‘यह फर्जी है’: ग्रामीणों का आरोप- अडानी खनन परियोजना के पीछे धोखाधड़ी; ‘हम अपने अंगूठे देखकर हैरान रह गए’
‘अलजज़ीरा’ में महमुदुल हसन की यह लंबी रिपोर्ट ओडिशा के आदिवासी बहुल कोरापुट जिले के बाल्डा और बन्नूर गांवों में स्थित पवित्र वन भूमि पर अडानी समूह की 'कलिंगा एल्युमिना लिमिटेड' द्वारा प्रस्तावित 2.4 करोड़ डॉलर की बॉक्साइट खनन परियोजना के खिलाफ खड़े हुए आदिवासियों के संघर्ष और प्रशासनिक स्तर पर हुई गंभीर धोखाधड़ी को उजागर करती है.
रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित परियोजना के तहत बाल्डा पहाड़ी का एक बड़ा हिस्सा लिया जाना है, जिसे स्थानीय आदिवासी पवित्र मानते हैं. इस परियोजना को हरी झंडी दिखाने के लिए सरकार द्वारा यह दावा किया गया कि 9 अक्टूबर को आयोजित ग्राम सभा की बैठकों में बाल्डा और बन्नूर के सभी 580 वयस्कों ने अपनी ज़मीन देने के लिए लिखित सहमति दी है. हालांकि, ज़मीनी हक़ीक़त इसके बिल्कुल विपरीत थी.
जब ग्रामीणों ने दस्तावेजों की जाँच की, तो वे यह देखकर स्तब्ध रह गए कि उनके नाम के आगे फर्जी हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान दर्ज हैं. कई लोगों ने बताया कि वे उस दिन बैठक में शामिल होने के बजाय कार्यालय के बाहर खदान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. यहाँ तक कि दस्तावेजों में उन लोगों के नाम और अंगूठे के निशान भी शामिल पाए गए जिनकी कई साल पहले मृत्यु हो चुकी है, या जो गंभीर रूप से बीमार व लकवाग्रस्त हैं.
जांच में सामने आया कि स्थानीय अधिकारियों और अनुबंधित कर्मचारियों ने ज़मीन के मालिकाना हक या पारंपरिक पट्टों को मान्यता दिलाने जैसे अन्य बहानों से ग्रामीणों और किसानों से कागजों पर हस्ताक्षर व अंगूठे के निशान ले लिए थे. बाद में उन्हीं कागजों और पन्नों को खनन परियोजना के लिए ग्राम सभा की "सहमति" के रूप में दस्तावेजों में संलग्न कर दिया गया. दोनों गांवों के निर्वाचित प्रमुखों ने भी इन बैठकों को फर्जी और अमान्य करार दिया है, क्योंकि कानूनी रूप से वैध प्रस्ताव के लिए कम से कम 50% वयस्कों की उपस्थिति और सहमति अनिवार्य होती है, जबकि मौके पर बमुश्किल 100 लोग मौजूद थे.
स्थानीय आदिवासियों और कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया में भारी जल्दबाजी दिखाई. सार्वजनिक सुनवाई के दौरान भारी विरोध के बावजूद, कुछ ही महीनों में पर्यावरण मंजूरी दे दी गई. इसके अलावा, पारंपरिक वन भूमि पर सामुदायिक अधिकारों के दावों का निपटारा महज तीन दिनों में कर दिया गया और खनन क्षेत्र को उन दावों से बाहर कर दिया गया, जिससे ग्रामीण अपनी अपील तक दाखिल नहीं कर सके.
जब ग्रामीणों ने धोखाधड़ी के खिलाफ आवाज उठाई और 50 से अधिक लोगों ने शपथ पत्र (अफेडेविट) देकर अपने हस्ताक्षर जाली होने की बात कही, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. 7 मई को कंपनी को सभी आवश्यक स्वीकृतियां मिल गईं और 50 साल के पट्टे पर वन भूमि सौंप दी गई. हालांकि, अडानी समूह या जिला प्रशासन (कोरापुट के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक) की ओर से इन गंभीर आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है.
विशेषज्ञों और शोध संगठनों (जैसे 'लैंड कॉन्फ्लिक्ट वॉच' और भारत के सीएजी की रिपोर्ट) का मानना है कि देश भर में खनन परियोजनाओं के लिए ग्राम सभा की सहमति को दरकिनार करने या फर्जी तरीके से हासिल करने का एक गंभीर और चिंताजनक रुझान देखने को मिल रहा है. सिजीमाली (वेदांता परियोजना) जैसे अन्य उदाहरणों की तरह यहाँ भी आदिवासियों के अधिकारों का हनन किया जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट की पर्यावरण और जनजातीय मामलों की वकील शोमोना खन्ना के अनुसार, यदि ग्राम सभा की सहमति वास्तव में नहीं ली गई है, तो दी गई वन मंजूरी पूरी तरह अवैध है और यह भारतीय कानून के तहत एक आपराधिक कृत्य (अत्याचार) है.
बाल्डा और बन्नूर के आदिवासी समुदायों के लिए जंगल केवल आजीविका का साधन नहीं हैं, बल्कि उनकी आस्था और संस्कृति (सर्वप्राणवादी मान्यताएं, पवित्र गुफाएं और देवी-देवताओं के स्थान) सीधे तौर पर इनसे जुड़े हैं. ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से घोषणा कर दी है कि वे अपनी पैतृक भूमि और जंगलों को बचाने के लिए हर संभव कानूनी और ज़मीनी लड़ाई लड़ेंगे, क्योंकि खदानों के शुरू होने से न केवल उनके जल स्रोत और वन उपज नष्ट हो जाएंगे, बल्कि उनकी पूरी संस्कृति भी संकट में आ जाएगी.
(यह हिंदी में अनूदित सारांश है. पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ सकते हैं.)

