वोटर लिस्ट से नाम कटने की राजनीति और भारत में नागरिकता का हक खोने का खतरा

‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, भारत में चुनाव आयोग की “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” यानी एसआइआर प्रक्रिया अब सिर्फ वोटर लिस्ट अपडेट करने की कवायद नहीं रह गई है. यह लोकतंत्र, नागरिकता और संवैधानिक अधिकारों के भविष्य पर बड़ा सवाल बन चुकी है. 2025 से अब तक 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 6 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं. नए नाम जोड़ने के बाद भी यह नेट गिरावट है. अगर यही रफ्तार जारी रही तो तीसरे चरण के अंत तक लगभग 10 करोड़ लोग वोटर लिस्ट से बाहर हो सकते हैं.

यह संख्या मामूली नहीं है. यह जर्मनी या ईरान जैसे देशों की आबादी के बराबर है. यानी दुनिया का 17वां सबसे बड़ा “देश” उन लोगों का हो सकता है जिनके पास न वोट होगा, न नागरिकता का भरोसा, न सरकारी योजनाओं तक पहुंच.

लोकतंत्र में आमतौर पर आबादी बढ़ने के साथ मतदाताओं की संख्या भी बढ़ती है. लेकिन भारत में उल्टा हो रहा है. राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव के अनुसार जिन 14 राज्यों में SIR हुआ, वहां करीब 62.5 करोड़ लोग रहते हैं और 61 करोड़ मतदाता थे. लेकिन संशोधन के बाद यह संख्या घटकर लगभग 55 करोड़ रह गई. यह सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व में भारी कटौती है.

सबसे बड़ी चिंता यह है कि वोटर लिस्ट से बाहर होना अब सिर्फ मतदान के अधिकार तक सीमित नहीं रह गया. बिहार और पश्चिम बंगाल में भाजपा नेताओं ने साफ संकेत दिए हैं कि जिन लोगों के नाम हटेंगे, वे सरकारी योजनाओं, बैंक खातों और नागरिकता संबंधी सुविधाओं से भी वंचित हो सकते हैं. पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि “अवैध घुसपैठियों” और “गैर-नागरिकों” को सरकारी लाभ नहीं मिलेगा. यानी वोटर लिस्ट अब नागरिकता तय करने का औजार बनती जा रही है.

यह स्थिति अमेरिकी इतिहास के “जिम क्रो” दौर की याद दिलाती है. अमेरिका में 19वीं और 20वीं सदी के दौरान अश्वेत लोगों को वोट देने से रोकने के लिए साक्षरता परीक्षा, टैक्स और संपत्ति जैसी शर्तें लगाई गई थीं. संविधान ने अधिकार दिया था, लेकिन व्यवस्था ने रास्ते बंद कर दिए. परिणाम यह हुआ कि अश्वेत आबादी को राजनीतिक और सामाजिक रूप से दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया.

भारत में भी अब वैसा ही ढांचा बनता दिख रहा है. मुस्लिम समुदाय को पहले से ही “घुसपैठिया” और “संदिग्ध नागरिक” के रूप में पेश करने की राजनीति चल रही है. असम का एनआरसी इसका उदाहरण है, जहां वर्षों की प्रक्रिया के बाद लाखों लोग नागरिकता संकट में फंस गए. बाद में यह सामने आया कि बड़ी संख्या में हिंदू भी सूची से बाहर हो गए थे, जिसके बाद नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए का रास्ता तैयार किया गया.

संभावना यही है कि भविष्य में गरीब हिंदुओं के लिए “छूट” या वैकल्पिक रास्ते निकाले जाएंगे, लेकिन मुस्लिम समुदाय के लिए नहीं. अमेरिका में भी “ग्रैंडफादर क्लॉज” नामक व्यवस्था इसी उद्देश्य से बनाई गई थी, ताकि गरीब श्वेत मतदाता बच जाएं लेकिन अश्वेत समुदाय बाहर हो जाए.

इस पूरी प्रक्रिया में चुनाव आयोग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. नियम लगातार बदले जा रहे हैं, पारदर्शिता कम है और लोगों से ऐसे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं जिन्हें संभालकर रखना करोड़ों गरीब भारतीयों के लिए संभव नहीं. कई लोग दशकों से वोट डाल रहे हैं, फिर भी उन्हें दोबारा अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ रही है.

सुप्रीम कोर्ट से भी अब तक कोई ठोस राहत नहीं मिली है. अदालत ने यह जरूर कहा कि लोगों का “रोल पर बने रहने का अधिकार” महत्वपूर्ण है, लेकिन जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर नाम कटने जारी हैं.

भारत का लोकतंत्र सिर्फ चुनाव कराने से नहीं बचता. वह तब बचता है जब हर नागरिक को बराबरी से वोट देने का अधिकार मिले. अगर सरकारें अपने पसंद के मतदाता चुनने लगें, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे चुनावी ढांचे में बदल जाता है, जहां जनता नहीं बल्कि सत्ता तय करती है कि नागरिक कौन है.

Previous
Previous

नेहरू ने ‘परजीवी’ ज़मींदारों और रजवाड़ों को कहा था, बेरोज़गार युवाओं को नहीं, जैसा सीजेआई ने कहा

Next
Next

“मैं अपनी ही कब्र खोद रहा हूं”: भारत में मजदूर उन रोबोटों को ट्रेनिंग दे रहे हैं जो उनकी जगह ले सकते हैं