डॉ. मुकेश कुमार | पकौड़ा पत्रकारिता का स्वर्णकाल
निंदकों का क्या है वे तो परनिंदा का बहाना ढूँढ़ते रहते हैं. और पत्रकार तो निंदक प्रजाति के ही जीव होते हैं. उन्हें उसी में रस आता है. वे हर पल निंदा के लिए विषय एवं व्यक्तियों की तलाश में रहते हैं. किसी भी चैनल को देख लीजिए, आपको समझ में आ जाएगा कि इस मामले में उनकी प्रतिभा एवं मेधा कहाँ तक छलाँग लगा सकती है. उनकी दिनचर्या इसी महान अभियान से शुरू होती है कि आज शाम को किसकी निंदा करनी है. जो ये नहीं करते वे निंदा के कुछ और उपक्रमों में लगे होते हैं. लब्बोलुआब ये कि अगर वे दिन में दस-बीस लोगों की निंदा न कर लें, उन्हें ख़ाना हज़म न हो.
ये तो सब जानते हैं कि पत्रकार ईर्ष्यालु भी बहुत होते हैं. अगर कोई और पत्रकार पीएम का इंटरव्यू ले आए तो उसी का जुलूस निकालने में जुट जाएंगे. इंटरव्यू की तो बखिया उधेड़ेंगे ही इंटरव्यू लेने वाले की योग्यता और निष्ठा का पंचनामा भी कर देंगे. नाना प्रकार से सवाल उठाएंगे कि ये नहीं पूछा, वह नहीं पूछा, ऐसे पूछना चाहिए था, वहाँ टोकना या रोकना चाहिए था, वगैरा वगैरा.
पकौड़ा पत्रकारिता के इस स्वर्णकाल में भला इस तरह के सवालों का कोई मतलब होता है?
फिर ये पत्रकार निंदा भी करेंगे तो सीधे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री की. इससे नीचे के स्तर के नेताओं को घाँस डालना वे अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं. प्रधानमंत्री चाहे कितनी ही क्रांतिकारी बात न करे, तारीफ़ तो उनके मुँह से निकलेगी ही नहीं. वे करेंगे निंदा ही.
अब बताइए कि अगर पीएम ने पकौड़ा बेचने को रोज़गार से जोड़ने की नायाब मिसाल दी थी तो उनकी इस पकौड़ानॉमिक्स को क्रांतिकारी विचार के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए था या नहीं? मगर न, वे टूट पड़े निंदा की लाठी लेकर. ऐसी निंदा की कि हर गली-नुक्कड़ पर पकौड़ा महात्म्य सुनाई पड़ने लगा. सोशल मीडिया का बाज़ार तो उससे गुंजायमान ही हो गया.
क्या पत्रकारों का ये कृत्य सरासर देशद्रोह नहीं है और क्या इसके लिए उन्हें दंडित किया जाना चाहिए? हर राष्ट्रभक्त ज़रूर कहेगा कि दंड ज़रूर दिया जाए. और नहीं तो कुछ भक्तों को ही उन पर छू कर दिया जाए. इससे भी कोई पत्रकार न माने तो पुलिस, इनकम टैक्स या सीबीआई तो हैं ही. प्रधानमंत्री के पकौड़ा-दर्शन की गहराई में उतरे बिना उसका मज़ाक बनाना राजद्रोह के लेवल के अपराध से कम नहीं है.
पता नहीं गिरिराज सिंह वगैरा इस मामले में चुप क्यों हैं और ऐसे पत्रकारों को पाकिस्तान भेजने का आह्वान उन्होंने अभी तक क्यों नहीं किया. शायद उन्हें डर होगा कि पत्रकारों इसे सीरियसली ले सकते हैं और अड़ सकते हैं कि उन्हें पाकिस्तान भेजा जाए. उन्हें मुफ़्त की घुमक्कड़ी की आदत जो होती है. फिर वहाँ से कुछ एक्सक्लूसिव, स्कूप वगैरा निकालने का लालच भी उनमें पाकिस्तान जाने के नाम पर पैदा हो सकता है.
