आलोक राजपूत | जेएनयू में भर्ती घोटाले का खुलासा
फरवरी 2022 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यभार संभालने के बाद शांतिश्री धुलीपुडी पंडित ने 350 से अधिक शिक्षकों की नियुक्तियों में शैक्षणिक योग्यता और मेरिट को प्राथमिकता देने का वादा किया था. लेकिन ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ में प्रकाशित आलोक राजपूत की रिपोर्ट है कि उनके कार्यकाल में शिक्षकों की भर्ती के दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों का उल्लंघन करते हुए कई नियुक्तियां की गईं.
कम से कम पांच एसोसिएट प्रोफेसर और दो प्रोफेसरों की नियुक्तियां ऐसी हुईं, जिनमें निर्धारित पात्रता मानकों का पालन नहीं किया गया. जिन उम्मीदवारों को विषय विशेषज्ञों की स्क्रीनिंग समिति ने शुरुआत में अयोग्य ठहराया था, उन्हें बाद में आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के माध्यम से दोबारा चयन प्रक्रिया में शामिल कर लिया गया. कम से कम सात मामलों में विषय विशेषज्ञों द्वारा तैयार शॉर्टलिस्ट में नए नाम जोड़े गए और बाद में उन्हीं उम्मीदवारों की नियुक्ति कर दी गई.
मामले को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शामिल है और उच्च शिक्षा में गुणवत्ता का मानक माना जाता है. दूसरी ओर, विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अनुसार 161 शिक्षक पदोन्नति के पात्र होने के बावजूद लंबे समय से उसका इंतजार कर रहे हैं.
एसोसिएट प्रोफेसर पद के लिए आवेदन करने वाले मुदस्सिर क्वामर और तितली बसु के मामलों का विस्तार से उल्लेख किया गया है. दोनों को पहले इसलिए अयोग्य घोषित किया गया था क्योंकि वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम आठ वर्ष के शिक्षण या शोध अनुभव तथा आवश्यक वेतनमान की शर्त पूरी नहीं करते थे. बाद में दोनों ने पुनर्विचार का अनुरोध किया. कुछ ही दिनों बाद उन्हें साक्षात्कार के लिए योग्य घोषित कर दिया गया और अंततः नियुक्ति मिल गई.
इसके बाद आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ की भूमिका पहले की तुलना में काफी बढ़ गई. विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षकों का आरोप है कि स्क्रीनिंग समिति द्वारा तैयार मूल सूची में बिना उसकी सहमति के बदलाव किए जाने लगे. पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन ने आरोप लगाया कि अंतिम निर्णय लेने में इस प्रकोष्ठ और कुलपति कार्यालय की भूमिका बढ़ गई थी.
लक्ष्मी प्रिया की नियुक्ति को भी इसी क्रम में रखा गया है. सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर कहा गया है कि उनका अनुभव और वेतनमान निर्धारित मानकों से कम था. इसके बावजूद अंतिम सूची में उनका नाम जोड़ा गया और नियुक्ति को कार्यकारी परिषद की मंजूरी मिल गई. परिषद के निर्वाचित सदस्यों ने इस पर लिखित असहमति दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि चयन प्रक्रिया में विषय विशेषज्ञों की राय को दरकिनार किया गया.
प्रबल रॉय चौधरी, वरदा अविनाश संभुस, सुकल्पा चक्रवर्ती और वंदना मिश्रा की नियुक्तियों पर भी सवाल उठाए गए हैं. आरोप है कि इनमें से कुछ उम्मीदवार संबंधित विषय की आवश्यक योग्यता, शोध प्रकाशनों या अनुभव की शर्त पूरी नहीं करते थे, फिर भी उन्हें अंतिम चयन सूची में शामिल कर नियुक्ति दे दी गई. वरदा अविनाश संभुस ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उनकी नियुक्ति सभी लागू नियमों के अनुरूप हुई और उन्होंने कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी.
विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ मामलों में नियमित पदोन्नति प्रक्रिया के बजाय प्रत्यक्ष भर्ती का रास्ता अपनाया. इससे कुछ शिक्षकों को अपेक्षाकृत कम समय में प्रोफेसर बना दिया गया, जबकि अन्य पात्र शिक्षक वर्षों से पदोन्नति की प्रतीक्षा करते रहे. सामाजिक चिकित्सा एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के सहायक प्रोफेसर विकास बाजपेयी का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि निर्धारित न्यूनतम सीमा से कई गुना अधिक शोध स्कोर होने के बावजूद उन्हें प्रोफेसर पद नहीं मिला और साक्षात्कार का अवसर भी अदालत के आदेश के बाद प्राप्त हुआ.
रिपोर्ट में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई पदोन्नति संबंधी जानकारी का भी उल्लेख है. केंद्रीय सूचना आयोग ने विश्वविद्यालय को अभिलेखों का निरीक्षण कराने का निर्देश दिया था, लेकिन आरोप है कि उसका पालन नहीं किया गया. इसी बीच विश्वविद्यालय ने दावा किया कि कुलपति के कार्यकाल में कई शिक्षकों को पदोन्नति दी गई है.
‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने इस संबंध में कुलपति शांतिश्री धुलीपुडी पंडित, रजिस्ट्रार, आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ और रिपोर्ट में नामित शिक्षकों से जवाब मांगा था. कुछ लोगों ने प्रतिक्रिया दी, जबकि अन्य की ओर से कोई जवाब नहीं मिला. विश्वविद्यालय की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण अभी सामने नहीं आया है.
(आलोक राजपूत का यह लेख ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ पर प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख का हिन्दी में अनूदित अंश है.)

