मुनाफ़ा बढ़ रहा है, फिर भी निवेश से क्यों बच रहीं भारत की बड़ी कंपनियाँ?

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने हाल ही में कहा कि महामारी के बाद बीएसई 500 और एनएसई 500 कंपनियों के मुनाफ़े में हर साल 30% से अधिक की वृद्धि हुई है. इसके बावजूद निजी क्षेत्र का निवेश उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ा. बड़ी कंपनियाँ नई फैक्ट्रियों और वास्तविक परिसंपत्तियों में निवेश करने के बजाय नकद मुनाफ़ा जमा कर रही हैं.

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत को लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े “उपभोक्ता बाज़ार” के रूप में पेश किया जाता रहा है. निवेशकों और कॉरपोरेट जगत का दावा रहा है कि भारत में बड़ी आबादी भविष्य में भारी उपभोग करेगी. लेकिन ज़मीनी आर्थिक संकेतक इस कहानी को पूरी तरह सही साबित नहीं करते.

दोपहिया वाहनों की बिक्री कई वर्षों तक सुस्त रही और 2018-19 के स्तर को केवल 2025-26 में पार कर सकी. छोटी कारों की बिक्री भी लंबे समय तक कमजोर रही. भारतीय रेलवे का गैर-उपनगरीय यात्री यातायात 2012-13 के बाद अपने पुराने स्तर तक नहीं पहुंच पाया. मोबाइल टेली-डेंसिटी भी वर्षों से स्थिर बनी हुई है. ये संकेत बताते हैं कि आम लोगों की उपभोग क्षमता उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ रही जितना दावा किया जाता है.

सरकार द्वारा जारी नई जीडीपी श्रृंखला ने भी इस धारणा को कमजोर किया है. नई श्रृंखला के अनुसार निजी उपभोग व्यय के आंकड़े पहले की तुलना में लगभग 10-11% कम निकले हैं. भारत की अर्थव्यवस्था में निजी उपभोग की हिस्सेदारी भी घटकर लगभग 56-57% रह गई है, जबकि पहले इसे 60% से अधिक माना जाता था. इसका अर्थ यह है कि भारत का वास्तविक उपभोक्ता बाज़ार अनुमान से छोटा हो सकता है.

जब कंपनियों को भविष्य में मांग बढ़ने का भरोसा नहीं होता, तो वे बड़े निवेश से बचती हैं. भारत की विनिर्माण कंपनियों की क्षमता उपयोग दर कई वर्षों से 74-75% के आसपास बनी हुई है. यानी मौजूदा क्षमता का ही पूरा उपयोग नहीं हो रहा, इसलिए नई क्षमता बनाने की जल्दी नहीं दिखती.

एक दूसरी बड़ी समस्या चीन पर बढ़ती निर्भरता है. 2025-26 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर से अधिक था. इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और रसायन जैसे क्षेत्रों में भारत बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. इससे संकेत मिलता है कि कई भारतीय कंपनियों को देश में विनिर्माण क्षमता विकसित करने की तुलना में चीन से आयात करना अधिक सुविधाजनक लगता है.

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय कॉरपोरेट निवेश कम आर एंड डी, कम जोखिम और तेज़ रिटर्न वाले क्षेत्रों पर केंद्रित है. रियल एस्टेट, विनियमित क्षेत्रों और अर्ध-एकाधिकार वाले कारोबारों में निवेश अधिक आकर्षक माना जाता है. विनिर्माण क्षेत्र लंबी अवधि का धैर्य मांगता है, जबकि पूंजी तेज़ मुनाफ़ा चाहती है.

यही कारण है कि मुनाफ़ा बढ़ने के बावजूद भारत की बड़ी कंपनियाँ देश की आर्थिक विकास कहानी पर बड़ा दांव लगाने से अभी भी हिचक रही हैं.

‘बेसिस पॉइंट’ में  विवेक कौल की रिपोर्ट है. वे लेखक और आर्थिक टिप्पणीकार हैं. पूरी विस्तृत लेख यहाँ पढ़ी जा सकती है.

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