किसानों से खेतिहर मजदूरों तक: कैसे बदल रहा है भारत की कृषि आत्महत्या का चेहरा
भारत में किसान आत्महत्या लंबे समय से कृषि संकट का सबसे दर्दनाक संकेत रही है. लेकिन अब इस संकट का चेहरा बदल रहा है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि खेतों में काम करने वाले कृषि मजदूर अब किसानों से अधिक संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. यह बदलाव केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि ग्रामीण भारत की बदलती आर्थिक और सामाजिक वास्तविकता को भी सामने लाता है.
‘आर्टिकल 14’ में पार्थ सारथी बिस्वास के मुताबिक, महाराष्ट्र के वाशिम जिले के पांगरी नवघारे गांव के 40 वर्षीय राजू कालापड़ की कहानी इसी संकट की एक झलक है. फरवरी 2026 में वह अपनी बेटी की शादी की तैयारियों में जुटे थे. परिवार और रिश्तेदार घर पर मौजूद थे, लेकिन शादी के खर्च के लिए कर्ज जुटाने की कोशिश में असफल रहने के बाद उन्होंने खेत में जाकर आत्महत्या कर ली. गांव वालों के अनुसार कई साहूकारों ने उन्हें उधार देने से इनकार कर दिया था. उनकी मौत के बाद पूरे गांव ने मिलकर बेटी की शादी कराई.
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की. इनमें 5,943 यानी 56 प्रतिशत से अधिक कृषि मजदूर थे. यह बदलाव 2021 में पहली बार दिखाई दिया, जब कृषि मजदूरों की आत्महत्या की संख्या किसानों से अधिक हो गई. तब से यह रुझान लगातार बना हुआ है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह खेती का लगातार अलाभकारी होना है. पीढ़ी दर पीढ़ी जमीन का बंटवारा होने से जोत का आकार छोटा होता गया है. कई परिवारों के पास इतनी जमीन नहीं बची कि उससे पूरे परिवार का गुजारा हो सके. नतीजतन छोटे किसान अपनी खेती के साथ-साथ दूसरे खेतों में मजदूरी करने को मजबूर हैं.
किसान नेता राजू शेट्टी के अनुसार एक से दो हेक्टेयर जमीन वाले किसान आधुनिक खेती में निवेश नहीं कर सकते और न ही फसल खराब होने की स्थिति में नुकसान झेल सकते हैं. बढ़ती लागत और घटती आमदनी ने उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया है. सोयाबीन जैसी नकदी फसलों की खेती पर प्रति एकड़ लगभग 20 हजार रुपये तक खर्च आता है, लेकिन बाजार में मिलने वाला मूल्य अक्सर लागत के मुकाबले पर्याप्त नहीं होता.
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में यह संकट और गहरा है. यहां सिंचाई की सीमित सुविधाएं, रोजगार के वैकल्पिक अवसरों की कमी और जलवायु परिवर्तन की मार ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. अनियमित बारिश, सूखा और बेमौसम ओलावृष्टि अब सामान्य घटनाएं बन चुकी हैं. कई बार किसान पूरी फसल खो देते हैं और कर्ज का बोझ बढ़ता चला जाता है.
बीड़ जिले के चंद्रभान कुटे का परिवार इसका उदाहरण है. कभी परिवार के पास 50 एकड़ जमीन थी, लेकिन बंटवारे और आर्थिक संकटों के कारण अब केवल 5 एकड़ जमीन बची है. खेती से गुजारा नहीं होने के कारण परिवार के सदस्य मजदूरी भी करते हैं. 2025 में चंद्रभान ने आत्महत्या कर ली. बाद में परिवार को पता चला कि निजी साहूकारों का कर्ज उन पर भारी दबाव बना रहा था.
इस संकट का सबसे दुखद असर उन परिवारों पर पड़ता है जो पीछे छूट जाते हैं. नांदेड़ के 17 वर्षीय विनायक मोरे को अपने पिता की केवल धुंधली यादें हैं. उनके पिता ने एक दशक पहले खेती में नुकसान के कारण आत्महत्या कर ली थी. आज उनकी मां खेतिहर मजदूर के रूप में काम करती हैं, जबकि विनायक एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में नौकरी करके परिवार की मदद करता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट केवल व्यक्तिगत असफलताओं का परिणाम नहीं है. इसके पीछे कृषि नीति, कर्ज व्यवस्था, बाजार मूल्य, जलवायु परिवर्तन और ग्रामीण रोजगार की संरचनात्मक समस्याएं हैं. जब तक किसानों को सस्ती संस्थागत ऋण सुविधा, फसलों का लाभकारी मूल्य, बेहतर सिंचाई और जलवायु संकट से निपटने के साधन नहीं मिलते, तब तक यह त्रासदी जारी रहने का खतरा बना रहेगा.
कृषि मजदूरों की बढ़ती आत्महत्याएं इस बात का संकेत हैं कि भारत का कृषि संकट अब केवल भूमिहीन मजदूरों का नहीं, बल्कि उन छोटे किसानों का भी संकट बन चुका है जिनकी जमीन उनके परिवार का पेट भरने के लिए पर्याप्त नहीं रह गई है. यही बदलाव आज ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी और सबसे चिंताजनक कहानी बनकर उभर रहा है.

