जातिगत भेदभाव पर यूजीसी के नियम: भाजपा सरकार अपने रुख पर ‘पुनर्विचार’ क्यों कर रही है
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में विकास पाठक की रिपोर्ट विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के ‘समानता विनियमन 2026’ को लेकर केंद्र सरकार के बदले रुख, अदालती कार्यवाही और इसके राजनीतिक-सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण करती है.
जनवरी 2026 में लागू यूजीसी के नए नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) तक सीमित रखा गया था. सामान्य श्रेणी को इसके संरक्षण से बाहर रखने और "झूठी शिकायतों के खिलाफ दंडात्मक प्रावधान" न होने के कारण सवर्ण समुदाय में भारी असंतोष पैदा हुआ.
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने इन नियमों पर रोक लगा दी. अदालत ने माना कि नियमों के प्रावधान अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग से समाज में विभाजन का खतरा है. पीठ ने 2012 के नियमों को फिलहाल बहाल रखते हुए सरकार को प्रख्यात न्यायविदों की समिति गठित करने का सुझाव दिया.
भाजपा का राजनीतिक संकट यह है कि 1989 से पार्टी का पारंपरिक आधार रहे उच्च वर्ग में इन नियमों से गुस्सा दिखा, जिसकी झलक बिहार की बांकीपुर सीट पर पार्टी की हार और करणी सेना के प्रदर्शनों में मिली.
आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी के लिए उच्च जातियों की नाराजगी दूर करना ज़रूरी है. हालाँकि, ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग की बड़ी जनसांख्यिकीय आबादी को देखते हुए सरकार इन नियमों को पूरी तरह वापस भी नहीं ले सकती, क्योंकि इससे विपक्ष को हमलावर होने का मौका मिलेगा.
यही कारण है कि सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को सूचित किया कि सरकार नियमों पर "पुनर्विचार" कर रही है. केंद्र संभवतः एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करके समय हासिल करना चाहता है, ताकि झूठी शिकायतों पर जुर्माने जैसे प्रावधानों में संशोधन करके उच्च वर्ग को आश्वस्त किया जा सके और दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक संतुलन बना रहे.

