नेहरू ने ‘परजीवी’ ज़मींदारों और रजवाड़ों को कहा था, बेरोज़गार युवाओं को नहीं, जैसा सीजेआई ने कहा
‘द वायर’ के मुताबिक, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की उस टिप्पणी को लेकर देशभर में गुस्सा है, जिसमें उन्होंने बेरोज़गार युवाओं को “कॉकरोच” और “परजीवी” बताया. अदालत में सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि नौकरी न मिलने पर युवा पत्रकारिता, सोशल मीडिया या आरटीआई एक्टिविज़्म में आ जाते हैं और “पूरे सिस्टम पर हमला” करते हैं.
अगर इस बयान की तुलना भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों से की जाए, तो दोनों के बीच का फर्क बेहद साफ़ दिखाई देता है. नेहरू ने 1954 में ज़मींदारों और बड़े जमींदार वर्ग को “परजीवी” कहा था, क्योंकि वे दूसरों की मेहनत पर जीते थे. वहीं 1929 में उन्होंने किसानों, मज़दूरों, कारीगरों, दुकानदारों और “बेरोज़गार बुद्धिजीवियों” को एकजुट होकर उस पूंजीवादी और सामंती व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष करने की अपील की थी, जिसे वे समाज पर बोझ मानते थे.
एक तरफ़ आज का सर्वोच्च न्यायपालिका का प्रमुख बेरोज़गार युवाओं को तिरस्कार से देखता है, दूसरी तरफ़ आज़ादी के आंदोलन का नेता और देश का पहला प्रधानमंत्री बेरोज़गार युवाओं को बदलाव की ताकत मानता था. यह तुलना हमारे संस्थानों की गिरती विश्वसनीयता और नेतृत्व के नैतिक पतन की ओर भी इशारा करती है.
सीजेआई सूर्यकांत ने यह टिप्पणी 15 मई 2026 को उस समय की, जब देश पहले से ही भारी बेरोज़गारी, नौकरी संकट और आर्थिक असमानता से जूझ रहा है. मनरेगा जैसी गारंटीड रोजगार योजना भी मोदी सरकार खत्म कर चुकी है. ऐसे दौर में बेरोज़गार युवाओं को “कॉकरोच” और “परजीवी” कहना न सिर्फ़ असंवेदनशील बल्कि बेहद अपमानजनक माना गया.
आलोचना बढ़ने के बाद सीजेआई ने सफाई दी कि उनके बयान को मीडिया ने गलत तरीके से पेश किया. उन्होंने कहा कि उनका निशाना फर्जी डिग्री लेकर वकालत, मीडिया और सोशल मीडिया में आने वाले लोग थे. लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह सफाई उस मूल टिप्पणी को सही नहीं ठहरा सकती.
नेहरू ने किन्हें कहा था ‘परजीवी’?
नेहरू ने 11 दिसंबर 1954 को ओडिशा में एक भाषण के दौरान ज़मींदारी उन्मूलन में अदालतों द्वारा पैदा की जा रही बाधाओं का जिक्र किया था. उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट “कानूनी और संवैधानिक” तर्क देकर ज़मींदारी खत्म करने में अड़चनें पैदा कर रहे हैं. लेकिन अदालतों के फैसलों को स्वीकार करते हुए भी नेहरू ने संविधान संशोधन का रास्ता चुना ताकि ज़मींदारी व्यवस्था खत्म की जा सके.
नेहरू का मानना था कि ज़मींदार दूसरों की मेहनत पर जीते हैं, इसलिए वे “परजीवी” और “शोषक” हैं.
उन्होंने सिर्फ़ ज़मींदारों ही नहीं, बल्कि रजवाड़ों और राजाओं की विलासिता को भी समाज पर बोझ बताया. 1933 में जेल डायरी में उन्होंने लिखा था कि राजा-रानी और उनके आसपास के “परजीवी” लोग भूखी और अकालग्रस्त जनता के ऊपर नाच रहे हैं. नेहरू ने इन्हें “बीते हुए दौर के अवशेष” कहा था, जिनका अंत तय है.
बेरोज़गार युवाओं को बदलाव की ताकत मानते थे नेहरू
1929 में नेहरू ने “बेरोज़गार बुद्धिजीवियों” को किसानों, मज़दूरों और कारीगरों के साथ मिलकर समाज बदलने की ताकत बताया था. वे चाहते थे कि ये वर्ग मिलकर सामंती और पूंजीवादी ढांचे को चुनौती दें.
1959 में नेहरू ने यह जरूर कहा था कि कोई भी व्यक्ति बिना समाज को कुछ दिए सम्मान का हकदार नहीं होना चाहिए. लेकिन उन्होंने यह बात आदर्श समाज की कल्पना के रूप में कही थी, न कि बेरोज़गार युवाओं को अपमानित करने के लिए.
1961 में राउरकेला की एक सभा में नेहरू ने साफ़ कहा था. “अगर अमीर लोग दूसरों की मेहनत पर जीते हैं, तो वे समाज को लूट रहे हैं.” उन्होंने कहा था कि जो लोग समाज से लेते हैं लेकिन बदले में कुछ नहीं देते, वही असली “परजीवी” हैं.
आज के ‘परजीवी’ कौन?
मोदी सरकार की आक्रामक नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों को असाधारण ताकत दी है. ये क्रोनी कैपिटलिस्ट समाज की कीमत पर बढ़ रहे हैं और नेहरू के पैमाने पर देखें तो असली “परजीवी” वही हैं, न कि नौकरी की तलाश में संघर्ष कर रहे युवा. सीजेआई सूर्यकांत को अपने पद की गरिमा बनाए रखने के लिए ऐसे अपमानजनक शब्दों से बचना चाहिए.
लेखक एस.एन. साहू पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन के विशेष कार्याधिकारी रह चुके हैं.

