मुकुल केसवन | ‘दमनकारी अभियान’ का मुख्य जरिया बना चुनाव आयोग, और एसआईआर इसका घातक हथियार
मुकुल केसवन का मानना है कि जंतर मंतर 2.0’ राजनीतिक विश्लेषकों और विचारकों को विद्रोही युवाओं—जिन्हें सत्ता द्वारा ‘कॉकरोच’ का नाम दिया गया—के नेतृत्व में उभर रहे नागरिक समाज आंदोलनों के चुनावी निहितार्थों तथा सीमाओं पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करेगा. क्या अभिजीत दीपके और उनकी टोली नरेंद्र मोदी के विशालकाय 'लेवियाथन' यानी सत्ता के उस बेहद शक्तिशाली राक्षसी तंत्र का मुकाबला कर पाएगी? क्या वे आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों में ज़रा सा भी फर्क डाल पाने में सक्षम होंगे?
फिलहाल ये सवाल किसी विचार-लेखन के अनुमान का खेल मात्र हैं, क्योंकि इसका कोई निश्चित उत्तर किसी के पास नहीं है. ठीक वैसे ही, जैसे 'जंतर मंतर 1.0' के दौर में हम इसके इतिहास, पृष्ठभूमि और भविष्य की संभावनाओं के बारे में कुछ नहीं जानते थे. इसलिए, किसी दूरगामी नतीजे पर पहुँचने की जल्दबाज़ी करने से बेहतर है कि हम इस दौर के उस अनोखे और अजीब जादू का प्रत्यक्ष अनुभव करें.
दिल्ली की सीमाओं और परिधि पर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की तैनाती इस प्रकार की गई है, मानो यह देश की राजधानी न होकर उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत का कोई अति-संवेदनशील सैन्य छावनी शहर हो. आख़िरी बार दिल्ली के किसी शासक ने खुद को इतना घिरा हुआ और असुरक्षित शायद सवा दो सौ साल पहले महसूस किया था, जब सिमट चुके मुगल साम्राज्य के वारिस शाह आलम (द्वितीय) एक घिरे हुए नगर-राज्य पर शासन कर रहे थे. उस दौर की फारसी की एक चर्चित कहावत थी— "सल्तनत-ए-शाह आलम, अज़ दिल्ली ता पालम" (अर्थात् शाह आलम का साम्राज्य केवल दिल्ली से पालम तक ही सीमित है).
ऐसा प्रतीत होता है कि इसी ऐतिहासिक भय से प्रेरित होकर प्रधानमंत्री ने अपने पुलिसकर्मियों को विमान के अंदर बोर्ड कराकर हवाई अड्डे पर ही अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को नाटकीय ढंग से गिरफ्तार करने का आदेश दिया. विमान के गलियारे से जारी दीपके का वह वीडियो युवाओं के साथ उनके डिजिटल जुड़ाव को बखूबी रेखांकित करता है. वीडियो में आगे महिला पुलिसकर्मी और पीछे पुरुष पुलिसकर्मी उन्हें घेरते दिखाई देते हैं. फ्रेम में केवल दीपके का हाथ नज़र आता है, वे स्वयं दिखाई नहीं देते. यह दृश्य किसी 'फर्स्ट-पर्सन शूटर गेम' जैसा अनुभव कराता है, जहाँ दर्शक पूरी कार्रवाई को सीधे मुख्य पात्र की आँखों से महसूस करता है.
