भारत के प्रस्तावित नए यूपीआई लेनदेन शुल्क में छिपा हुआ ‘ट्रंप फैक्टर’

भारत सरकार द्वारा संसद में पेश किया गया एक नया विधेयक, जो बैंकों और भुगतान प्रणाली प्रदाताओं को यूपीआई और रूपे डेबिट कार्ड भुगतानों पर लेनदेन शुल्क (एमडीआर) लगाने की अनुमति देता है, केवल एक घरेलू वित्तीय फैसला नहीं है. इसके पीछे भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता और अमेरिकी सरकार का रणनीतिक दबाव एक प्रमुख कारक माना जा रहा है.

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में रवि दत्त मिश्रा की रिपोर्ट है कि 2016 में लॉन्च के बाद से भारत में यूपीआई का उपयोग अत्यधिक बढ़ा है, जिसका मुख्य कारण इसका सुविधाजनक होना और 'शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट' (एमडीआर) मॉडल है.

वीजा और मास्टरकार्ड को नुकसान: अमेरिकी वित्तीय दिग्गज जैसे वीजा और मास्टरकार्ड का व्यावसायिक मॉडल व्यापारियों से लिए जाने वाले लेनदेन शुल्क पर निर्भर करता है. भारत में यूपीआई और रूपे की लोकप्रियता और शून्य शुल्क नीति के कारण इन अमेरिकी कंपनियों के राजस्व में भारी कमी आई है.

थिंक टैंक 'ग्लोबल ट्रेड इनिशिएटिव' (जीटीआरआई) के अनुसार, सरकार द्वारा रूपे का प्रोत्साहन और यूपीआई के जरिए इसे क्रेडिट कार्ड भुगतानों से जोड़ना अमेरिकी कार्ड कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी को सीधे चुनौती देता है.

व्यापार बाधा के रूप में वर्गीकरण: मार्च में यूएसटीआर (संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि) ने भारत की डिजिटल भुगतान नीतियों को अमेरिकी कंपनियों के लिए "विदेशी व्यापार बाधा" बताया. अमेरिका का तर्क है कि भारत अपने घरेलू नेटवर्क (यूपीआई और रूपे) को तरजीह देता है, जिससे अमेरिकी कंपनियों को समान अवसर नहीं मिलता.

30% मार्केट कैप का मुद्दा: यूएसटीआर ने एनपीसीआई द्वारा यूपीआई ऐप्स के लिए तय की गई 30% बाजार हिस्सेदारी की सीमा पर भी ध्यान आकर्षित किया है. हालांकि, दिसंबर 2025 तक गूगल पे और वॉलमार्ट-समर्थित फोनपे मिलकर 80% से अधिक यूपीआई लेनदेन संसाधित कर रहे थे.

पूर्व में दी गई छूटें: अमेरिका के दबाव में भारत ने पहले भी कई कदम उठाए हैं, जैसे कि 6% 'गूगल टैक्स' (डिजिटल सर्विस टैक्स) को समाप्त करना और विदेशी कंपनियों को भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए 2047 तक टैक्स हॉलिडे देना.

विपक्ष (कांग्रेस) ने आरोप लगाया कि भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधन का विधेयक अमेरिकी दबाव का परिणाम है. हालांकि, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया कि एमडीआर केवल व्यापारियों पर लागू होता है, अंतिम ग्राहकों पर नहीं, और यह मामला अभी प्रक्रियाधीन है.

मिश्रा के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन (विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन) न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर के उन देशों पर दबाव बना रहा है जिनके पास अपने स्वदेशी और कम लागत वाले डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म हैं.

ब्राजील के केंद्रीय बैंक द्वारा 2020 में शुरू किया गया 'पिक्स' एक त्वरित और बिना वार्षिक शुल्क वाला प्लेटफॉर्म है. यूएसटीआर ने आरोप लगाया कि ब्राजील पिक्स को प्राथमिकता देकर अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचा रहा है. इसके जवाब में अमेरिका ने व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत ब्राजील पर 25% शुल्क लगाया.

इंडोनेशिया के नेशनल पेमेंट गेटवे की शर्त थी कि सभी खुदरा लेनदेन स्थानीय संस्थानों द्वारा संसाधित हों. अमेरिकी दबाव के बाद, इंडोनेशिया पारस्परिक व्यापार समझौते के तहत अमेरिकी कंपनियों को सीमा-पार लेनदेन की अनुमति देने पर सहमत हुआ.

यूएसटीआर ने वियतनाम के एनएपीएएस, तुर्की के 'ट्रॉय' कार्ड नेटवर्क, ओमान के स्थानीय कार्ड सिस्टम, कतर द्वारा अंतरराष्ट्रीय कार्ड बंद करने के फैसले और सऊदी अरब के डेटा स्थानीयकरण नियमों पर आपत्तियां जताई हैं.

चीन के मामले में अमेरिका का आरोप है कि चीन ने अपने राष्ट्रीय कार्ड ब्रांड 'चीन यूनियनपे' को विशेष अधिकार देकर और अमेरिकी कंपनियों के लाइसेंस अटकाकर बाजार को प्रभावित किया है.

प्रस्तावित कराधान कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 के माध्यम से यूपीआई और रूपे पर शुल्क लगाने का प्रावधान भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में संतुलन बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. यूएसटीआर की रिपोर्ट और विभिन्न वैश्विक उदाहरणों से स्पष्ट है कि अमेरिका अपने वित्तीय प्रौद्योगिकी दिग्गजों (वीजा, मास्टरकार्ड) के व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिए भारत सहित दुनिया भर के राष्ट्रीय और स्वदेशी डिजिटल भुगतान ढांचे पर लगातार दबाव बना रहा है.

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