वैसे पकौड़ा रोज़गार योजना पर टीका-टिप्पणी करते समय पत्रकारों को दूसरों की न सही, अपने रोज़गार की चिंता तो करनी ही चाहिए. उन्हें पता है कि पिछले कुछ सालों से लगातार छँटनी हो रही है और सैकड़ों की तादाद में पत्रकारों ने नौकरियाँ गँवाई हैं. अब ये बेरोज़गार पत्रकार अगर प्रधानमंत्री द्वारा सुझाए गए चैनल के सामने ही पकौड़ा बेचने लगें तो सोचिए उन्हें काम मिल जाएगा कि नहीं?
जिस तरह वे चैनलों पर न्यूज़ तलने-छानने का करतब दिखाते हैं, अगर वही कौशल उन्होंने पकौड़ों के व्यापार में दिखाया तो वारे-न्यारे भी हो सकते हैं. वे मोदी-भक्ति के पकौड़े बेच सकते हैं जो कि वही देशभक्त चैनल कई गुना दाम देकर खरीद लेगा. यही नहीं, हर चैनल से भक्तगण निकलकर पकौड़ों पर पड़ेंगे. लगता है कि पत्रकार समझ नहीं पा रहे हैं कि इस समय ऐसे पकौड़ों की कितनी डिमांड है.
खैर पत्रकार जब इंटरव्यू के नाम पर पकौड़े तल रहे हों तो उनसे इतनी गहराई में उतरने की अपेक्षा रखना भी नोटबंदी से भ्रष्टाचार दूर होने या पंद्रह लाख बैंक खाते में आने की आशा रखने जैसा है. इसके लिए उनके पास न फ़ुरसत है और न ही नीयत, क्योंकि उन्हें तो बस निंदा करनी आती है और वे वही करेंगे.
लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर क्या कर रहे हैं? उन्हें तो अपने नेता के इस विचार को आगे बढ़ाने में तत्परता दिखानी चाहिए. और नहीं तो यूजीसी को ही आदेश देना चाहिए कि पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में पकौड़ा बनाने का भी एक पेपर शामिल करवाए. उनके इस क़दम का भरपूर स्वागत भी किया जाएगा, क्योंकि पत्रकारों की नौकरियाँ तो हर समय ख़तरे में रहती हैं, इसलिए अगर वे पकौड़ा बनाने में पारंगत रहे तो नौकरी जाते ही ठेला लगाकर अपना धंधा शुरू कर सकते हैं.
जिन चैनलों या अख़बारों में पत्रकारों को कम वेतन मिलता है वे इसे पार्ट टाइम धंधे के रूप में अपना सकते हैं. वे इस कला को न्यूज़ के साथ और बेहतर तरीक़े से आज़माकर उन्हें और भी चटपटा बना सकते हैं. फिर तो प्राइम टाइम के कार्यक्रमों के नाम भी चौधरी पकौड़ा भँडार, सरदाना पकौड़ा वाला आदि हो जाएंगे, जो ज़ाहिर है बहुत आकर्षक हैं और ललचाने वाले भी.
जावड़ेकर के लिए ये अवसर न केवल पीएम और पीएमओ को खुश करने का है, बल्कि अपनी विचारधारा को फैलाने का भी. बतरा से वैदिक पकौड़ा पर किताब लिखवाकर अनिवार्य बना सकते हैं. विदेशी संस्कृतियों के आने से पकौड़ों के आकार, रंग, गंध एवं स्वाद आदि में जो विकृतियां आई हैं, उन्हें दूर करने की दिशा में ये कालांतर में महत्वपूर्ण शिक्षा-सुधार माना जाएगा. इससे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जो बल मिलेगा, वह अतुलनीय होगा.
पत्रकारों को ये नहीं भूलना चाहिए कि सरकार की मंशा को देखते हुए बहुत सारे पुरस्कार भी पत्रकारिता की इस नई विधा में उल्लेखनीय काम करने वालों के उत्साहवर्धन के लिए शुरू होंगे ही. यानी पकौड़ा पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है. लिहाज़ा उन्हें दूरदृष्टि से काम लेना चाहिए और इस विधा में महारत हासिल करने में जुट जाना चाहिए.
डॉ. मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और मीडिया विश्लेषक हैं. वे पिछले साढ़े तीन दशकों से प्रिंट, टेलीविज़न और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं. दूरदर्शन समेत कई प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुके हैं. वर्तमान में सत्य हिंदी के संपादक हैं.

