चुनाव आयोग को लेकर चौंकाने वाला खुलासा ‘पूरी सड़न’ को दर्शाता है, यह ‘देशद्रोह’ के समान: वरिष्ठ वकील

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर हुए नवीनतम खुलासे "पूर्ण सड़न" को दर्शाते हैं और चुनावी प्रक्रिया को कमजोर करना देशद्रोह के समान हो सकता है—यह बात सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठ अधिवक्ताओं और एक पूर्व नौकरशाह ने बुधवार को 'द टेलीग्राफ ऑनलाइन' से कही.

अहेली बनर्जी की रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन एक्सप्रेस के बाद, चुनाव आयोग ने बुधवार को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की, जिस पर किसी भी चुनाव आयुक्त के हस्ताक्षर नहीं थे. इसमें कहा गया कि आयोग के सभी आधिकारिक आदेशों, निर्णयों और प्रशासनिक निर्देशों को "पूर्ण कानूनी मंजूरी" प्राप्त है और आयुक्तों के बीच मतभेद संस्थागत विचार-विमर्श का एक "सामान्य" हिस्सा हैं.

यह विवाद उसी दिन सामने आया जब सर्वोच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने इस बात पर विभाजित फैसला सुनाया कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लागू 2023 के कानून—जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदल दिया था—को चुनौती देने वाली याचिकाओं को किसी बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाए या नहीं.

सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि यह प्रावधान यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि एसआईआर के दौरान लिए गए निर्णय कानूनी रूप से टिकाऊ हैं या नहीं.

हेगड़े ने ‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ से कहा, “मुख्य चुनाव आयुक्त के पास अन्य आयुक्तों की तुलना में कोई उच्च अधिकार नहीं है. अन्य आयुक्तों को औपचारिक रूप से रिकॉर्ड पर बैठक बुलाने की मांग करनी चाहिए.  निर्णय बहुमत से होना चाहिए. ऐसा लगता है कि कोई औपचारिक बैठक आयोजित नहीं की गई थी. यदि बहुमत के नियम का पालन नहीं किया गया या अन्य आयुक्तों से परामर्श नहीं किया गया, तो चुनाव आयोग न्यायिक समीक्षा की परिधि में आ जाता है."

उन्होंने यह भी कहा कि यदि न्यायपालिका पाती है कि वैधानिक निर्णय लेने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था, तो एसआईआर को संभावित रूप से रद्द भी किया जा सकता है.

दोनों आयुक्त रैंक में मुख्य चुनाव आयुक्त के बराबर होते हैं, जिसमें सीईसी केवल "समान सहयोगियों में प्रथम" होते हैं. 2023 के अधिनियम की धारा 18 के तहत, आयोग का कामकाज जहाँ तक संभव हो सर्वसम्मति से निपटाया जाना चाहिए और जहाँ आयुक्तों में मतभेद हो, वहाँ बहुमत से निर्णय लिया जाना चाहिए.

पूर्व नौकरशाह जवाहर सरकार ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट में हुए खुलासों को चौंकाने वाला बताया. सरकार ने कहा, “1992 और अनुच्छेद 324(5) के बाद, सरकार ने तय किया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त पर संतुलन या नियंत्रण बनाए रखने के लिए भारत निर्वाचन आयोग में दो और आयुक्त रखे जाएंगे.”

उन्होंने कहा, “इस तरह का पहला विद्रोह तत्कालीन सीईसी राजीव कुमार के समय हुआ था. दो आयुक्तों ने बगावत की थी. एक अशोक लवासा थे, जिन्हें दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया गया था. दूसरे अरुण गोयल थे, जो चुपचाप पद छोड़कर चले गए. लेकिन आयुक्तों का पद छोड़ना ही यह दर्शाता है कि आंतरिक रूप से कुछ गलत था.”

सरकार ने आगे कहा, “आईएएस में 41 वर्षों के सेवाकाल के बाद ज्ञानेश कुमार के मामले ने मुझे पूरी तरह से स्तब्ध कर दिया है. उन्होंने अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही तानाशाही रवैया अपनाया है. यह तथ्य कि आयुक्तों ने लिखित रूप में अपने मुद्दे उठाए, भरोसे की कमी को दिखाता है."

उन्होंने कहा, "एसआईआर प्रक्रिया खुद त्रुटिपूर्ण है. संविधान में किसी भी 'विशेष गहन' पुनरीक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. यह कमजोर आधार पर टिका है."

वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंसाल्वेस ने भी चुनाव आयोग के कामकाज पर कड़ा प्रहार किया. उन्होंने कहा, "जो कुछ हो रहा है वह चुनाव आयोग में ‘पूरी सड़न’ को दर्शाता है. यह बात हर कोई जानता था, अब यह खुलकर सामने आ गई है. चुनाव आयोग को तानाशाह नहीं होना चाहिए." गोंसाल्वेस ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया को कमजोर करना "देशद्रोह" के समान है.

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