्सर अधिक मात्रा में चीनी, नमक और वसा होती है तथा कई रासायनिक तत्व और फ्लेवर मिलाए जाते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों और किशोरों में ऐसे उत्पादों की बढ़ती खपत भविष्य में बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती है.

महत्वाकांक्षी लक्ष्य, अधूरा अमल

इसी चिंता के चलते केंद्र सरकार ने 2017 में राष्ट्रीय बहु-क्षेत्रीय कार्ययोजना शुरू की थी. इसका उद्देश्य 2025 तक गैर-संचारी बीमारियों को नियंत्रित करना था. इस योजना में वायु प्रदूषण कम करने, शराब की खपत घटाने, पैदल चलने को बढ़ावा देने और अधिक वसा, नमक व चीनी वाले खाद्य पदार्थों की खपत कम करने जैसे लक्ष्य शामिल थे.

योजना के तहत ऐसे खाद्य पदार्थों और मीठे पेय पदार्थों पर अधिक कर लगाने का सुझाव दिया गया था, ठीक उसी तरह जैसे तंबाकू और शराब पर लगाया जाता है. लेकिन लगभग एक दशक बाद भी यह प्रस्ताव लागू नहीं हो सका.

मार्च 2026 में सरकार ने संसद में स्वीकार किया कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड या अधिक वसा, चीनी और नमक वाले खाद्य पदार्थों के लिए कोई अलग जीएसटी व्यवस्था नहीं है.

पैकेट पर चेतावनी का सवाल

योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पैकेजिंग के सामने स्पष्ट पोषण संबंधी जानकारी देना था ताकि उपभोक्ता आसानी से समझ सकें कि कोई उत्पाद कितना स्वस्थ या अस्वस्थ है.

2022 में एफएसएसएआई ने एक स्टार रेटिंग प्रणाली का प्रस्ताव रखा था, जिसमें खाद्य उत्पादों को आधे स्टार से पांच स्टार तक अंक दिए जाने थे. लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव की आलोचना की. उनका तर्क था कि कंपनियां कुछ स्वस्थ सामग्री जोड़कर अपने उत्पाद की रेटिंग बढ़ा सकती हैं, जबकि उसमें चीनी, नमक या वसा की मात्रा फिर भी अधिक बनी रह सकती है.

विशेषज्ञों ने इसके बजाय अनिवार्य चेतावनी लेबल की मांग की, जो स्पष्ट रूप से बताए कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या संतृप्त वसा की मात्रा अधिक है. यह मामला अब भी न्यायालय में विचाराधीन है.

फरवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए कहा कि अब तक किए गए प्रयासों से कोई संतोषजनक परिणाम नहीं निकला है. अदालत ने इसे नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया.

विज्ञापन और प्रचार की चुनौती

सरकार की 2017 की कार्ययोजना में बच्चों को लक्षित अस्वास्थ्यकर खाद्य उत्पादों के विज्ञापनों को नियंत्रित करने का प्रस्ताव भी शामिल था. योजना के अनुसार केबल टेलीविजन नियमों और अन्य विज्ञापन नियमों में संशोधन कर ऐसे उत्पादों के प्रचार को सीमित किया जाना था.

2018 में विभिन्न मंत्रालयों की बैठक में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को ऐसे विज्ञापनों पर नियंत्रण के लिए कदम उठाने को कहा गया था. लेकिन बाद के वर्षों में इस दिशा में कोई ठोस कानूनी बदलाव नहीं हुआ.

विशेषज्ञों का कहना है कि आज भी बच्चों को आकर्षित करने वाले चिप्स, शीतल पेय, नाश्ते के सीरियल और अन्य पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का प्रचार बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. इनमें से कई उत्पादों का प्रचार लोकप्रिय फिल्म सितारे और खिलाड़ी करते हैं.

आर्थिक सर्वेक्षण ने भी माना है कि अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों के विज्ञापन देखने वाले किशोरों में उन उत्पादों को खरीदने और खाने की इच्छा अधिक होती है. इसके बावजूद विज्ञापन नियमन के मोर्चे पर प्रगति बेहद सीमित रही है.

ब्रिटेन जैसे देशों में ऐसे उत्पादों के विज्ञापनों पर कड़े प्रतिबंध हैं, लेकिन भारत में यह जिम्मेदारी मुख्य रूप से विज्ञापन मानक परिषद जैसी उद्योग-आधारित संस्थाओं पर छोड़ दी गई है.

मानकों की कमी और बढ़ती चिंता

पोषण विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या की जड़ स्पष्ट मानकों की कमी है. आज भी भारत में "अधिक वसा, चीनी और नमक वाले खाद्य पदार्थ" की कानूनी परिभाषा पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है.

विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक अध्ययन में 43 लोकप्रिय खाद्य उत्पादों की जांच की गई. इनमें से हर उत्पाद विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार कम से कम एक पोषक तत्व की सुरक्षित सीमा से ऊपर पाया गया. 31 उत्पादों में चीनी अधिक थी, 29 में वसा और 19 में सोडियम की मात्रा अत्यधिक पाई गई.

मैगी और अन्य इंस्टेंट नूडल्स जैसे उत्पादों में भी सोडियम की मात्रा को लेकर सवाल उठाए गए हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे उत्पाद नियमित रूप से खाने पर स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं.

यानी सरकार समस्या को पहचानती है, योजनाएं भी बनाती है, लेकिन उन्हें लागू करने में लगातार देरी होती रही है. यही कारण है कि जंक फूड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ती जा रही है.

भारत में गैर-संचारी बीमारियों का बढ़ता बोझ केवल व्यक्तिगत जीवनशैली का परिणाम नहीं है. यह नीतिगत विफलताओं, कमजोर नियमन और खाद्य उद्योग पर पर्याप्त निगरानी के अभाव की कहानी भी है. 2017 में शुरू हुई महत्वाकांक्षी योजना ने बड़े लक्ष्य तय किए थे, लेकिन 2026 तक आते-आते उसके कई महत्वपूर्ण हिस्से अभी भी कागजों में ही सीमित हैं. अगर यही स्थिति बनी रही तो भारत के सामने स्वास्थ्य संकट और गहरा हो सकता है.

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