‘आर्टिकल-14’ में सबाह गुरमत की रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली में अक्टूबर 2026 में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर यौन उत्पीड़न और शारीरिक दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं. कई पुलिसकर्मियों की वर्दी पर नाम की पट्टियां नहीं थीं, जबकि कुछ ने हेलमेट या मास्क से अपना चेहरा ढक रखा था. पीड़ितों का आरोप है कि पुलिसकर्मी जिम्मेदारी से बचने के लिए अलग-अलग सुरक्षा बलों का हवाला देते रहे. वीडियो साक्ष्यों, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों की आलोचना और कई शिकायतों के बावजूद जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक दबाव कम होता दिखाई दे रहा है. पीड़ितों को भी कार्रवाई की उम्मीद नहीं है.
वायरल वीडियो से शुरू हुआ विवाद
11 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से प्रसारित हुआ. इसमें दक्षिण दिल्ली के आईएनए मार्केट फ्लाईओवर के पास एक पुलिसकर्मी महिला प्रदर्शनकारी के साथ कथित तौर पर यौन दुर्व्यवहार करता दिखाई दिया. महिला अपने साथी प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने से रोकने के लिए पुलिस वैन के सामने खड़ी थी. ये प्रदर्शनकारी मतदाता सूचियों के संशोधन की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे.
वीडियो में एक पुलिसकर्मी भीड़ की धक्का-मुक्की के बीच महिला के शरीर पर अपना शरीर दबाते हुए दिखाई देता है. सांसद महुआ मोइत्रा और कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत सहित कई राजनीतिक हस्तियों ने यह वीडियो साझा किया, जिसके बाद पुलिस की कार्रवाई पर आक्रोश बढ़ गया.
10 से 12 अक्टूबर के बीच पुलिस की कार्रवाई के दौरान महिलाओं के साथ कथित यौन उत्पीड़न और मारपीट के कई मामले सामने आए. पीड़ितों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी), राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) और दिल्ली पुलिस में शिकायतें दर्ज कराईं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञों ने भी इन घटनाओं की निंदा की.
8 अक्टूबर को एनएचआरसी ने 3 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान तीन पत्रकारों के कथित यौन उत्पीड़न का स्वतः संज्ञान लिया था. आयोग ने दिल्ली पुलिस आयुक्त से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी. केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के अधिकारी राहुल सोलंकी ने भी महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर संबंधित संस्थाओं में शिकायत दर्ज कराई.
दिल्ली पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी एसीपी राजीव रंजन ने ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों की निजी जानकारी, पहचान या अन्य विवरण सोशल मीडिया पर साझा करने को अनुचित और गैरकानूनी बताया. इस बीच, नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कथित उत्पीड़न की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की. समिति 29 और 30 अक्टूबर को प्रभावित लोगों की बात सुनेगी और घटनाओं से जुड़े साक्ष्य दर्ज करेगी.
प्रदर्शनकारियों ने क्या आरोप लगाए?
दिल्ली विश्वविद्यालय में एमए की छात्रा और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की सदस्य अनन्या रतूड़ी ने बताया कि 10 अक्टूबर को पुलिस ने उनकी साथी कार्यकर्ता नेहा बोरा को हिरासत में लेने की कोशिश की. इसी दौरान धक्का-मुक्की और मारपीट शुरू हो गई. उनके अनुसार, एक पुरुष पुलिसकर्मी ने भीड़ के बीच उनके शरीर पर अपना शरीर दबाया. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें पैंट से खींचा, जिससे उनकी पैंट फट गई और टी-शर्ट भी फटने लगी. एक राहगीर ने उन्हें शरीर ढकने के लिए दुपट्टा दिया.
रतूड़ी ने बताया कि हिरासत में लेने के बाद जिस बस में उन्हें ले जाया जा रहा था, उसमें धुएं के कारण उन्हें सांस लेने में परेशानी हुई. इसकी शिकायत करने पर एक महिला पुलिसकर्मी ने उन्हें थप्पड़ मार दिया. उन्होंने यह भी कहा कि पुलिसकर्मियों की वर्दी पर नाम की पट्टियां नहीं थीं और कुछ कर्मी सादे कपड़ों में भी मौजूद थे.
पत्रकार सोनल पटरिया ने आरोप लगाया कि आईएनए फ्लाईओवर पर प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करते समय एक पुलिसकर्मी ने उन्हें पीछे हटाने के बहाने पहले डंडे से पीठ पर धक्का दिया और फिर उनके स्तनों को छुआ. उनके मुताबिक, यह घटना 45 से 50 सेकंड तक चली. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने से पत्रकारों को रोकने की कोशिश कर रही थी.
‘न्यूज़लॉन्ड्री’ की खोजी पत्रकार आस्था सव्यसाची ने बताया कि 10 अक्टूबर को पुलिस ने उनका फोन छीन लिया और उन्हें खींचकर हिरासत की बस में ले गई. उन्होंने आरोप लगाया कि बस में पीछे खड़े एक पुरुष ने उन्हें छुआ और अपने शरीर से दबाया. घबराहट और अफरा-तफरी के बीच वह पुलिस से इस मामले में आगे शिकायत नहीं कर सकीं. उनका कहना था कि सामान्य परिस्थितियों में भी सार्वजनिक परिवहन में होने वाले उत्पीड़न के मामलों में कार्रवाई मुश्किल होती है. ऐसे में हिरासत की बस में हुई घटना पर कार्रवाई की उन्हें कोई खास उम्मीद नहीं है.
जवाबदेही की उम्मीद कम
प्रदर्शन में शामिल वकील अमन ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मी महिला प्रदर्शनकारियों के पैर खींचने के बजाय उनकी जींस खींच रहे थे. जब उन्होंने इस व्यवहार का विरोध किया, तो पुलिसकर्मी उन्हें बस के पीछे ले गए, जहां उन्हें लातों और लाठियों से पीटा गया और फिर हिरासत में डाल दिया गया. सिर में गंभीर चोट लगने के बाद उन्हें हिरासत की बस में करीब डेढ़ घंटे तक रखा गया. बाद में एक स्थानीय क्लिनिक में प्राथमिक उपचार मिला और मैक्स अस्पताल में उनके सिर पर टांके लगाए गए.
दिशा छात्र संगठन की 24 वर्षीय कार्यकर्ता देवयानी सरकार ने सुरक्षा बलों पर शारीरिक और यौन प्रकृति के दुर्व्यवहार के आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि महिला पुलिसकर्मियों ने उनके स्तनों को पकड़ा. उनके अनुसार, महिला पुलिसकर्मियों द्वारा ऐसा किए जाने को अक्सर यौन उत्पीड़न के रूप में गंभीरता से नहीं लिया जाता. उन्होंने अन्य प्रदर्शनकारियों का गला दबाने, बाल खींचने और उनकी पीठ पर नाखूनों से गहरी खरोंचें डालने की घटनाओं का भी जिक्र किया.
पत्रकार सोनल पटरिया ने कहा कि उनके यूट्यूब चैनल पर वीडियो को सात लाख से अधिक लोग देख चुके हैं, लेकिन इतने साक्ष्य सामने आने के बावजूद उन्हें पुलिस से जवाबदेही की उम्मीद नहीं है.

