बेहतर वेतन के लिए प्रदर्शन करने वाले नोएडा के श्रमिक हफ्तों जेल में रहे, अदालतों ने बचाया

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की पड़ताल के अनुसार, अप्रैल 2026 में वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर नोएडा में हुए श्रमिक आंदोलन के दौरान 106 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें से अधिकांश को औसतन 53 दिन हिरासत में रहना पड़ा, लेकिन बाद में अदालतों ने पुलिस के आरोपों में व्यक्तिगत भूमिका और ठोस साक्ष्यों की कमी को देखते हुए बड़ी संख्या में जमानत दी.

अप्रैल 2026 में नोएडा के निजी कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों ने वेतन बढ़ाने, काम के घंटे कम करने, बोनस और अन्य सुविधाओं की मांग को लेकर करीब एक सप्ताह तक प्रदर्शन किया था. 10 अप्रैल से शुरू हुए आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई में करीब 200 लोगों को हिरासत में लिया गया, जबकि दो लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की गई, जिसके तहत बिना मुकदमे के लंबे समय तक हिरासत संभव है. 14 अप्रैल को उत्तर प्रदेश सरकार ने श्रमिकों के वेतन में अंतरिम बढ़ोतरी की, लेकिन जेल में बंद अधिकांश प्रदर्शनकारियों को राहत अदालतों के हस्तक्षेप के बाद मिली.

द इंडियन एक्सप्रेस ने सात प्राथमिकी से जुड़े 106 गिरफ्तारियों और 222 जमानत आदेशों का अध्ययन किया. इनमें 188 मामलों यानी करीब 84 प्रतिशत में अदालतों ने जमानत मंजूर की. अदालतों के आदेशों में बार-बार यह बात सामने आई कि पुलिस ने प्रदर्शनकारी भीड़ को सामूहिक आरोपी मान लिया, लेकिन प्रत्येक श्रमिक की व्यक्तिगत भूमिका स्पष्ट नहीं की.

अदालतों ने तीन प्रमुख बातों पर जोर दिया. केवल किसी प्रदर्शन में मौजूद होना जमानत रोकने का पर्याप्त आधार नहीं है. गंभीर आरोप अपने आप में किसी व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं बन जाते, जब तक उसकी विशिष्ट भूमिका सामने न आए. साथ ही, सामान्य श्रमिकों को उन लोगों के बराबर नहीं माना जा सकता जिन पर आंदोलन आयोजित करने, लोगों को जुटाने या हिंसा भड़काने के ठोस आरोप हों.

छह प्रमुख मामलों में अदालतों की टिप्पणियां

नोएडा फेज-3 की पहली प्राथमिकी में कंपनी परिसर में घुसने, पथराव, धमकी और हिंसा के आरोप लगाए गए. 31 लोगों को जमानत देते हुए अदालत ने कहा कि केवल भीड़ का हिस्सा होना यह साबित नहीं करता कि आरोपी की वही गंभीर आपराधिक मंशा थी जो पूरी भीड़ पर आरोपित की गई है. छह लोगों की जमानत इसलिए खारिज हुई क्योंकि उनके कंपनी के श्रमिक होने का संबंध स्पष्ट नहीं था और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका जताई गई.

दूसरी प्राथमिकी में 37 लोगों को जमानत मिली. पुलिस ने पथराव, तोड़फोड़ और जान से मारने के प्रयास जैसे गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन अदालत ने पाया कि आरोपियों को हिंसक गतिविधियों में शामिल दिखाने वाला कोई स्पष्ट दृश्य या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं था.

तीसरे मामले में तीन लोगों को जमानत मिली, जबकि दस की जमानत खारिज हुई. जिन लोगों की जमानत खारिज हुई, उनके खिलाफ श्रमिकों को जुटाने के लिए कंपनी के नाम से संदेश समूह बनाने, आंदोलन का समन्वय करने और प्रचार सामग्री रखने जैसे प्रथमदृष्टया साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे.

चौथी प्राथमिकी में 29 लोगों को जमानत मिली. यहां पुलिस ने स्वतंत्र गवाहों और पुलिसकर्मियों के बयान पेश किए, लेकिन अदालत ने सवाल उठाया कि वे गवाह आरोपियों को पहले से कैसे पहचानते थे. कोई स्पष्ट दृश्य या तस्वीर भी आरोपियों की हिंसा में व्यक्तिगत भागीदारी नहीं दिखाती थी. अदालत ने कहा कि श्रमिक आंदोलन में आरोपी की मौजूदगी अस्वाभाविक नहीं है.

पांचवीं प्राथमिकी में 26 लोगों को जमानत मिली. अदालत ने प्राथमिकी दर्ज करने में लगभग दस दिन की देरी और कई आरोपियों के नाम प्राथमिकी में नहीं होने पर सवाल उठाया. आरोपों में तोड़फोड़ और आगजनी की धमकी थी, लेकिन वास्तविक आगजनी या चोट की घटना का पर्याप्त उल्लेख नहीं था. हालांकि जिस एक आरोपी के खिलाफ दृश्य साक्ष्य और विशिष्ट भूमिका का प्रमाण था, उसकी जमानत खारिज कर दी गई.

छठी प्राथमिकी में 21 लोगों को जमानत दी गई. अदालत ने कहा कि केवल प्रदर्शनकारी भीड़ में मौजूद होने से हर व्यक्ति समान रूप से जिम्मेदार नहीं हो जाता. प्रत्येक आरोपी की भूमिका अलग-अलग देखनी होगी.

सातवीं प्राथमिकी में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 41 में से 39 मामलों में जमानत दी और मामले के तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों तथा समान परिस्थितियों वाले आरोपियों को मिली राहत को आधार बनाया.

आखिर प्रदर्शन क्यों हुआ था?

नोएडा के श्रमिकों का आंदोलन बढ़ती महंगाई, रसोई गैस की कीमतों, काम के बढ़ते दबाव और वेतन को लेकर असंतोष से जुड़ा था. हरियाणा के मानेसर में श्रमिकों के आंदोलन के बाद वहां न्यूनतम वेतन में 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने भी नोएडा के श्रमिकों की मांग को बल दिया. श्रमिकों ने बताया कि उन्हें आठ घंटे की ड्यूटी के बावजूद अक्सर 10 से 12 घंटे काम करना पड़ता है. बड़ी संख्या में श्रमिक ठेकेदारों के माध्यम से अस्थायी रूप से काम कर रहे थे और उन्हें भविष्य निधि जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं भी नहीं मिल रही थीं. महिला श्रमिकों ने सुरक्षा संबंधी समस्याएं भी उठाईं.

हरियाणा में वेतन बढ़ोतरी के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 14 अप्रैल को गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद में न्यूनतम वेतन बढ़ाया. अकुशल श्रमिकों का मासिक वेतन 11,313 रुपये से बढ़ाकर 13,690 रुपये और कुशल श्रमिकों का वेतन 13,940 रुपये से बढ़ाकर 16,868 रुपये किया गया.

नोएडा का मामला इस सवाल को सामने लाता है कि शांतिपूर्ण श्रमिक आंदोलन में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को सामूहिक रूप से गंभीर आपराधिक आरोपों के घेरे में रखा जा सकता है या नहीं. अदालतों के फैसलों में बार-बार यही सिद्धांत उभरा कि प्रदर्शन में मौजूदगी और अपराध में व्यक्तिगत भागीदारी एक ही बात नहीं है.

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