जुर्म एक : मुस्लिम को जेल, हिंदू को उसी दिन जमानत
‘ऑल्ट न्यूज़’ में अंकिता महालानोबिस की यह पड़ताल वाराणसी में गंगा नदी में नाव पर मांसाहारी भोजन करने से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में पुलिस और न्याय प्रणाली द्वारा अपनाए गए दो बिल्कुल विपरीत कानूनी रास्तों को उजागर करती है.
जून की घटना: त्वरित राहत और आरोपों में विसंगति
पिछले माह 23 जून को सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कुछ युवक गंगा नदी में नाव पर शराब पीते और चिकन पकाते नजर आ रहे थे. पुलिस ने खुद संज्ञान लेते हुए मामले में 9 में से 5 आरोपियों को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया.
पुलिस ने शुरुआती एफआईआर में आरोपियों पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने (बीएनएस धारा 299) और विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ाने (बीएनएस धारा 196 (2)) जैसी गंभीर धाराएं लगाईं. एफआईआर में गंगा को हिंदुओं की आस्था का पवित्र केंद्र बताया गया.
दिलचस्प बात यह है कि जब पुलिस ने अदालत में चालान (पंचनामा) पेश किया, तो उसमें इन गंभीर धाराओं का जिक्र गायब था. चालान में केवल "शांति भंग होने की आशंका को रोकने" (बीएनएसएस धारा 170) के तहत गिरफ्तारी दिखाई गई, जिसके कारण आरोपियों को उसी दिन ज़मानत मिल गई. पुलिस ने इस विसंगति पर पुराना वीडियो होने का तर्क देकर टालमटोल भरा जवाब दिया.
मार्च की घटना: कठोर कार्रवाई और लंबा कारावास
इससे ठीक तीन महीने पहले (16 मार्च को), भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के स्थानीय अध्यक्ष की शिकायत पर एक मामला दर्ज हुआ था. इसमें कुछ मुस्लिम युवक गंगा में नाव पर मांसाहारी भोजन (चिकन बिरयानी) से अपना रोजा इफ्तार कर रहे थे.
पुलिस ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए सभी 14 मुस्लिम पुरुषों को गिरफ्तार कर लिया. उन पर पूजा स्थल को अपवित्र करने, जल प्रदूषित करने और सार्वजनिक उपद्रव जैसी 7 शुरुआती धाराएं लगाई गईं. दो दिन बाद पुलिस ने मामले को और कड़ा करते हुए जबरन वसूली (बीएनएस धारा 308(5)) और आईटी एक्ट की धारा 67 जैसी बेहद गंभीर धाराएं भी जोड़ दीं, जिसका स्पष्ट आधार भी नहीं बताया गया.
निचली अदालतों (मजिस्ट्रेट और सत्र न्यायालय) द्वारा दो बार जमानत याचिका खारिज होने के कारण इन 14 लोगों को दो महीने से अधिक समय जेल की सलाखों के पीछे बिताना पड़ा. आखिरकार मई के मध्य में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही इन्हें जमानत पर रिहा किया जा सका.
यह रिपोर्ट दर्शाती है कि जहाँ जून के मामले में पुलिस ने एफआईआर की गंभीर धाराओं को चालान में शामिल न करके आरोपियों के लिए उसी दिन ज़मानत का रास्ता आसान कर दिया, वहीं मार्च के मामले में मुस्लिम समुदाय के युवकों पर लगातार नई और संगीन धाराएं जोड़कर उनकी कानूनी मुश्किलें बढ़ा दी गईं, जिसके कारण उन्हें महीनों जेल में काटने पड़े.