सत्ता की यह घबराहट और अति-आक्रामकता हास्यास्पद भी लगती है. जहाँ एक ओर 'ओज़िमैंडियास' की तरह शासक इतिहास में अपना नाम अमर करने की लालसा में 7 लोक कल्याण मार्ग (पुराना नाम 7 रेसकोर्स रोड) स्थित अपने लुटियंस भूलभुलैया के भीतर 40,000 पुलिसकर्मियों के पहरे में दुबका बैठा है, वहीं दूसरी ओर दीपके और उनके युवा साथी उन्हें इतिहास का पन्ना बनाने की जद्दोजहद में लगातार गतिशील हैं. पूरी नई दिल्ली को गृह मंत्रालय के शरदकालीन संग्रह—यानी कैमोफ्लाज और खाकी वर्दी—में लिपटे सिपाहियों से भरे एक सुनसान प्रेत-शहर में बदल देना सरकार की सनक को उजागर करता है. यहाँ तक कि भारत के मुख्य न्यायाधीश, जो सामान्यतः कार्यपालिका की अतिशयोक्ति या दमन के आलोचक नहीं रहे हैं, वे भी यह टिप्पणी करने से खुद को न रोक सके कि 'एक मक्खी को मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल किया जा रहा है.' हालाँकि, यह टिप्पणी 10 अक्टूबर के दमन को रोकने का कोई प्रयास नहीं, बल्कि एक साधारण सलाह भर थी.
केसवन के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश द्वारा युवा पीढ़ी के संदर्भ में इस्तेमाल किए गए कीट-सदृश रूपकों से उपजे आक्रोश ने ही इस आंदोलन को जन्म दिया था. अब ‘मक्खी’ वाले इस नए रूपक ने निश्चित रूप से दिल्ली पुलिस के उन सिपाहियों को चिंता में डाल दिया होगा, जिन्होंने जंतर मंतर को इसलिए घेर रखा था ताकि ‘कॉकरोच’ वहाँ न पहुँच सकें. बैरिकेड लगे प्रदर्शन स्थलों के प्रात:कालीन वीडियो देखकर यह साफ हो जाता है कि पुलिस बल में तैनात युवा सिपाही उसी पीढ़ी ('जेन ज़ी') के हैं, जिस पीढ़ी के प्रदर्शनकारियों को वे रोकने का प्रयास कर रहे थे.
अभिजीत दीपके ने एक तरह से दूर बैठकर ही वर्दी पहने हज़ारों ‘कॉकरोचों’ को खड़ा कर दिया था. वीडियो में कई ऐसे भावुक दृश्य सामने आए जहाँ वर्दीधारी महिला पुलिसकर्मी नागरिक परिधानों में मौजूद युवा प्रदर्शनकारी लड़कियों का हाथ थामकर उन्हें धीरे से पुलिस वैनों और बसों में बैठा रही थीं. यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये युवा सिपाही उन प्रदर्शनकारियों और उनकी मांगों के बारे में वास्तव में क्या सोचते होंगे? यदि पश्चिमी पीढ़ीगत अवधारणा 'जेन-जी' का भारत में कोई औचित्य है, तो क्या एक ही उम्र और पृष्ठभूमि के होने के नाते सिपाहियों और प्रदर्शनकारियों के बीच इस गतिरोध ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया था?
लेखक का मानना है कि 'जंतर मंतर 2.0' को कुचलने के लिए सरकार द्वारा किया गया यह दमनकारी बंदोबस्त भारत के मुख्यधारा के मध्यवर्ग के लिए एक व्यावहारिक सीख की तरह है. यह दिखाता है कि जब राज्य सत्ता अपने नागरिकों के मौलिक अधिकारों को छीनने पर आमादा हो जाए, तो वे अधिकार कागज़ों पर कितने नाममात्र के रह जाते हैं.
वह लिखते हैं कि यह दमन चक्र नया नहीं है. कश्मीर, पूर्वोत्तर और मध्य भारत के आदिवासी अंचलों जैसे भारत के सीमांत क्षेत्रों के लोग इस क्रूरता को बहुत पहले से झेलते आ रहे हैं. इस नए दौर की नवीनता यह है कि अब यह दमन अखिल भारतीय रूप ले चुका है. इसका मुख्य उद्देश्य पूरे देश में एक छांटे गए, निष्कासित और आज्ञाकारी मतदाता वर्ग को तैयार करना है.
इस पूरे दमनकारी अभियान का मुख्य जरिया 'चुनाव आयोग' बन चुका है और 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) इसका सबसे घातक हथियार है. इस प्रक्रिया का उद्देश्य भारतीय मतदाताओं के एक विशाल वर्ग को मृत घोषित करके या 'घुसपैठिया' कहकर मतदाता सूचियों से बेदखल करना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की वास्तविक अवधारणा यही है: विरोधी या असहमत मतदाताओं से मुक्त की गई मतदाता सूचियों के आधार पर एक साथ चुनाव कराना, जिसे एक वफादार चुनाव आयोग के केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर द्वारा नियंत्रित किया जा सके.
चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे इस एसआईआर अभियान का पैमाना अत्यंत भयावह है. लगभग 13 करोड़ (130 मिलियन) वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से रातों-रात हटाकर उन्हें अधर में लटका दिया गया है, जबकि दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की मतदाता सूचियों में रहस्यमय तरीके से लाखों नए नाम जोड़ दिए गए हैं. दुर्भाग्य से, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मनमानी और असंवैधानिक प्रक्रिया को रोकने या इसमें सुधार करने का कोई ठोस इरादा नहीं दिखाया है. उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में लाखों नागरिकों के मताधिकार छीने जाने पर अदालत ने यह अजीब तर्क देकर मौन सहमति दे दी कि 'यदि उन्हें बहाल किया गया, तो वे अगली बार वोट डाल सकेंगे.' चूँकि नाम हटाने की समीक्षा प्रक्रिया इतनी जटिल और धीमी है कि स्वयं चुनाव आयोग के अनुसार इसमें 12 साल तक लग सकते हैं, अतः अदालत ने प्रभावी रूप से करोड़ों भारतीयों के वोट देने के मौलिक अधिकार के अनिश्चितकालीन निलंबन पर मुहर लगा दी है.
शीर्ष अदालत की इस लाचारी और सरकार के दुराग्रह को देखते हुए देशवासी यह समझ चुके हैं कि आगामी आम चुनावों तक सबसे बड़ा मुद्दा केवल एक ही है: संघ परिवार को एक स्थायी, कृत्रिम बहुमत बनाने के लिए मतदाता सूचियों में हेरफेर करने से रोकना. जगह-जगह बीजेपी कार्यकर्ताओं द्वारा अपने मुस्लिम पड़ोसियों के खिलाफ 'फॉर्म 7' का इस्तेमाल करके हज़ारों आपत्तियाँ दर्ज कराई जा रही हैं. बहुसंख्यकवादी चौकसी और निरंकुश चुनाव आयोग के इस घातक गठजोड़ को हर कीमत पर रोका जाना अनिवार्य है.
विपक्षी दलों के उन डिजिटल समर्थकों के लिए, जो सीजेपी के इस आंदोलन के पीछे आम आदमी पार्टी या बीजेपी का गुप्त हाथ देखते हैं, 'जंतर मंतर 2.0' का यह बर्बर दमन आपकी षड्यंत्रकारी नादानी को पूरी तरह बेनकाब करता है. दिल्ली को सील करने के तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद, नेहा बोरा और उनके साथी पुलिस वैन में उठाए जाने से ठीक पहले दिल्ली हाट के बाहर अपनी आवाज़ बुलंद करने में सफल रहे.
जनआक्रोश और चेतना के इस प्रवाह को किसी भी बाहुबल या पुलिसिया तंत्र से नहीं बांधा जा सकता. यह लड़ाई लंबी और कठिन होगी, लेकिन यह डिजिटल जनता की सर्वव्यापी नज़र के सामने इस मुल्क की सड़कों पर पूरी ताकत से लड़ी जाएगी. हम देखेंगे!
(यह मुकुल केसवन का हिंदी में अनूदित और संपादित लेख है. मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित यह पूरा लेख यहां पढ़ सकते हैं)

